भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक चमकता हुआ सूरज, जो पराधीन भारत में भी ‘आजाद’ रहा, लेकिन अपनों के बुने मुखबिरी जाल में ऐसा फंसा, जिससे वह बचकर निकल नहीं सका। इस मुखबिरी की गवाही प्रयागराज का अल्फ्रेड पार्क आज भी दे रहा है।
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मात्र 24 साल की आयु में चंद्रशेखर आजाद ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनका यह बलिदान सिर्फ संयोग नहीं बल्कि एक विश्वासघात था। जिसके सुराग CID की एक गोपनीय चिट्ठी से जुड़े हैं। जिसमें इलाहाबाद के एक विशेष व्यक्ति के नाम का जिक्र है, जो आज भी पहेली बना हुआ है। यह व्यक्ति अंग्रेजों का मुखबिर था और पुलिस प्रशासन के दबाव में चंद्रशेखर आजाद से जुड़ी हुई जानकारियां उन्हें दे रहा था।
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