भगत सिंह के शव से जुड़ा वह रहस्य, जिसे छिपाने के लिए अंग्रेजों ने लगा दिया था पूरा तंत्र

Bhagat Singh

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23 मार्च 1931…, यह तारीख सुनते ही हर भारतीय के मन में भगत सिंह के बलिदान का चित्र उभर आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस रात भारत के इस अमर क्रांतिकारी ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा, उसके बाद अंग्रेजों ने ऐसा क्या किया, जिसे दशकों तक लोगों की नजरों से छिपाकर रखा गया? 

यह कहानी सिर्फ एक फांसी की नहीं, बल्कि उस क्रूरता की है, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया था। अंग्रेजी हुकूमत ने केवल भगत सिंह की जान ही नहीं ली, बल्कि उनके निर्जीव शरीर तक से ऐसा व्यवहार किया, जो कोई जानवरों के साथ भी करने से पहले हजार बार सोचे। आखिर उस रात लाहौर सेंट्रल जेल के अंदर क्या हुआ था? क्यों अंग्रेज अधिकारियों ने इतनी जल्दबाजी दिखाई? आखिर क्यों भगत सिंह के पार्थिव शरीर के साथ ऐसी क्रूरता की गई? इस सवाल का जवाब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक अध्याय में छिपा है।

24 मार्च 1931 की सुबह भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जानी थी। लेकिन इनकी लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार भयभीत हो चुकी थी। इसके चलते तय समय से 12 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7:30 बजे लाहौर सेंट्रल में, तीनों क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से फांसी पर लटका दिया गया। इस दौरान जेल के अंदर ब्रिटिश अधिकारी स्टीड, बार्कर, रॉबर्ट्स, हार्डिंग मौजूद थे। साथ ही जेल के बाहर अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट शेख अब्दुल हामिद, सैकड़ों सशस्त्र पुलिसकर्मियों के साथ खड़ा था। अंग्रेज सरकार ने पूरी तैयारी कर रखी थी, क्योंकि उसे भय था कि कहीं जनता जेल पर धावा न बोल दे। फांसी के बाद जो होना था, उसकी योजना पहले से बनाई जा चुकी थी।

जैसे ही फंदे पर लटके भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के शरीर से प्राण निकले, उसके बाद अंग्रेज अधिकारियों ने एक पल भी इंतजार नहीं किया। शवों को फंदे से नीचे उतारा और जेल के भीतर बने एक सुनसान, कीचड़ से भरे गंदे गलियारे में शवों को घसीटकर ले जाया गया। लेकिन यह तो उस क्रूरता के सामने कुछ भी नहीं था, जो अंग्रेज आगे भगत सिंह सहित तीनों क्रांतिकारियों के शव के साथ करने वाले थे। ब्रिटिश अधिकारी स्टीड, बार्कर, रॉबर्ट्स, हार्डिंग ने निर्दयता के साथ क्रांतिकारियों के शवों को कई टुकड़ों में काटने का आदेश दिया। उनके निर्जीव देह से निकली खून की धार से जेल परिसर लाल हो गया, मानो धरती मां स्वयं उनके खून के एक-एक कतरे को खुद में समेट लेना चाहती हो। अंग्रेजों ने यह सब कुछ शवों की पहचान को छिपाने और उन्हें आसानी से बाहर ले जाने के लिए किया था। जिन शरीरों ने भारत की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे, अब उन्हें निर्दयता से काटकर अलग-अलग बोरियों में भर दिया गया था।

बोरियों में भरे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शव के अवशेषों को जेल के पिछले हिस्से से चुपचाप बाहर निकाला गया। बाहर पहले से तैयार ट्रक में उन्हें लादा गया। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच वाहन लाहौर से कसूर की ओर रवाना हुआ। सतलुज नदी के किनारे एक सुनसान स्थान पर, बिना परिवार की उपस्थिति में शव के क्षत-विक्षत अवशेषों को, जल्दबाजी में चिता पर रखकर आग लगा दी गई। अंग्रेजों का मात्र एक उद्देश्य था, ऐसा कोई निशान न बचे, जो आने वाली सुबह लाखों भारतीयों के गुस्से का कारण बने। क्योंकि उन्हें तीनों की लोकप्रियता का अंदाजा था।

लेकिन अंग्रेजों की यह योजना भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। सुबह होने को थी, इसलिए अवशेष अधजले होने के बावजूद, चिता को बुझा दिया गया। किसी को संदेह न हो इसके लिए अंग्रेजों ने अवशेषों को सतलुज नदी में फेंक दिया। लेकिन सुबह जब ग्रामीणों ने शरीर के अधजले अवशेषों को नदी में उतराते देखा तो उन्हें बाहर निकाला। फिर पूरे धार्मिक विधि-विधान और सम्मान के साथ भगत सिंह सहित तीनों क्रांतिकारियों के अवशेषों का अंतिम संस्कार किया गया। अगले दिन जब यह खबर पूरे देश में फैली कि तीनों क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से फांसी देकर, उनके शवों के टुकड़े कर बोरियों में भरकर ले जाया गया था, तो पूरे भारत में आक्रोश की लहर दौड़ गई।

अंग्रेज सरकार यह मान बैठी थी कि भगत सिंह के शरीर को यदि नष्ट कर दिया जाए, तो उनका प्रभाव भी समाप्त हो जाएगा। लेकिन हुआ ठीक इसके विपरीत, उनके शरीर को भले ही टुकड़ों में बांट दिया गया, लेकिन उनके विचारों को वह विभाजित नहीं कर सके। भगत सिंह आज भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में उसी सम्मान के साथ जीवित हैं। 

यह दर्शाता है क्रांतिकारी के शरीर के टुकड़े किए जा सकते थे, लेकिन उनके साहस, बलिदान और विचारों को कभी टुकड़ों में नहीं बांटा जा सका। आज भले ही देश के अधिकांश लोग भगत सिंह के शव के साथ हुई इस अमानवीय घटना के बारे में नहीं जानते हों, लेकिन यह अध्याय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक और क्रूर अध्यायों में गिना जाता है।