वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री ने दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव को हराने और भारतीयों को बचाने के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल कैसे किया

V.S. Srinivasa Sastri

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“एक साम्राज्य जो न्याय के लिए खड़े होने का दावा करता है, वह मेहनती भारतीयों को केवल उनकी जाति की वजह से सम्मान देने से कैसे मना कर सकता है?”

हॉल में सन्नाटा छा गया।

यह सवाल पूछने वाले व्यक्ति थे वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री, जो भारत के सबसे महान राजनयिकों और वक्ताओं में से एक थे। अंग्रेजी भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ ही विदेशों में भारतीयों के हक की रक्षा करने में उनका सबसे बड़ा हथियार बनी। 1927 में दक्षिण अफ़्रीका की संसद के सामने खड़े होकर, उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को ही चुनौती दी थी, गुस्से या धमकी से नहीं, बल्कि साम्राज्य के ही न्याय के आदर्शों के जरिए। 

उस समय, दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे 1,50,000 से ज्यादा भारतीयों का भविष्य दांव पर लगा था। उनमें से कई लोग मजदूर के तौर पर समुद्र पार करके वहां पहुंचे थे, वहीं, कुछ लोगों ने लगातार कड़ी मेहनत करके सफल कारोबार खड़े किए थे। फिर भी, उनके इतने योगदान के बावजूद, उनके साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव किया जाता था। 

इसके बाद एक और झटका लगा। गोरे दक्षिण अफ्रीकी प्रशासन ने ‘एरियाज़ रिजर्वशन बिल’ (1926) पेश किया। अगर यह बिल पास हो जाता, तो भारतीय परिवारों को अलग-थलग बस्तियों (घेटो) में रहने पर मजबूर होना पड़ता, और भारतीय व्यापारियों से कीमती कमर्शियल इलाकों में प्रॉपर्टी रखने या कारोबार करने का अधिकार छिन जाता। पीढ़ियों से उन्होंने जो कुछ भी बनाया था, वह सब खतरे में पड़ गया था।

भारतीय समुदाय में डर फैल गया। 1926-1927 में, भारतीय राष्ट्रीय नेताओं ने याचिकाएं भेजने, जोशीले भाषण देने और लंदन में मौजूद शाही सरकार (जहां कॉलोनियल ऑफिस और ब्रिटिश इंपीरियल कैबिनेट स्थित थे) से यह मांग करने का रास्ता अपनाया कि वे दक्षिण अफ्रीका को भारतीय प्रवासियों के साथ बराबरी का व्यवहार करने के लिए मजबूर करें। लेकिन यह कोशिश नाकाम रही। इसके बाद यह जिम्मेदारी वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री पर आ गई।
भारत ने शास्त्री को यूं ही नहीं चुना था। उन्हें पता था कि उनके पास एक ऐसा हथियार है, जो किसी और के पास नहीं था। कई साल पहले, ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर आर्थर लियोनेल स्मिथ ने कहा था, “जब तक मैंने शास्त्री को अंग्रेजी बोलते नहीं सुना था, तब तक मुझे पता ही नहीं था कि अंग्रेजी भाषा इतनी सुंदर हो सकती है।” ऐसे समय में जब अंग्रेजों का मानना ​​था कि भारतीय कभी भी उनकी भाषा पर पूरी तरह महारत हासिल नहीं कर सकते, शास्त्री ने उन्हें गलत साबित कर दिया था।

मद्रास प्रेसीडेंसी के एक छोटे से गांव में जन्मे शास्त्री की अंग्रेजी पर जबरदस्त पकड़ की वजह से उन्हें किंग जॉर्ज पंचम की प्रिवी काउंसिल में जगह मिली थी, जो किसी भारतीय को मिलने वाले सबसे बड़े सम्मानों में से एक था। अब, वही हुनर ​​दक्षिण अफ्रीका में भारत की सबसे बड़ी ताकत बनने वाला था। फिर भी, शास्त्री ने कभी भी अंग्रेजी को प्रतिष्ठा की निशानी नहीं माना। उन्होंने इसे अपने लोगों की रक्षा के लिए एक हथियार के तौर पर देखा।

दक्षिण अफ्रीका जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख के तौर पर, शास्त्री दिसंबर 1926 में केप टाउन पहुंचे। वह वहां धमकियों या जोशीले नारों के साथ नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य और असाधारण बुद्धिमत्ता के साथ गए थे। दक्षिण अफ्रीकी संसद और प्रभावशाली गोरे लोगों के सामने खड़े होकर, शास्त्री ने नस्लीय भेदभाव को सही ठहराने वाले हर तर्क को शांति से गलत साबित कर दिया। ब्रिटिश संवैधानिक सिद्धांतों, कानूनी तर्कों और यहां तक कि ईसाई मूल्यों का इस्तेमाल करते हुए, उन्होंने वहां मौजूद लोगों को साम्राज्य के आदर्शों और भारतीयों के साथ उसके बर्ताव के बीच के विरोधाभास पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। जिन लोगों को टकराव की उम्मीद थी, वे ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे महान विचारकों में से एक को सुन रहे थे।

जहां गुस्सा काम नहीं आया, वहां उनकी शांत और तर्कपूर्ण सोच सफल रही।

कई महीनों की धैर्यपूर्ण बातचीत के बाद, सरकार ने आधिकारिक तौर पर ‘एरियाज रिजर्वेशन बिल’ (इलाका आरक्षण विधेयक) को वापस ले लिया। इसका नतीजा 1927 के ‘केप टाउन समझौते‘ के रूप में सामने आया, जिसने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए, उनके अधिकारों की रक्षा की और उस देश में भारत के प्रतिनिधि के माध्यम से उन्हें अपनी बात रखने का आधिकारिक मंच प्रदान किया। उनका मिशन इतना सफल रहा कि समझौते के कार्यान्वयन की देखरेख के लिए शास्त्री को दक्षिण अफ्रीका में भारत का एजेंट नियुक्त किया गया।

पूरे ब्रिटेन में अखबारों ने उन्हें ‘ब्रिटिश साम्राज्य के शानदार वक्ता’ के तौर पर सराहा। फिर भी, शास्त्री की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने अंग्रेजी भाषा पर महारत हासिल की, बल्कि यह थी कि उन्होंने इस भाषा का इस्तेमाल भारतीयों के सम्मान की रक्षा के लिए किया, जब उन्हें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। श्रीनिवास शास्त्री ने साबित कर दिया कि न्याय की हर लड़ाई सड़कों पर ही नहीं जीती जाती। कुछ लड़ाइयां बातचीत की मेज पर जीती जाती हैं, जहां समझदारी, सब्र और तर्क पूर्वाग्रह पर भारी पड़ते हैं। उनका सबसे बड़ा हथियार उनकी बुद्धि थी, जिसके जरिए उन्होंने घर से हजारों मील दूर भारतीयों के सम्मान की रक्षा की।