जब भाई दया सिंह ने हजारों किलोमीटर की जोखिम भरी यात्रा कर औरंगजेब तक पहुंचाया था गुरु गोबिंद सिंह जी का ‘जफरनामा’

Bhai Daya Singh

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वर्ष 1704 में पंजाब की धरती युद्ध, विश्वासघात और बलिदानों की साक्षी बन चुकी थी। आनंदपुर साहिब के लंबे घेरे, चमकौर के युद्ध और गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबजादों के बलिदान के बाद ऐसा लग रहा था कि मुगल शासन उस हर शक्ति का दमन कर देगी, जो उसके खिलाफ उठेगी। लेकिन वर्ष 1706  में एक ऐसी घटना घटी, जिसने न केवल औरंगजेब की सत्ता को चुनौती दी, बल्कि उसके नैतिक आधार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। 

यह घटना थी गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखे गए जफरनामा को मुगल शासक औरंगजेब तक पहुंचाने की और इस ऐतिहासिक कार्य को अंजाम दिया था खालसा पंथ के पहले पंच प्यारों में से एक, भाई दया सिंह ने। जफरनामा, जिसका अर्थ है ‘विजय-पत्र’, फारसी भाषा में लिखा गया एक ऐसा दस्तावेज, जिसमें गुरु गोबिंद सिंह जी ने औरंगजेब को उसके द्वारा किए गए विश्वासघात, अत्याचार और कुरान पर खाई गई झूठी कसमों की याद दिलाई थी। यह पत्र किसी सामान्य संदेशवाहक के हाथों नहीं भेजा जा सकता था। उस समय गुरु जी मुगल सत्ता के सबसे बड़े विरोधी माने जाते थे और उनके प्रत्येक अनुयायी पर नजर रखी जा रही थी। ऐसे में यह जिम्मेदारी भाई दया सिंह को सौंपी गई, उनके इस काम में भाई धरम सिंह को भी लगाया गया। 

उन्हें पंजाब के दीना गांव से गुरु गोविंद सिंह का दूत बनकर अहमदनगर में डेरा डाले औरंगजेब को यह दस्तावेज सौंपना था। 

गुरु गोबिंद सिंह चाहते, तो यह दस्तावेज औरंगजेब के किसी दूत के माध्यम से भी उस तक पहुंचा सकते थे, लेकिन गुरु जी जानना चाहते थे कि इसे पढ़ने पर क्रूर शासक के चेहरे के हाव-भाव क्या होंगे, उसकी तत्काल क्या प्रतिक्रिया होगी? ऐसे में उन्होंने भाई दया सिंह को दूत बनाकर भेजा, जिससे दया सिंह उस स्थिति को बाद में भली-भांति उन्हें बता सके। 

उस समय औरंगजेब दक्कन में अपने अंतिम सैन्य अभियानों में व्यस्त था और उसका शाही शिविर अहमदनगर के आसपास स्थित था। पंजाब के दीना गांव से अहमदनगर की दूरी लगभग 1600 किलोमीटर थी। आज के आधुनिक परिवहन साधनों के बिना यह यात्रा उस समय बेहद कठिन थी। यह यात्रा लंबी होने के साथ-साथ खतरनाक भी थी। इस यात्रा में घोड़े, पैदल मार्ग और विभिन्न स्थानीय रास्तों का उपयोग करते हुए ही पहुंचना था। रास्ते में मुगल चौकियां थीं, सैनिक गश्त थी और गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुयायियों की तलाश लगातार चल ही रही थी। यदि उनकी पहचान उजागर हो जाती, तो उन्हें तुरंत गिरफ्तार करके मृत्युदंड दिया जा सकता था। इसके बावजूद उन्होंने यह मिशन स्वीकार किया। वे जानते थे कि यह दस्तावेज सत्य और न्याय का संदेश था, जिसे भारत के सबसे क्रूर शासक तक पहुंचाना आवश्यक था। भाई दया सिंह और भाई धरम सिंह को घोड़े, पैदल मार्ग और विभिन्न स्थानीय रास्तों का उपयोग करते हुए कई महीनों तक यात्रा करनी पड़ी। 

अंतत: भाई दया सिंह और भाई धरम सिंह अहमदनगर आ पहुंचे। लेकिन अहमदनगर पहुंच जाना ही पर्याप्त नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती थी मुगल सम्राट तक प्रत्यक्ष पहुंच बनाना। आम व्यक्ति के लिए सम्राट तक पहुंचना लगभग असंभव था और यहां तो संदेशवाहक ऐसे व्यक्ति थे जो मुगल सत्ता के सबसे बड़े विरोधी के प्रतिनिधि थे। ऐसे में उनकी औरंगजेब से शीघ्र मुलाकात नहीं हो सकी। इसके लिए भी उन्हें कुछ हफ्ते और लग गए। क्योंकि यह पत्र उन्हें सीधे औरंगजेब को देना था नाकि उसके किसी दूत के माध्यम से भिजवाना था। फिर वह भी दिन आया, जब भाई दया सिंह औरंगजेब के सामने उपस्थित हुए और दस्तावेज उन्हें सौंप दिया। 

जब औरंगजेब दस्तावेज पढ़ रहा था तो भाई दया सिंह उसके चेहरे के भावों को गौर से देख रहे थे। उन्होंने देखा कि औरंगजेब के चहरे के भाव तेजी से बदल रहे थे, पश्चात्ताप और आत्मग्लानि के भाव उसके चेहरे पर दिखे, उसके बाद चाहरे पर मायूसी साफ झलक रही थी। गुरु गोबिंद सिंह जी ने पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि उसने कुरान की कसम खाकर आनंदपुर छोड़ने का सुरक्षित मार्ग देने का वचन दिया था, लेकिन बाद में उस वचन को तोड़ दिया। गुरु जी ने उसे याद दिलाया कि सच्चा शासक वही होता है जो अपने वचनों का पालन करे।

सिख परंपरा में यह माना जाता है कि जफरनामा पढ़ने के बाद औरंगजेब आत्ममंथन करने लगा। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी को मिलने के लिए आमंत्रित भी किया। कुछ स्रोतों के अनुसार उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि गुरु जी के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। हालांकि इससे पहले कि दोनों की मुलाकात हो पाती, 20 फरवरी 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

भाई दया सिंह की इस यात्रा का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने एक पत्र पहुंचाया। वास्तव में उन्होंने उस युग के सबसे क्रूर मुगल शासक के सामने सत्य को खड़ा किया। जब अधिकांश लोग औरंगजेब के भय से उसके सामने थरथर कांपते थे, तब भाई दया सिंह हजारों किलोमीटर की खतरनाक यात्रा करके उसके दरबार में गुरु का संदेश लेकर पहुंचे। 26 अगस्त 1669 में लाहौर में जन्में भाई दया सिंह का यह साहस, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का अद्वितीय उदाहरण है।