नेशनल हार्ट ट्रांसप्लांट डे : भारत में हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली प्रीति उन्हाले की कहानी

National Heart Transplant Day

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दिसंबर 2023 में, 51 साल की एक महिला ने भारत के पहले ‘ट्रांसप्लांट गेम्स’ में बैडमिंटन में गोल्ड मेडल जीता। कोर्ट के बाहर, वह AIIMS में मरीजों की काउंसलिंग करती हैं और उन्हें जानलेवा बीमारियों के बावजूद हिम्मत न हारने के लिए प्रेरित करती हैं। पहली नज़र में, उनके जीवन में कुछ भी खास नहीं लगता।

लेकिन असल बात तो यही है। पिछले 25 सालों से, प्रीति उन्हाले एक उस 14 साल के लड़के का दिल अपने शरीर में ट्रांसप्लांट करवाकर जी रही हैं, जिसकी सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उस लड़के का नाम तो किसी को नहीं पता, लेकिन उसके आखिरी तोहफ़े ने प्रीति को जीवन का दूसरा मौका दिया। आज, वह भारत में हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली महिला हैं।

फिर भी, एक समय ऐसा था, जब एक और महीना जीना भी नामुमकिन लग रहा था। पचीस साल पहले, नवंबर 2000 में, प्रीति व्हीलचेयर पर AIIMS दिल्ली पहुंची थीं। वह बहुत थकी हुई थीं, उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी और वह मौत के मुहाने पर खड़ी थीं। मध्य प्रदेश की रहने वाली प्रीति को ‘कार्डियोमायोपैथी’ थी, एक ऐसी बीमारी, जो दिल की मांसपेशियों को कमजोर कर देती है और दिल के लिए शरीर के बाकी हिस्सों में खून पंप करना मुश्किल बना देती है। साल 2000 तक उनकी हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ चुकी थी। उन्हें सीने में दर्द, थकान और लगातार दिल की धड़कन तेज होने की समस्या थी। कुछ कदम चलना भी मुश्किल हो गया था। सांस लेना एक संघर्ष जैसा था। 

कई हेल्थ सेंटर्स से मना किए जाने के बाद, नवंबर 2000 में उन्हें गंभीर हालत में AIIMS में भर्ती कराया गया। वहां, उनका इलाज मशहूर कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. पी. वेणुगोपाल और कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. के. के. तलवार की देखरेख में आरम्भ हुआ। लेकिन उनकी जान बचाने का सिर्फ़ एक ही तरीका था, हार्ट ट्रांसप्लांट। उस समय, भारत में हार्ट ट्रांसप्लांटेशन एक बहुत ही कम होने वाली प्रक्रिया थी। सही डोनर मिलना शायद सबसे बड़ी चुनौती थी। जब डॉक्टर मैचिंग हार्ट की तलाश में जुटे थे, पर प्रीति के लिए तो समय तेजी से बीत रहा था।

तभी एक ऐसा फोन कॉल आया, जिसने सब कुछ बदल दिया। 3 जनवरी 2001 की रात, AIIMS के डॉक्टरों को दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल से जानकारी मिली। एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद 14 साल के एक लड़के को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था। अपने नुकसान से गहरे सदमे में होने के बावजूद, उसका परिवार उसके अंग दान करने के लिए सहमत हो गया, जिससे उन मरीजों को उम्मीद मिली, जिनसे वे कभी नहीं मिल पाए थे।

उस लड़के का दिल प्रीति के लिए मैच कर गया। तुरंत कार्रवाई शुरू हुई। जहां एक मेडिकल टीम डोनर का दिल लाने के लिए अपोलो हॉस्पिटल पहुंची, वहीं दूसरी टीम ने AIIMS में प्रीति को सर्जरी के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। हर मिनट कीमती था। 23 जनवरी 2001 को  मशहूर कार्डियक सर्जन डॉ. बलराम ऐरन की अगुवाई वाली टीम ने सफलतापूर्वक यह जटिल ट्रांसप्लांट प्रक्रिया पूरी की। प्रीति के लिए, वह दिन उनका ‘दूसरा जन्मदिन’ बन गया, वह दिन जब उन्हें नई जिंदगी मिली।

हालांकि, सर्जरी तो बस शुरुआत थी। किसी भी अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन ट्रांसप्लांट) के बाद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है ‘रिजेक्शन’ (शरीर द्वारा अंग को स्वीकार न करना)। चूंकि प्रत्यारोपित अंग किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर से आता है, इसलिए लेने वाले का इम्यून सिस्टम अक्सर इसे बाहरी चीज समझकर इस पर हमला कर देता है। अगर समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए, तो ऐसी स्थिति जानलेवा हो सकती है। प्रीति को भी कई सालों तक कई बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा।

हर बार अनिश्चितता और डर का माहौल बना, लेकिन वह लड़ती रहीं। दवाओं के सहारे और एम्स के डॉक्टरों, डॉ. शिव चौधरी, डॉ. संदीप सेठ और डॉ. मिलिंद होटे – की कड़ी निगरानी में, उन्होंने हर मुश्किल का सामना किया और उसे पार किया। दुनिया भर में, हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद पांच साल तक जीवित रहना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। फिर भी प्रीति ने वह पड़ाव पार किया, फिर अगला, और उसके बाद एक और। आज, उन्होंने उसी प्रत्यारोपित दिल के साथ पच्चीस साल पूरे कर लिए हैं। और भी हैरानी की बात यह है कि उन्हें कभी दोबारा हार्ट ट्रांसप्लांट या किसी बड़ी सुधारात्मक सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी। उनके शरीर ने डोनर के अंग को इतनी अच्छी तरह से स्वीकार किया कि अब उनके मामले को भारत में हार्ट ट्रांसप्लांटेशन के इतिहास की सबसे शानदार सफल कहानियों में से एक माना जाता है।

फिर भी, प्रीति का सफर जो चीज़ वाकई असाधारण बनाती है, वह केवल उनके जीवित रहने के सालों की संख्या नहीं है, बल्कि यह है कि उन्होंने उन सालों को कैसे जिया है। आज, वह एम्स के ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गनाइज़ेशन (ORBO) के साथ काम करती हैं और उन मरीजों की काउंसलिंग करती हैं जो उन्हीं डर और अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं जिनका सामना उन्होंने कभी किया था। खुद इस सफर से गुजरने के कारण, वह उन्हें वह चीज देती हैं जो केवल दवा से नहीं मिल सकती, उम्मीद। उनका दृढ़ संकल्प अस्पताल के गलियारों से कहीं आगे तक जाता है। 

दिसंबर 2023 में, उन्होंने केरल में भारत के पहले ट्रांसप्लांट गेम्स में बैडमिंटन में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा। इससे यह साबित हुआ कि अंग प्राप्त करने वाले लोग सर्जरी के लंबे समय बाद भी सक्रिय और संतोषजनक जीवन जी सकते हैं।

 पचीस साल बाद भी, उन्हें वह अनजान डोनर याद है जिसकी वजह से उन्हें दूसरी ज़िंदगी मिली। वह कहती हैं, “मैं उस परिवार की हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगी जिन्होंने अपने बेटे का दिल दान करने का फैसला किया, तब जब मैंने दोबारा जीने की सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं।” जिस लड़के ने अपना दिल दान किया था, वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन प्रीति के ज़रिए, उसका एक हिस्सा आज भी ज़िंदा है।

उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि भारत ने ऑर्गन ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में कितनी तरक्की की है। नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइज़ेशन (NOTTO) के आंकड़ों के मुताबिक, 1994 में AIIMS में देश के पहले सफल हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद से भारत में 1,400 से ज़्यादा हार्ट ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं। आज, देश भर में हर साल 90 से 150 हार्ट ट्रांसप्लांट किए जाते हैं।

फिर भी, उन सभी सफल कहानियों के बीच, प्रीति उन्हाले का सफर अनोखा है, यह मेडिकल एक्सीलेंस, इंसानी हिम्मत और एक दुखी परिवार के निस्वार्थ फैसले की कहानी है, जिसने एक दुखद घटना को पचीस साल की जिंदगी में बदल दिया।