फरवरी 1873, अमृतसर। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही घंटों में एक ऐसी खबर पूरे शहर में फैल जाएगी, जो आने वाले वर्षों में सिख इतिहास की दिशा बदल देगी। यह किसी युद्ध की घोषणा नहीं थी, न किसी राजा की मृत्यु का समाचार। यह खबर थी केवल चार विद्यार्थियों की।
अमृतसर मिशन स्कूल में पढ़ने वाले छात्र आया सिंह, अतर सिंह, साधु सिंह और संतोख सिंह ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि वे अपना पैतृक सिख धर्म छोड़कर ईसाई धर्म स्वीकार करने जा रहे हैं। संख्या केवल चार थी, लेकिन इस घोषणा ने सिख समाज की आत्मा को झकझोर दिया। प्रश्न केवल इतना नहीं था कि चार छात्र धर्म क्यों बदल रहे हैं। असली प्रश्न यह था कि यदि पढ़े-लिखे सिख युवक ही अपने धर्म से दूर होने लगे, तो आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा?
समाचार कुछ ही समय में अमृतसर की गलियों से निकलकर श्री दरबार साहिब और अकाल तख्त तक पहुंच गया। माता-पिता चिंतित थे, ग्रंथी स्तब्ध थे, विद्वान परेशान थे। चार विद्यार्थियों का निर्णय अब चार परिवारों का मामला नहीं रह गया था। यह पूरे समुदाय के भविष्य का प्रश्न बन चुका था।
यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे अमृतसर में फैल गई और इसने पूरे सिख समाज को झकझोर कर रख दिया। जैसे ही यह समाचार श्री दरबार साहिब और अकाल तख्त साहिब के आसपास पहुंचा, तो सिख नेतृत्व में हड़कंप मच गया। चारों विद्यार्थियों के माता-पिता और पारिवारिक सदस्य तुरंत स्कूल पहुंचे, इसी पृष्ठभूमि में अकाल तख्त साहिब में 30 जुलाई 1873 को अमृतसर के गुरु बाग में एक आपातकालीन (Emergency) ऐतिहासिक बैठक बुलाई गई। जिसमें सिख ज्ञानी, विद्वान, सरदार और प्रमुख नागरिक शामिल हुए।
इसमें सरदार ठाकुर सिंह संधानवालिया (1837–1887), बाबा खेम सिंह बेदी (1832–1905), कंवर बिक्रमा सिंह (1835–1887) और इतिहासकार ज्ञानी ज्ञान सिंह (1824–1884) सहित अनेक प्रमुख सिख नेता उपस्थित हुए। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सिख धर्म की रक्षा, उसके इतिहास के प्रचार और समाज में फैल रही वैचारिक चुनौतियों का सामना करने के लिए एक संगठन बनाया जाए। यही निर्णय आगे चलकर श्री गुरु सिंह सभा के रूप में सामने आया।

सिंह सभा लिखित संविधान अपनाने वाला पहला सिख संगठन बना, जिसने इसके कार्यों में पारदर्शिता और नियमबद्धता लाई। इस कदम ने भविष्य के लोकतांत्रिक सिख संस्थानों और गुरुद्वारा सुधार आंदोलनों की मजबूत नींव रखी। इस सभा का उद्देश्य धर्मांतरण को रोकना तो था ही। इस के साथ ही सिख धर्म को उसकी मूल शुद्धता और परंपराओं में वापस लाना। ईसाई मिशनरियों और अन्य धर्म-परिवर्तन गतिविधियों का मुकाबला करना। गुरुमुखी लिपि और पंजाबी भाषा का प्रचार-प्रसार करना आदि शामिल था। बता दें कि सिख विद्वानों के प्रयासों से वे चारों छात्र तो धर्मांतरण से बच गए, और इस घटना से उपजे ‘सिंह सभा आंदोलन’ ने सिख धर्म में एक अभूतपूर्व पुनर्जागरण काल की शुरुआत की। इस आंदोलन ने सिख मर्यादा और शिक्षा को नई दिशा दी।
उस समय यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए सिख परिवार बड़ी संख्या में अपने बच्चों को मिशनरी विद्यालयों में भेज रहे थे। ऐसे में अमृतसर मिशन स्कूल के चार छात्रों की घोषणा को केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना गया। सिख विद्वानों और समुदाय के नेताओं को लगा कि यह आने वाले समय की एक बड़ी चुनौती का संकेत हो सकता है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि 1873 में शुरू हुआ यह संघर्ष आज भी खत्म नहीं हुआ। पंजाब में आज भी वही मिशनरी नेटवर्क, सामाजिक दूरियां और पहचान का संकट जारी है, जिसके कारण धर्मांतरण हो रहा है। आज फिर जरूरत है कि इतिहास से सबक लेते हुए सिख समाज अपनी जड़ों, शिक्षा और प्रचार व्यवस्था को मजबूत करे, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान पर गर्व कर सकें।

