सोलहवीं शताब्दी का पंजाब जब गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 साल करतारपुर (अब पाकिस्तान के नारोवाल जिले में) में बिताने का निर्णय लिया। इतिहासकारों के अनुसार गुरु नानक देव जी ने लगभग 1499 से 1521-22 के बीच चार प्रमुख उदासियां कीं। इन यात्राओं में उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ तिब्बत, श्रीलंका, मक्का, मदीना और बगदाद तक की यात्रा की। इन लंबी यात्राओं के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि अब वे किसी राजमहल या आश्रम में नहीं, बल्कि एक सामान्य किसान की तरह जीवन बिताएंगे।

गुरु नानक जी उदासी से लौटते हुए
लगभग 1521-22 ईस्वी में उन्होंने रावी नदी के दाहिने किनारे, वर्तमान पाकिस्तान के नारोवाल क्षेत्र में एक स्थान चुना। उस क्षेत्र का प्रभावशाली जमींदार और राजस्व अधिकारी करोरी मल जिन्हें दुनी चंद भी कहा जाता है, रावी के आसपास विस्तृत कृषि भूमि का स्वामी था। जब करोरी मल ने सुना कि एक फकीर उसकी भूमि के निकट डेरा डाले बैठा है और प्रतिदिन सैकड़ों लोग हिंदू, मुसलमान, व्यापारी, किसान, हर जाति और वर्ग के लोग उसके उपदेश सुनने पहुंच रहे हैं, तो उसका अहंकार आहत हो गया। उसने निश्चय किया कि वह स्वयं जाकर उस संत को वहां से हटाएगा। वह घोड़े पर बैठकर घर से निकला, घोड़ा अचानक फिसल गया और वह गिर पड़ा। वह बच तो गया, लेकिन वापस लौटना पड़ा। कुछ दिन बाद उसने दोबारा जाने का प्रयास किया। इस बार मार्ग में अचानक उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। घोड़ा भी आगे बढ़ने से रुक गया। आश्चर्य की बात यह थी कि जैसे ही वह वापस लौटा, उसकी दृष्टि सामान्य हो गई।
उसके साथ चल रहे लोगों ने उससे कहा “चौधरी, यदि किसी संत के पास जाना है तो अधिकार दिखाने नहीं, विनम्रता लेकर जाइए।”
गुरु से मिलने पर करोरिया ने कहा, “बाबा जी, ये सारे खेत जहां तक नजर जाती है, मेरे हैं।”
गुरु जी ने पूछा, “करोरिया, तुमसे पहले इन खेतों का मालिक कौन था?”
उसने जवाब दिया, “बाबा जी, मुझसे पहले ये खेत मेरे पिता के थे।”
गुरु जी ने पूछा, “और करोरिया, तुम्हारे पिता से पहले इनका मालिक कौन था?”
करोरिया थोड़ा चिंतित हो गया क्योंकि उसे लगा कि गुरुजी उसकी परीक्षा ले रहे हैं। इसलिए उसने ध्यान से सोचना शुरू किया और उत्तर दिया, “जी बाबा जी, मेरे पिता से पहले ये खेत मेरे दादाजी के थे।”
गुरुजी ने पूछा, “करोरिया जी, बताइए वे (अर्थात पिता और दादाजी) अब कहां हैं?” करोरिया ने उत्तर दिया, “जी बाबा जी, वे इस दुनिया से चले गए हैं।” तब उसे एहसास हुआ कि ये खेत वास्तव में उसके नहीं हैं क्योंकि वह भी जल्द ही इस दुनिया से चला जाएगा। गुरुजी के स्पष्ट संदेश को समझकर करोरिया ने आदरपूर्वक गुरुजी के चरण छुए और उनसे कुछ देर उनके साथ रहने का अनुरोध किया। “सच्चे पातशाह! यदि आप स्वीकार करें तो मैं अपनी यह 100 एकड़ से भी अधिक उपजाऊ जमीन आपके और आपकी संगत के चरणों में हमेशा के लिए समर्पित करता हूँ। कृपया यहां एक नया नगर बसाने की अनुमति दें।” गुरुजी ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया।
सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अभी बाकी था। “गुरु जी, इस नगर का नाम ‘नानकपुर’ रख दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां आपके नाम को स्मरण करें।”
“इस पर गुरू नानक देव जी ने कहा कि संसार का वास्तविक स्वामी कोई मनुष्य नहीं, केवल करतार है। यदि नगर बसना है तो उसका नाम भी उसी के नाम पर होगा। यह संपूर्ण सृष्टि केवल उस एक परब्रह्म, यानी ‘करतार’ की है।”
‘करतार का नगर’, सृष्टि के रचयिता का निवास।

करतारपुर साहिब गुरुद्वारा-छवि स्रोत : DVNetwork
इसी विचार के साथ सन् 1522 में रावी नदी के किनारे ‘करतारपुर’ (Kartarpur) नगर की नींव रखी गई। जिसके बाद करोरी मल यानी कि भाई दुनी चंद ने गुरु जी के लिए एक धर्मशाला और एक घर भी बनवाया। गुरु जी ने एक छोटा सा खेत शुरू किया, जिसकी खेती और जुताई वे स्वयं करते थे। अपने जीवन के अंतिम वर्षों (60वें और 70वें दशक) में स्वयं खेतों में मेहनत की और श्रम की महत्ता समझाई।
करतारपुर केवल एक गांव नहीं बना, बल्कि यह सिख धर्म का पहला ‘कम्यून’ (आदर्श समाज) बना। यहां गुरु नानक देव जी ने स्वयं अपने हाथों से हल चलाया और खेती की।

इस कुएं से गुरु नानक ने खेतों की सिंचाई की थी।
22 सितंबर 1539 को गुरु नानक देव जी ने इसी करतारपुर में ज्योति-जोत समाए। इस प्रकार यह नगर केवल उनके निवास का स्थान नहीं, बल्कि उनके दर्शन का जीवंत प्रतीक बन गया।

