1664 का काशी युद्ध : जब काशी विश्वनाथ की रक्षा के लिए मुगलों पर टूट पड़े थे नागा साधु, औरंगजेब की सेना को किया था परास्त

The Battle of Kashi

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काशी की पवित्र भूमि पर एक दिन ऐसा आया, जब मुगल साम्राज्य की शक्तिशाली सेना को नागा साधुओं ने युद्ध में हरा दिया। सन् 1664 ईस्वी (विक्रम संवत 1721) में हुए भयंकर युद्ध में दशनामी नागा साधुओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए मुगल सेना को निर्णायक पराजय दी। यह घटना हिंदू इतिहास की उन वीर गाथाओं में से एक है जो त्याग और तलवार, दोनों की शक्ति को साथ लेकर चलती है।

यह ऐतिहासिक घटना 17वीं शताब्दी के मध्य की है। काशी विश्वनाथ मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख है और स्कंद पुराण तथा महाभारत में वर्णित है। यह सदियों से आक्रमणों का शिकार रहा था। 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे ध्वस्त किया, फिर 1585 में राजा टोडर मल ने इसे पुनर्निर्मित करवाया। औरंगजेब (1658-1707) के काल में धार्मिक नीतियां सख्त हो गईं। इस दौरान धार्मिक नीतियां मुख्य रूप से इस्लामी शरिया के अनुरूप बनाने की कोशिश पर आधारित थीं।  मंदिरों के विध्वंस की नीति बनाई गई. इसके अलावा होली, दीवाली जैसे हिंदू त्योहारों के सार्वजनिक उत्सवों पर प्रतिबंध लगाया दिया गया। जजिया कर भी लगाया गया।  

1664 में मुगल सेना, मिर्जा अली और अब्दुल अली जैसे कमांडरों के नेतृत्व में, मंदिर को लूटने और ध्वस्त करने के उद्देश्य से काशी पहुंची। मुगल सेना की संख्या हजारों में थी और वे आधुनिक हथियारों से लैस थे। इस खतरे के बीच महानिर्वाणी अखाड़े के दशनामी नागा साधु युद्ध को तैयार हो गए। ये साधु शंकराचार्य की परंपरा से जुड़े थे, जिन्हें दस नामों (गिरि, पुरी, भारती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ, आश्रम और सरस्वती) में संगठित किया गया था। वे शास्त्रधारी (विद्या के रक्षक) और अस्त्रधारी (हथियारबंद योद्धा) में विभाजित थे।

आक्रमण तेज होता गया। मुगल सैनिकों ने काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ना आरम्भ किया, लेकिन उन्हें भयंकर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। नागा साधु त्रिशूल, तलवार और अपनी आध्यात्मिक शक्ति से लैस होकर मुगल सेना पर टूट पड़े। इस दौरान दशनामी नागाओं ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। 

मुगल सेना, जो भारी संख्या और हथियारों में श्रेष्ठ थी, इस अचानक और प्रचंड हमले से हिल गई। साधुओं ने घेराबंदी की रणनीति अपनाई और मुगलों को भारी नुकसान पहुंचाया। सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक A History of Dasnami Naga Sanyasis (1955) में दर्ज है कि काशी क्षेत्र में संवत 1721 (1664 ई.) में उन्होंने सुल्तान से युद्ध में विजय प्राप्त की… सूर्योदय से सूर्यास्त तक युद्ध चला और दशनामियों ने वीरता दिखाई, उन्होंने विश्वनाथ की सीट का सम्मान बचाया। उन्होंने मुसलमान मिर्जा अली और अब्दुल अली को पराजित किया। 

साभार : https://www.amazon.in/History-dasnami-Naga-Sanyasis/dp/8121268249

जेम्स जी. लॉकटेफेल्ड की The Illustrated Encyclopedia of Hinduism, Volume 1 में लिखा है कि 1664 में बनारस में महानिर्वाणी अखाड़े के नागा तपस्वी योद्धाओं द्वारा युद्ध लड़ा गया। इसमें इन योद्धाओं ने ज्ञानवापी कुएं के पास ‘सुल्तान’ की सेना पर महान विजय प्राप्त की और मंदिर की रक्षा की। इतिहासकारों ने इस सुल्तान को औरंगजेब माना है। अखाड़े के अभिलेख और बाद के विद्वानों ने इसे प्रमाणित किया। 

इस विजय के तुरंत बाद औरंगजेब कुछ वर्षों तक काशी पर दोबारा हमला करने का साहस न कर पाया। लेकिन 1669 में उसने फरमान जारी कर मंदिर ध्वस्त करवाया और वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई। 

नागा साधुओं की यह वीरता हिंदू प्रतिरोध का एक अद्भुत उदाहरण है, जो 18वीं सदी में भी जारी रहा। आज भी अखाड़े कुम्भ मेलों में इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। यह घटना याद दिलाती है कि जब धर्म पर संकट आता है, तो साधारण दिखने वाले लोग भी महानायक बन सकते हैं। इतिहास की इस पाठ से हम सीख सकते हैं कि साहस और एकता किसी भी साम्राज्य को चुनौती दे सकती है।