अमृतसर से केवल 25 किलोमीटर दूर घुक्केवली गांव में गुरु अर्जन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी के पावन आगमन से जुड़े दो ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं। वहां महाराजा रणजीत सिंह ने एक विशाल भूमि दान की थी। वह अब ‘गुरु का बाग’ कहलाती है।
1920 के दशक तक इसका प्रबंधन उदासी संप्रदाय के महंत सुंदर दास के पास था। सिखों को गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए ब्रिटिश शासन ने हक नहीं दिया था, बल्कि हिंदू-सिखों के बीच ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के तहत उदासी संप्रदाय को दे रखा था।
8 अगस्त 1922 को जब अकाली सिखों ने गुरुद्वारे के लंगर के लिए बाग से सूखी लकड़ियां काटीं, तो महंत ने इसे चोरी बताकर पुलिस में शिकायत कर दी। ब्रिटिश सरकार ने बिना देर किए 9 अगस्त को 5 सिखों को गिरफ्तार कर उन्हें एक साल की कठोर कैद और 300 रुपए जुर्माने की सजा सुना दी। सिख समुदाय ने इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने इसके खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध का ऐलान कर दिया।
तय हुआ कि रोज 5-5 सिखों का जत्था ‘गुरु का बाग’ जाएगा। न किसी के पास हथियार होगा, न कोई अपशब्द कहेगा और न ही कोई पलटकर वार करेगा। पुलिस ने गिरफ्तारियां शुरू कीं, लेकिन जत्थों का आना नहीं रुका।
25 अगस्त को अमावस्या पर उमड़ी हजारों की भीड़ से बौखलाकर पुलिस अधिकारी एस.जी.एम. बीट्टी ने बर्बर लाठीचार्ज का आदेश दे दिया।
निहत्थे सिखों पर बेरहमी से लाठियां बरसाई गईं, बूटों से कुचला गया, लेकिन किसी ने हाथ नहीं उठाया। घायल गिरते रहे, पर हर सुबह एक नया जत्था सीना ताने सामने खड़ा हो जाता। हालात ये थे कि SGPC को पास में ही एक अस्थायी अस्पताल बनाना पड़ा।
आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजी प्रशासन ने गुरु का बाग जाने वाले सभी रास्तों पर कड़ा पहरा बिठा दिया। भारी पुलिस बल तैनात कर पूरी तरह नाकेबंदी कर दी गई। लेकिन अमेरिकी फिल्म निर्माता ए.एल. वर्गेस (A.L. Verges) ने ब्रिटिश जुल्म को गुपचुप तरीके से कैमरे में रिकॉर्डिंग की और इसे “Unique Pictures of India’s Martyrdom” नाम से दुनिया के सामने दिखाया।
इसी नाकेबंदी को पार कर प्रसिद्ध अंग्रेज मिशनरी और शिक्षाविद सी.एफ. एंड्रयूज भी किसी तरह गुरु का बाग पहुंचे। उन्होंने जो देखा, उसने उनके भीतर के इंसान को पूरी तरह झकझोर दिया और वे अपने आंसू नहीं रोक पाए। उन्होंने उस खौफनाक मंज़र की गवाही देते हुए लिखा:
“काली पगड़ी पहने चार अकाली सिख हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे। वे बिल्कुल शांत और स्थिर खड़े थे। तभी एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी पीतल-मढ़ी भारी लाठी का सिरा एक सिख की गर्दन की हड्डी पर पूरी ताकत से दे मारा। वह जमीन पर गिर पड़ा, तो एक पुलिसकर्मी ने अपने भारी बूटों से उसकी गर्दन और कंधे को बेरहमी से कुचल दिया। इसके बावजूद सिखों के चेहरों पर न कोई क्रोध था, न प्रतिशोध की भावना।
यह दृश्य ऐसा था कि प्रसिद्ध अंग्रेज सी.एफ. एंड्रयूज भी इस बर्बरता को देखकर रो पड़े। उन्होंने आगे लिखा कि सिखों में न क्रोध था, न प्रतिशोध।
Image source- The Sikh Encyclopedia
अंतरराष्ट्रीय दबाव और बदनामी से घबराकर आखिरकार पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड मैकलैगन को दखल देना पड़ा। 13 सितंबर 1922 को लाठीचार्ज रोकने का आदेश हुआ। विवाद के स्थायी समाधान के लिए प्रसिद्ध इंजीनियर सर गंगा राम आगे आए। उन्होंने महंत से जमीन का अधिकार अपने नाम करवाया और दस्तावेज SGPC को सौंप दिए। 27 अप्रैल 1923 को सरकार ने सभी कैदियों को बिना शर्त रिहा कर दिया।
इस मोर्चे में कुल 5,605 सिख गिरफ्तार हुए, 1,500 घायल हुए और 12 वीरों ने शहादत दी। इसी आंदोलन की नींव पर 1925 का ऐतिहासिक ‘सिख गुरुद्वारा अधिनियम’ बना। इस अभूतपूर्व जीत पर महात्मा गांधी ने अकाली नेताओं को बधाई संदेश भेजते हुए गर्व से लिखा था, “स्वतंत्रता की पहली लड़ाई जीत ली गई है।”
गुरु का बाग की कहानी गवाह है कि कभी-कभी जीत तलवार से नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और अनुशासन से हासिल होती है।

