11 जनवरी 1966 को दिल्ली की सुबह हर दिन की सुबह से कुछ अलग थी। लोग बेचैन थे, इसी सुबह 9 बजे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का पार्थिव शरीर ताशकंद से दिल्ली पहुंचा। शास्त्री जी के परिजन, रिश्तेदार और लाखों समर्थक दिल्ली में मौजूद थे। उनकी आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। कोई हाथ जोड़कर खड़ा था तो कोई उनके अंतिम दर्शन के लिए बेचैन था। लेकिन इस भावुक छड़ के बीच सत्ता के भीतर एक ऐसा फैसला आया, जिसके बारे में देश के लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि इतने लोकप्रिय नेता के साथ ऐसा भी कुछ होगा। यह फैसला था शास्त्री जी के अंतिम संस्कार को लेकर। जिसमें एक तरफ थीं इंदिरा गांधी और दूसरी तरफ था शास्त्री जी का परिवार। बीच में था एक सवाल आखिर शास्त्री की चिता दिल्ली में जल भी पाएगी या नहीं।
ताशकंद समझौते के दौरान शास्त्री जी की संदिग्ध मौत के बाद, उनका शव 11 जनवरी 1966 को सुबह 9 बजे दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर पहुंचा। यहां से पार्थिव शव को उनके सरकारी आवास पर लाया गया। देश भर से उनके समर्थक दिल्ली पहुंच रहे थे। सेना अंतिम यात्रा की तैयारी में जुटी थी। लोग व्याकुल थे। बड़े नेता अंत्येष्टि के लिए आपस में बातचीत कर रहे थे। लेकिन इसी बीच अंतिम संस्कार को लेकर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का नाम सामने आया। जो कि शास्त्री जी का गृह क्षेत्र था। विचार यह था कि देश के दिवंगत प्रधानमंत्री को उनके अपने शहर में अंतिम विदाई दी जाए। जबकि नेहरू के समय ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन अब उन्हीं की बेटी इंदिरा गांधी, शास्त्री जी का अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाए इलाहाबाद में कराने के लिए जुटी थीं। अब दिल्ली में अगला फैसला बेहद महत्वपूर्ण होने वाला था।
इंदिरा गांधी इस बात को लेकर अड़ गई की शास्त्री का अंतिम संस्कार उनके गृह जनपद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में होना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज से इस विषय में बात की और इलाहाबाद में अंतिम संस्कार कराने पर जोर दिया। लेकिन शास्त्री जी के जीवन में दिल्ली का विशेष महत्व था। इसी शहर में उन्होंने राजनीति की सीढ़ियां चढ़ीं। रेल मंत्री बने, गृह मंत्री बने और फिर देश के प्रधानमंत्री। 1965 के युद्ध के दौरान जब देश मुश्किल में था, तो उनकी आवाज “जय जवान, जय किसान” का नारा बनकर इसी राजधानी से पूरे देश तक पहुंची थी।
यही कारण है कि जब लालबहादुर शास्त्री जी की धर्म पत्नी ललिता तक इलाहाबाद में अंतिम संस्कार की बात पहुंची, तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ पति की अंतिम विदाई का सवाल नहीं था। बल्कि उस सम्मान का भी था, जो गांधी और नेहरू को मिला था। वह समझ गई थीं इंदिरा गांधी नहीं चाहती कि जो सम्मान नेहरू को मिला है वह शास्त्री जी को भी मिले। उन्होंने इलाहाबाद में अंतिम संस्कार कराए जाने को लेकर विरोध जताया। लेकिन दिल्ली में अंतिम संस्कार न हो, इसके लिए इंदिरा गांधी के रुख को देखते हुए आखिर में पीड़ित परिवार के पास कोई चारा नहीं बचा। जिसके बाद ललिता शास्त्री को अमरण अनशन पर बैठने का निर्णय लेना पड़ा।
एक प्रधानमंत्री का अंतिम संस्कार दिल्ली में हो, इसके लिए उनकी पत्नी को अमरण अनशन पर बैठना पड़े, इससे बड़ दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। देश भर में इसका क्या संदेश जाता। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने इस बात को समझा और इंदिरा गांधी की इलाहाबाद में अंतिम संस्कार कराने वाली बात को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद दिल्ली में शास्त्री जी के अंतिम संस्कार कारने की तैयारी शुरु हो सकी।
यमुना के किनारे, शांति वन के पास एक जगह अंतिम संस्कार के लिए तैयार की जाने लगी। वहां सेना के जवानों को तैनात किया गया। चंदन की लकड़ियां जुटाई गईं। दूसरी ओर राजधानी की सड़कों पर भीड़ बढ़ती गई। 12 जनवरी को जब शास्त्री की अंतिम यात्रा सरकारी आवास से निकली, उनके पीछे इंसानों का समुद्र उमड़ पड़ा। रास्ते के दोनों ओर लोग सिर झुकाए खड़े थे। कोई फूल बरसा रहा था, कोई हाथ जोड़कर विदाई दे रहा था। शांति वन के पास पहुंचते-पहुंचते यह अंतिम यात्रा दिल्ली की सबसे बड़ी शोक यात्राओं में बदल गई। करीब 20 लाख लोग शास्त्री जी के पार्थिव शरीर के साथ चल रहे थे। दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर शास्त्री के बड़े बेटे हरि किशन ने चिता को अग्नि दी। जिसके बाद वह पंचतत्व में विलीन हुए।
इंदिरा गांधी की अड़चन के बावजूद शास्त्री जी का अंतिम संस्कार को दिल्ली में हुआ, लेकिन अब उनकी समाधि की पहचान क्या होगी, इस पर परिवार विचार कर रहा था। ललिता शास्त्री चाहती थीं कि समाधि की पहचान उनके प्रसिद्ध नारे ‘जय जवान-जय किसान’ से हो। लेकिन इस पर भी इंदिरा गांधी को आपत्ति थी, जिसके बाद एक बार फिर से ललिता शास्त्री जी अपने पति के सम्मान के लिए लड़ना पड़ा। उन्होंने आत्मदाह की चेतावनी दी जिसके बाद इंदिरा गांधी को झुकना पड़ा और शास्त्री जी की समाधि पर उनकी पहचान ‘जय जवान-जय किसान’ नारा लिखा गया।
आज दिल्ली में यमुना किनारे मौजूद शास्त्री जी की यह समाधि विजय घाट के नाम से जानी जाती है। 2 अक्तूबर को उनकी जयंती पर देश भर से हजारों लोग विजय घाट पहुंचते हैं और शास्त्री जी को श्रद्धांजलि अर्पित कर कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। लेकिन आज भी 1966 की जनवरी की उस सर्द दोपहर को याद करना आसान नहीं है। जब एक प्रधानमंत्री को उस सम्मान से दूर रखना की योजना बनाई गई थी, जिसने देश की आजादी और फिर प्रधानमंत्री के रूप में देश को संकटों से उबारने के लिए दिन रात एक कर दिया था।

