अक्टूबर 1948 का समय। कश्मीर युद्ध अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुका था। भारतीय सेना की 19 इन्फैंट्री डिवीजन उड़ी सेक्टर से आगे बढ़कर मुजफ्फराबाद और डोमेल की दिशा में दबाव बना रही थी। लेकिन रास्ते में केवल दुश्मन के सैनिक ही नहीं, बल्कि पहाड़ों पर तैनात विमानभेदी तोपों का एक घातक जाल भी खड़ा था। उरी, चकोटी और डोमेल क्षेत्र में लगी ये एंटी-एयरक्राफ्ट गनें भारतीय वायुसेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी थीं। जैसे ही कोई विमान नीचे आता, उस पर गोलियों और गोले की बौछार शुरू हो जाती।
भारतीय सेना जानती थी कि डोमेल पर दबाव डाले बिना आगे बढ़ना कठिन होगा। लेकिन डोमेल ब्रिज लगभग अभेद्य माना जाता था। यह पुल “लगभग 100 प्रतिशत एंटी-एयरक्राफ्ट सुरक्षा” के दायरे में था।
ऐसे लक्ष्य पर हमला करने की जिम्मेदारी श्रीनगर स्थित No. 1 Operational Wing को मिली, जिसकी कमान 28 वर्षीय विंग कमांडर हृषिकेश मूलगांवकर के हाथों में थी। उनके पास हॉकर Tempest Mk-II लड़ाकू विमान थे, लेकिन चुनौती केवल दुश्मन की गोलियां नहीं थीं, कश्मीर की संकरी घाटियां, ऊंचे पहाड़ और तेज गोता लगाते समय आने वाला Compressibility Effect भी उतना ही खतरनाक था।
ऐसी स्थिति में नंबर-1 ऑपरेशनल विंग के कमांडर विंग कमांडर हृषिकेश मूलगांवकर के सामने दो विकल्प थे- या तो सुरक्षित दूरी से सीमित हमला किया जाए, या फिर खतरा उठाकर उन तोपों को ही खत्म कर दिया जाए। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
“पहले तोपें खत्म करो, तभी सेना आगे बढ़ पाएगी।”Archive
मूलगांवकर ने अपने एक स्क्वाड्रन कमांडर के साथ नई रणनीति बनाई। पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की तोपें इस तरह छिपी थीं कि उन्हें निशाना बनाना आसान नहीं था। इसलिए उन्होंने स्वयं अग्रिम विमान में उड़ान भरने का फैसला किया। योजना यह थी कि नीचे उतरकर सीधा हमला किया जाए, भले ही इसका मतलब दुश्मन की गोलियों के बीच प्रवेश करना ही क्यों न हो।
सबसे बड़ा खतरा : दुश्मन की गोलियां ही नहीं, पहाड़ भी
सबसे बड़ा खतरा केवल दुश्मन की गोलियां नहीं थीं, बल्कि कश्मीर की ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं भी थीं। हॉकर्स टेम्पेस्ट विमानों पर भारी बम लदे हुए थे। पहाड़ों के बीच गोता लगाकर हमला करने के दौरान विमान इतनी तेज गति पकड़ सकता था कि वह “Compressibility Zone” में पहुंच जाए, जहां पायलट विमान पर नियंत्रण खो सकता था। यानी एक तरफ दुश्मन की गोलियां थीं और दूसरी तरफ पहाड़ों से टकराने या विमान के नियंत्रण खोने का खतरा।
लेकिन मूलगांवकर पीछे हटने वालों में से नहीं थे। उन्होंने उरी सेक्टर की विमानभेदी तोपों पर सीधे हमले का नेतृत्व किया। दुश्मन की गोलाबारी के बीच उड़ते हुए उन्होंने अपने विमानों को लक्ष्य तक पहुंचाया। जैसे-जैसे ये तोपें शांत होती गईं, भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ने की राह खुलती गई।

इसके बाद अगला लक्ष्य था डोमेल। यह वही डोमेल था जिसे अक्टूबर 1947 में बचाया नहीं जा सका था और जिसके पतन ने पूरे कश्मीर अभियान की दिशा बदल दी थी।
अब भारतीय वायुसेना उसी क्षेत्र पर दबाव बना रही थी। मूलगांवकर ने स्वयं डोमेल ब्रिज पर हमले का नेतृत्व किया। भारी विमानभेदी सुरक्षा के बावजूद उन्होंने अपने विमान को सीधे लक्ष्य के ऊपर ले जाकर हमला किया। उनके नेतृत्व में भारतीय विमानों ने डोमेल ब्रिज और उसके आसपास स्थित सैन्य ठिकानों पर प्रभावी बमबारी की। लगातार हवाई सहायता के कारण भारतीय सेना पूंछ, कारगिल और लेह से संपर्क स्थापित करने में सफल रही। यह केवल हवाई बमबारी नहीं थी, बल्कि जमीन पर लड़ रही सेना के लिए जीवनरेखा साबित हुई। डोमेल कोई साधारण पुल नहीं था। मुजफ्फराबाद के निकट झेलम और किशनगंगा (नीलम) नदियों के संगम पर स्थित यह स्थान पूरे पश्चिमी कश्मीर का रणनीतिक केंद्र था। जिस पर 22 अक्टूबर 1947 को कबायली आक्रमणकारियों ने डोमेल पर कब्जा कर लिया था और उसके पतन ने श्रीनगर का रास्ता खोल दिया था। मुरी और एबटाबाद से आने वाली सड़कें यहीं मिलती थीं और यहीं से हथियार, गोला-बारूद और सैनिक कश्मीर मोर्चे तक पहुंचते थे।
इसके बाद सादाबाद क्षेत्र पर भी हवाई हमले किए गए। लगातार हवाई सहायता के कारण भारतीय सेना को अपने अभियानों में महत्वपूर्ण मदद मिली। यही वह समय था जब भारतीय वायुसेना और थलसेना के बीच समन्वय युद्ध की दिशा तय कर रहा था। जमीन पर सैनिक आगे बढ़ रहे थे और आसमान से मूलगांवकर का विंग उनके लिए रास्ता साफ कर रहा था।
क्यों महत्वपूर्ण है यह कहानी?
क्योंकि मूलगांवकर केवल मुख्यालय में बैठकर आदेश देने वाले अधिकारी नहीं थे। जब सबसे खतरनाक मिशन सामने आया, तो उन्होंने अपने पायलटों को आगे भेजने के बजाय स्वयं कॉकपिट संभाला। उनके महावीर चक्र प्रशस्ति-पत्र में भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि वे कठिन और जोखिम भरे अभियानों में व्यक्तिगत रूप से नेतृत्व करते थे, जिससे पूरे विंग का मनोबल ऊंचा रहता था।
1947 में डोमेल का पतन कश्मीर के लिए संकट का प्रतीक बना था। लेकिन 1948 में उसी डोमेल पर भारतीय वायुसेना के साहसिक हमले यह संदेश दे रहे थे कि अब पहल भारत के हाथ में है। और उस पहल के अग्रिम मोर्चे पर थे विंग कमांडर हृषिकेश मूलगांवकर—एक ऐसा कमांडर, जिसने नक्शे पर नहीं, बल्कि दुश्मन की गोलियों के बीच रहकर युद्ध का नेतृत्व किया।
Book PDF- History of Operations in Jammu & Kashmir 1947-48- Archive https://www.bharat-rakshak.com/indianairforce/database/1644

