Battle Of Haifa: प्रथम विश्व युद्ध अपने अंतिम चरण में था। फिलिस्तीन में उस्मानी साम्राज्य की सेना लगातार पीछे हट रही थी, लेकिन हाइफा अब भी एक कठिन सैन्य चुनौती बना हुआ था। शहर के सामने किशोन नदी, पीछे माउंट कार्मेल की ऊंचाइयां और इनके बीच दुश्मन की तोपें, मशीनगनें और मजबूत रक्षात्मक मोर्चे मौजूद थे।
इससे पहले बख्तरबंद गाड़ियों और ब्रिटिश इकाइयों के प्रयास भी इस क्षेत्र में निर्णायक सफलता हासिल नहीं कर सके थे। लेकिन 23 सितंबर 1918 को हाइफा की ओर बढ़ रही सेना के पास एक ऐसा हथियार था, जिसे आधुनिक युद्ध लगभग अप्रासंगिक मानने लगा था, घोड़े, तलवारें और लंबे भाले। इन पर सवार थे भारत के जोधपुर और मैसूर लांसर्स। कुछ ही घंटों में उन्होंने यह साबित कर दिया कि सही भूभाग, सही गति और साहस के साथ घुड़सवार सेना अब भी मशीनगनों और तोपों से लैस दुश्मन को परास्त कर सकती है।
हाइफा पर कब्जे का अभियान 5वीं हॉर्स कैवेलरी डिवीजन को सौंपा गया था। इस डिवीजन की 15वीं इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड में जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स शामिल थे। हालांकि 23 सितंबर को हैदराबाद लांसर्स मुख्य कार्रवाई से 50-60 किलोमीटर पीछे थे, इसलिए हाइफा पर निर्णायक हमला मुख्य रूप से जोधपुर लांसर्स ने किया, जबकि मैसूर लांसर्स ने उन्हें महत्वपूर्ण फायर सपोर्ट दिया और दूसरे मोर्चे से आगे बढ़े।
हाइफा की भौगोलिक स्थिति ने युद्ध को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया था। किशोन नदी और माउंट कार्मेल के बीच का क्षेत्र दुश्मन की तोपों और मशीनगनों से सुरक्षित था। सामने खुले मैदान में आगे बढ़ती घुड़सवार सेना को आधुनिक हथियारों से लैस सैनिकों का सामना करना था। उस्मानी सेना के पास फील्ड आर्टिलरी और मशीनगनें थीं, जबकि भारतीय घुड़सवार सैनिकों के पास मुख्य पारंपरिक हथियार लंबे भाले और तलवारें थे। लेकिन भारतीय कमांडरों ने अपनी कमजोरी को अपनी रणनीति में बदल दिया। उनका उद्देश्य दुश्मन की गोलाबारी के सामने धीरे-धीरे आगे बढ़ना नहीं था, बल्कि ऐसी गति और दिशा से हमला करना था कि दुश्मन अपनी भारी तोपों और मशीनगनों का प्रभावी उपयोग कर ही न कर सके।
इस योजना में मैसूर लांसर्स के एक स्क्वाड्रन ने माउंट कार्मेल की कठिन ढलानों पर चढ़कर उस क्षेत्र में स्थित ऑस्ट्रियाई फील्ड गन बैटरी पर हमला किया। उनके साथ शेरवुड रेंजर्स येओमैनरी का एक स्क्वाड्रन और तोपखाने का समर्थन भी था। उद्देश्य साफ था, पहाड़ी से भारतीय घुड़सवारों पर बरसने वाली तोपों को शांत करना। मैसूर के सैनिकों ने कठिन रास्ते से आगे बढ़कर इस ऊंचाई पर कब्जा किया। इस कार्रवाई ने हाइफा की रक्षा व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण हिस्से को कमजोर कर दिया और जोधपुर लांसर्स के लिए आगे बढ़ने का रास्ता बनाया।
इसी दौरान जोधपुर लांसर्स ने मुख्य हमला शुरू किया। उनका लक्ष्य था, दुश्मन की उस रियरगार्ड स्थिति को तोड़ना, जो हाइफा की ओर जाने वाले रास्ते को रोक रही थी। यह हमला सामान्य घुड़सवार युद्ध जैसा नहीं था। भारतीय सैनिकों को रेलवे लाइन पार करनी थी, नदी के आसपास के कठिन भूभाग से गुजरना था और मशीनगन तथा तोपों की आग के बीच आगे बढ़ना था। नदी के किनारे दलदली और रेतीली जमीन ने घोड़ों की गति को भी प्रभावित किया। सीधे रास्ते में बाधा आने पर लांसर्स ने अपना मार्ग बदला और माउंट कार्मेल की निचली ढलानों की ओर मुड़ गए। यही वह क्षण था, जब घुड़सवार सेना की गतिशीलता निर्णायक साबित हुई। वे एक निश्चित दिशा में फंसने के बजाय भूभाग के अनुसार अपना गठन और दिशा बदलते हुए आगे बढ़े।
जोधपुर लांसर्स का हमला उस समय और भी साहसी था क्योंकि उनके सामने लगभग पूरी तरह आधुनिक हथियारों से लैस दुश्मन था। मशीनगनें घोड़ों और सैनिकों को निशाना बना रही थीं। तोपें ऊंचाइयों से गोलाबारी कर रही थीं। फिर भी लांसर्स ने अपनी गति नहीं खोई। घुड़सवार सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी गति और आघात क्षमता होती है। जब सैनिक एक संगठित संरचना में तेज गति से दुश्मन की ओर बढ़ते हैं, तो कुछ ही क्षणों में दूरी इतनी कम हो सकती है कि मशीनगन दल और तोपों के लिए प्रभावी प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। हाइफा में यही हुआ। भारतीय घुड़सवारों ने दुश्मन को लंबी दूरी से लगातार गोलाबारी करने का पर्याप्त समय नहीं दिया और उसकी रक्षात्मक स्थिति के भीतर घुसने की कोशिश की।
इस पूरे अभियान में गठन और तालमेल सबसे महत्वपूर्ण तत्व था। एक तरफ जहां मैसूर लांसर्स ने केवल पीछे से आने वाली सहायता नहीं दी, बल्कि उन्होंने दुश्मन की ऊंचाई वाली तोपों को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं दूसरी ओर, जोधपुर लांसर्स ने मुख्य आक्रमण की दिशा में गति और आघात का इस्तेमाल किया। पहले ऊंचाई पर मौजूद तोपों को निशाना बनाया गया, फिर मुख्य रक्षात्मक मोर्चे पर हमला हुआ और उसके बाद शहर के भीतर तेजी से प्रवेश किया गया। इस तरह हमला एक ही दिशा में आगे बढ़ती भीड़ नहीं था, बल्कि अलग-अलग भूमिकाओं में बंटी हुई घुड़सवार कार्रवाई थी, एक हिस्सा दुश्मन की तोपों को शांत कर रहा था, दूसरा मुख्य रक्षात्मक मोर्चे को तोड़ रहा था और तीसरा सफलता मिलते ही शहर की ओर बढ़ रहा था।
जब जोधपुर लांसर्स शहर में प्रवेश कर चुके थे, तब मैसूर लांसर्स के वे सैनिक, जो अब तक अपने साथियों को फायर सपोर्ट दे रहे थे, घोड़ों पर सवार हुए और उनके पीछे शहर में दाखिल हो गए। इस तरह दोनों भारतीय रेजिमेंटों की कार्रवाई एक-दूसरे से जुड़ गई। दोनों रेजिमेंटों ने मिलकर लगभग 1,350 जर्मन और उस्मानी सैनिकों को बंदी बनाया। उनके हाथ बड़ी संख्या में तोपें और मशीनगनें भी लगीं। उपलब्ध सैन्य विवरणों के अनुसार, भारतीय पक्ष के 8 सैनिक बलिदान हुए और 34 सैनिक घायल हुए, जबकि 60 घोड़े मारे गए और 83 घायल हुए।
हाइफा का यह युद्ध भारतीय घुड़सवार टुकड़ियों द्वारा सिर्फ एक दिन में ही जीत लिया गया था। यह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि उस समय युद्ध लड़ने का तरीका तेजी से बदल रहा था। मशीनगन, तोप और बख्तरबंद गाड़ियां युद्ध में बड़ी भूमिका निभाने लगी थीं और घुड़सवार सेना का महत्त्व कम होता जा रहा था। इसके बावजूद भारतीय लांसर्स ने अपनी तेज गति, सही रणनीति, इलाके की समझ और आपसी तालमेल के दम पर जीत हासिल की। उन्होंने दुश्मन को अपनी ताकत के अनुसार लड़ने का मौका नहीं दिया। जहां बख्तरबंद गाड़ियां और पैदल सैनिक दुश्मन के मजबूत मोर्चों के सामने रुक सकते थे, वहीं भारतीय घुड़सवार तेजी से आगे बढ़े और अपनी गति के बल पर युद्ध का रुख बदल दिया।
23 सितंबर 1918 को हाइफा में विजय प्राप्त करके भारतीय घुड़सवारों ने साबित किया कि आधुनिक हथियारों से लैस दुश्मन के सामने भी पारंपरिक सैन्य शक्ति निर्णायक बन सकती है, यदि उसका नेतृत्व साहसी हो, गठन अनुशासित हो और हमला सही समय पर किया जाए।
हाइफा में भारतीय लांसर्स ने केवल एक शहर पर कब्जा नहीं किया, बल्कि उन्होंने सैन्य इतिहास के उस दौर में अपनी जगह बनाई, जब दुनिया यह मानने लगी थी कि घोड़े और भाले का युग समाप्त हो चुका है।

