उल्लाल किले से, रानी अब्बक्का चौटा ने देखा कि आग की लपटें तट पर लंगर डाले हुए पुर्तगाली बेड़े को भस्म कर रही हैं। जिन जहाजों पर कभी यूरोप के सबसे दुर्जेय समुद्री साम्राज्य का गौरव था, वे अब आग में घिर गए थे, उनके जहाज अंधेरे पानी में गिर रहे थे क्योंकि घबराए हुए नाविक भागने के लिए छटपटा रहे थे। कुछ क्षण पहले, रात की आड़ में, तेज नावों पर बैठकर, रानी अब्बक्का के लोग तीरों से लैस होकर चुपचाप खिसक गए थे और पुर्तगाली बेड़े पर हमला कर दिया था। पुर्तगालियों के खिलाफ उल्लाल में रानी अब्बक्का की लड़ाई सबसे बेहतरीन थी।
जबकि जो उल्लाल में लड़ाई 1568 में हुई थी, उसके बीज 1555 में बोए गए थे, जब पुर्तगालियों ने पहली बार उल्लाल राज्य पर आक्रमण किया था जो उग्र रानी अब्बक्का चौटा के नेतृत्व में संरक्षित था। रानी द्वारा सम्मान देने या पुर्तगाली अधिकार को मान्यता देने से इनकार करने के बाद, उन्होंने उल्लाल पर कब्जा करने और इसके फलते-फूलते मसाला व्यापार को नियंत्रित करने की मांग की। रानी के इनकार से चिढ़े पुर्तगाली बदले की नीयत से उल्लाल पर बार-बार हमले करने लगे।
रानी अब्बक्का के विरुद्ध पुर्तगालियों की मुहिम 1568 में सारी हदें पार कर गईं, जब रानी के प्रतिरोध को हमेशा के लिए खत्म करने के पक्के इरादे के साथ, पुर्तगाली वायसराय एंटोनियो डी नोरोन्हा ने जनरल जोआओ पेइक्सोटो को एक बड़ी फौज के साथ भेजा। हमलावर उल्लाल के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने और शाही महल में घुसने में कामयाब हो गए। इससे उन्हें यकीन हो गया कि जीत उनकी ही होगी।
लेकिन वे गलत थे। रानी अब्बक्का महल के पास ही किसी सुरक्षित जगह पर चली गई थीं और हमला करने के सही मौके का इंतजार कर रही थीं। वह मौका आधी रात को आया।
करीब 200 चुने हुए योद्धाओं को इकट्ठा करके, अब्बक्का ने पुर्तगाली कैंप पर अचानक हमला कर दिया। अंधेरे का फायदा उठाते हुए, उनके सैनिकों ने दुश्मन को संभलने या बचाव की तैयारी करने का मौका ही नहीं दिया और उन पर हावी हो गए। सैकड़ों सैनिकों के साथ जनरल जोआओ पेइक्सोटो मारा गया, लगभग सत्तर पुर्तगाली सैनिक पकड़े गए, और बचे हुए सैनिक बुरी तरह घबराकर मंगलुरु की ओर भाग गए। जो जीत पुर्तगालियों के लिए निर्णायक लग रही थी, वह भारतीय तट पर उनकी सबसे शर्मनाक हार में बदल गई।
पुर्तगालियों के खिलाफ रानी अब्बक्का का जबरदस्त हमला। फोटो क्रेडिट : इंडिया टुडे
अब्बक्का ने पीछे हट रहे दुश्मन को फिर से संगठित होने का मौका नहीं दिया। उन्होंने तुरंत मंगलुरु की ओर नौसैनिक जवाबी हमले का आदेश दिया, जहां पुर्तगालियों ने शरण ली थी।
रानी अब्बक्का अपनी नौसैनिक रणनीतियों के लिए जानी जाती थीं, जिनमें स्थानीय मछुआरों, अरब व्यापारियों और तटीय इलाकों के अनुभवी योद्धाओं द्वारा चलाई जाने वाली छोटी और तेज गति वाली नावें शामिल थीं। ये नावें उथले पानी और खाड़ियों में आसानी से चल सकती थीं, जबकि खुले समुद्र में लड़ने के लिए बनी पुर्तगाली सेना को किनारे के पास पैंतरेबाजी करने यानी तेजी से घूमने और वार करने में मुश्किल होती थी। रानी ने वॉचटावर और तोपखाने के जरिए उल्लाल की तटीय सुरक्षा को भी मजबूत किया था और साथ ही स्थानीय समुद्री समुदायों के माध्यम से एक मजबूत खुफिया नेटवर्क भी बनाया था।
खाड़ियों में तेज़ी से चल सकने वाली छोटी नावों का इस्तेमाल करके, रानी की सेना रात के समय लंगर डाले हुए पुर्तगाली जहाजों के पास पहुंचीं। जलते हुए तीर चलाकर कई जहाजों में आग लगा दी गई, जिससे पूरे पुर्तगाली बेड़े में अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय वृत्तांतों के अनुसार, लड़ाई के दौरान एडमिरल मस्कारेन्हास मारा गया, जबकि अब्बक्का के सहयोगियों के समन्वित हमलों ने पुर्तगालियों को महल छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
रानी अबक्का की जीतें ज्यादा संख्या या ज्यादा ताकतवर हथियारों की वजह से नहीं, बल्कि उनकी बेहतरीन रणनीति की वजह से मिली थीं। अब्बक्का तटीय इलाके को अपने दुश्मन से कहीं बेहतर समझती थीं। उन्होंने पुर्तगालियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए स्थानीय जानकारी का इस्तेमाल किया, और तब हमला किया, जब वे बिल्कुल तैयार नहीं थे। रानी ने भूगोल को ही हथियार बना लिया। पारंपरिक समुद्री लड़ाइयों से बचकर और इसके बजाय तेजी से तटीय इलाकों में छापे मारकर, अचानक हमले करके और अलग-अलग स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर हमले करके, उन्होंने दुनिया की सबसे ताकतवर समुद्री ताकतों में से एक को मात दी।
उल्लाल की रानी ने साबित कर दिया कि हिम्मत, स्थानीय जानकारी और अनोखे तरीके से लड़ी गई लड़ाई सबसे ताकतवर साम्राज्य को भी चुनौती दे सकती है। उल्लाल में उनकी जीत और उसके बाद मंगलुरु पर किया गया त्वरित हमला, भारतीय इतिहास में स्थानीय लोगों द्वारा समुद्री मोर्चे पर किए गए प्रतिरोध के सबसे शुरुआती और सबसे शानदार उदाहरणों में से एक है।

