भाटनेर का किला (जो आज राजस्थान के हनुमानगढ़ में है) सुरक्षा के लिहाज से एक अहम जगह थी, क्योंकि यह मुल्तान से दिल्ली जाने वाले रास्ते को नियंत्रित करता था। किले के अंदर स्थानीय भाटी राजपूत शासक राव दुलचंद भाटी मौजूद थे। जब तैमूर की सेना किले के पास पहुंची, तब तक इस भाटी राजपूत नेता ने हमलावर सेना का मुकाबला करने का फैसला कर लिया था। उनके लिए यह कोई मामूली फैसला नहीं था, क्योंकि अगर वे आत्मसमर्पण कर देते, तो उनका पूरा इलाका तैमूर के सैनिकों की दया पर निर्भर हो जाता और किले में शरण लेने वाले सैकड़ों आम नागरिक लूटपाट और हत्या का शिकार हो जाते।
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