Recent Posts

  • जिस पुरातत्वविद् ने राम जन्मभूमि के दावों को पुरातात्विक आधार दिया : प्रो. बीबी लाल की अनसुनी कहानी

    जिस पुरातत्वविद् ने राम जन्मभूमि के दावों को पुरातात्विक आधार दिया : प्रो. बीबी लाल की अनसुनी कहानी

    भारत की धरती का कण-कण सनातन सभ्यता के गौरव का साक्षी है। कहीं हजारों वर्ष पुराने मंदिरों के भग्नावशेष हैं, तो कहीं मिट्टी की परतों में दबे ऐसे प्रमाण, जो इतिहास की भूली-बिसरी गाथाओं को फिर से जीवित कर देते हैं। 

    अयोध्या की पावन श्रीराम जन्मभूमि भी सदियों तक ऐसा ही एक रहस्य बनी रही। करोड़ों हिंदुओं की आस्था थी कि यही भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है, लेकिन समय के साथ यह प्रश्न भी इतिहास के सामने खड़ा हो गया कि क्या इस स्थान पर कभी एक भव्य मंदिर था। इस प्रश्न का उत्तर खोजने में जिस व्यक्ति का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है, वह हैं भारत के महान पुरातत्वविद् प्रोफेसर बीबी लाल (ब्रज बासी लाल)। उन्होंने अपनी कुदाल से ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य सामने रखे, जिन्होंने रामजन्मभूमि के ऐतिहासिक दावों को एक नया आधार दिया।

    और पढ़ें
  • ‘पेनांग 20’ : आजाद हिंद फौज का वह सीक्रेट मिशन, जिसके लिए 21 वर्षीय सत्येंद्र चंद्र बर्धन हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए

    ‘पेनांग 20’ : आजाद हिंद फौज का वह सीक्रेट मिशन, जिसके लिए 21 वर्षीय सत्येंद्र चंद्र बर्धन हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए

    10 सितंबर 1943, मद्रास सेंट्रल जेल (वर्तमान चेन्नई), सुबह का समय था। ब्रिटिश जेल प्रशासन ने फांसी की पूरी तैयारी कर ली थी। कुछ ही देर में तीन भारतीय युवकों—सत्येंद्र चंद्र बर्धन, अब्दुल कादिर और फौजा सिंह को एक-एक कर फांसी के तख्ते तक लाया गया। इनमें सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में 21 साल के सत्येंद्र चंद्र बर्धन थे। आखिरी इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने कोई निजी मांग नहीं रखी।

    उन्होंने ऊंची आवाज में ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष किया। कुछ ही क्षण बाद तीनों के गले में फंदा डाल दिया गया। ब्रिटिश सरकार की नजर में ये देशभक्त नहीं, बल्कि Enemy Agents Ordinance, 1943 के तहत ऐसे ‘दुश्मन एजेंट’ थे, जिन्हें जापान और आजाद हिंद फौज की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन को भीतर से कमजोर करने भेजा गया था।

    लेकिन इन तीनों की कहानी केवल फांसी तक सीमित नहीं थी। वे उस गोपनीय अभियान का हिस्सा थे, जिसे इतिहास ‘Penang 20’ (पेनांग 20) के नाम से जानता है।

    और पढ़ें
  • ऑपरेशन ट्राइडेंट : भारत ने कैसे कराची को तबाह करके पाकिस्तान के ऑपरेशन सोमनाथ का जवाब दिया

    ऑपरेशन ट्राइडेंट : भारत ने कैसे कराची को तबाह करके पाकिस्तान के ऑपरेशन सोमनाथ का जवाब दिया

    4 दिसंबर 1971 की रात को अरब सागर में आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे साहसिक नौसैनिक अभियानों में से एक को अंजाम दिया गया। कुछ ही घंटों में, भारतीय नौसेना ने पाकिस्तान के कड़े सुरक्षा घेरे वाले समुद्री इलाके में घुसकर दुश्मन के युद्धपोतों को नष्ट कर दिया और पाकिस्तानी नौसेना का मनोबल तोड़ दिया। इस मिशन का नाम ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ था, लेकिन इस जीत की योजना एक रात में नहीं बनी थी। इसकी तैयारी छह साल से चल रही थी। ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ की नींव छह साल पहले ‘ऑपरेशन सोमनाथ’ के दौरान ही पड़ गई थी।

    और पढ़ें
  • सिरिजाप की आखिरी लड़ाई से चीन के युद्धबंदी तक : मेजर धन सिंह थापा की युद्धबंदी गाथा

    सिरिजाप की आखिरी लड़ाई से चीन के युद्धबंदी तक : मेजर धन सिंह थापा की युद्धबंदी गाथा

    20 अक्तूबर 1962 की सुबह लद्दाख की पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर स्थित सिरिजाप-1 (Sirijap-1) चौकी चारों ओर से चीनी सेना से घिर चुकी थी। सामने लगभग 600 से अधिक चीनी सैनिक थे और चौकी की रक्षा में थे केवल 28 भारतीय गोरखा सैनिक। 

    उस चौकी का नेतृत्व कर रहे थे 1/8 गोरखा राइफल्स के कंपनी कमांडर मेजर धन सिंह थापा। उस दिन भारत ने उन्हें खो दिया समझा, लेकिन सच्चाई कुछ और थी। जिस अधिकारी को देश ने शहीद मानकर परमवीर चक्र दे दिया था, वह वास्तव में चीन की जेल में जीवित था और अगले कई महीनों तक युद्धबंदी के रूप में अमानवीय यातनाएं सहता रहा।

    और पढ़ें
  • कोरल मिल हड़ताल के दौरान वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ 1,700 मजदूरों का नेतृत्व कैसे किया?

    कोरल मिल हड़ताल के दौरान वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ 1,700 मजदूरों का नेतृत्व कैसे किया?

    जब तमिलनाडु में तूतीकोरिन (जिसे अब आधिकारिक तौर पर थूथुकुडी के नाम से जाना जाता है) में कोरल मिल के श्रमिक 27 फरवरी, 1908 को काम छोड़कर चले गए, यानी हड़ताल किया, तो वे बेहतर मजदूरी के लिए लड़ रहे थे। 

    हड़ताल खत्म होने तक उन्होंने ब्रिटिश राज का आत्मविश्वास हिला दिया था। ब्रिटिश स्वामित्व वाली सूती मिल के अंदर विरोध प्रदर्शन के रूप में जो शुरू हुआ, उसने जल्द ही तूतीकोरिन में श्रमिकों, वकीलों, व्यापारियों, किसानों और आम नागरिकों को एकजुट कर दिया। जिस व्यक्ति ने इसे संभव बनाया वह वी.ओ.सी. यानी चिदम्बरम पिल्लई थे। चिदम्बरम पिल्लई जो (वी.ओ.सी. के नाम से भी जाने जाते थे), एक प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, वकील और तमिलनाडु के उद्यमी थे, जिनके नेतृत्व ने स्थानीय श्रम विवाद को औपनिवेशिक सरकार के लिए संकट में बदल दिया।

    और पढ़ें
  • Battle of Asal Uttar : जब गन्ने के खेत बने पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान! 1965 में भारतीय सेना ने ऐसे पलट दिया पूरा युद्ध

    Battle of Asal Uttar : जब गन्ने के खेत बने पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान! 1965 में भारतीय सेना ने ऐसे पलट दिया पूरा युद्ध

    Battle of Asal Uttar : 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान ने पंजाब के खेमकरण सेक्टर में अपनी शक्तिशाली फर्स्ट आर्मर्ड डिवीजन उतारी। उसका लक्ष्य ब्यास नदी के पुल पर कब्जा कर पंजाब को भारत के बाकी हिस्सों से काटना था। शुरुआत में पाकिस्तानी सेना को कुछ बढ़त मिली, लेकिन 8 से 10 सितंबर 1965 के बीच तरनतारन जिले के असल उत्तर गांव के पास भारतीय सेना ने उसकी रणनीति को विफल कर दिया। 

    और पढ़ें
  • जब महादजी सिंधिया ने अंग्रेजों को खर्च के बोझ से हराया! ग्वालियर की वह कहानी, जिसे इतिहास में दबा दिया गया

    जब महादजी सिंधिया ने अंग्रेजों को खर्च के बोझ से हराया! ग्वालियर की वह कहानी, जिसे इतिहास में दबा दिया गया

    3 अगस्त 1780 को अंग्रेजों ने ग्वालियर के अभेद्य किले पर कब्जा कर लिया। यह सब कुछ तब हुआ, जब ग्वालियर के शासक महादजी सिंधिया, ग्वालियर में नहीं थे। आधुनिक तोपों और हथियारों के बल पर मिली इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को विश्वास हो गया था कि अब महादजी सिंधिया और मराठों की उत्तर भारत में शक्ति समाप्त हो जाएगी।

    लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता था कि महादजी केवल तलवार के बल पर युद्ध नहीं लड़ते थे, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत मराठा युद्ध नीति थी। आखिर में यही युद्ध नीति, अंग्रेजों पर आर्थिक रूप से इतनी भारी पड़ी कि वह संधि करने पर मजबूर हुए। जिसके बाद सिर्फ ग्वालियर किला ही नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-भाग फिर से महादजी के राज्य में शामिल हो गया। आखिर उन्होंने यह सब कैसे किया? वह कौन सा रणनीति थी?  यह काफी रोचक कहानी है।

    और पढ़ें
  • जब गुरु अमरदास के सामने नतमस्तक हुआ था अकबर, जानिए वो किस्सा जब आक्रांता को मिला था सबक!

    जब गुरु अमरदास के सामने नतमस्तक हुआ था अकबर, जानिए वो किस्सा जब आक्रांता को मिला था सबक!

    पंजाब की पावन धरती पर एक ऐसा ऐतिहासिक प्रसंग घटित हुआ, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की आध्यात्मिक शक्ति के सामने मुगल आक्रांताओं को भी झुकना पड़ा।

    इस ऐतिहासिक घटना में एक ओर था मुगल आक्रांता अकबर, तो दूसरी ओर थे गुरु अमर दास जी, जिनके पास न कोई सेना थी और न ही राजमहल। फिर भी जब अकबर का सामना गुरु अमरदास जी से हुआ, तो प्रभाव सत्ता का नहीं, बल्कि समानता, सेवा और सिद्धांतों का दिखाई दिया।

    अकबर जैसा कूटनीतिक मुगल आक्रांता, गुरु अमरदास जी के व्यक्तित्व और उनकी शिक्षाओं से इतना प्रभावित हुआ कि वह अपनी इस्लामिक विस्तारवादी नीति को छोड़, भूमिदान करने की इच्छा प्रकट करने लगा। लेकिन गुरु अमर दास जी ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। यह प्रसंग भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अद्वितीय उदाहरण है। जिसके बारे में अधिकांश लोगों को नहीं पता।

    और पढ़ें
  • राजा दाहिर की बेटियों, सूर्य देवी और परिमल देवी ने कैसे सिंध का बदला लिया और मुहम्मद बिन कासिम को हराया

    राजा दाहिर की बेटियों, सूर्य देवी और परिमल देवी ने कैसे सिंध का बदला लिया और मुहम्मद बिन कासिम को हराया

    दमिश्क के दरबार में खलीफा ने एक लकड़ी का बक्सा खोला और दो बंदी राजकुमारियों को अंदर देखने का आदेश दिया। यह खलीफा के सबसे सफल सेनापति, मुहम्मद बिन कासिम की लाश थी, जो एक सिली हुई बैल की खाल में सड़ रही थी। खलीफा ने कहा, “जो लोग मेरा अनादर करते हैं उनका यही हाल होता है।” लेकिन ये घटना घटी कैसे?

    712 ई. में, अरोर की लड़ाई में इस्लामिक आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध के राजा दाहिर की हत्या के बाद उनकी बेटियों सूर्या देवी और उनकी छोटी बहन परिमल देवी को जंजीरों में बांधकर घसीटा गया था। भारतीय इस्पात, रेशम, मसाले, हाथी दांत और कीमती रत्नों से लदे व्यापारिक जहाजों से भरा राजा दाहिर का समृद्ध क्षेत्र बिखर गया और उनकी बेटियों को खलीफा के लिए उपहार के रूप में दमिश्क भेज दिया गया।

    और पढ़ें
  • दिल्ली की लड़ाई 1737 : जब पेशवा बाजीराव प्रथम ने दिल्ली पर कब्जा किए बिना मुगल साम्राज्य को  नीचा दिखाया

    दिल्ली की लड़ाई 1737 : जब पेशवा बाजीराव प्रथम ने दिल्ली पर कब्जा किए बिना मुगल साम्राज्य को  नीचा दिखाया

    मार्च 1737 में, एक ऐसी घटना हुई, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। दक्कन से आई मराठा सेना मुगल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली के दरवाजों पर पहुंच गई। शाही दरबार में हड़कंप मच गया। मुगल कमांडर शहर की रक्षा के लिए दौड़े, जबकि सम्राट मुहम्मद शाह यह सब देखते रहे कि जिस ताकत ने लगभग दो सदियों तक भारत के ज्यादातर हिस्से पर राज किया था, उसे खुलेआम चुनौती दी जा रही थी।

    इस साहसी अभियान के पीछे पेशवा बाजीराव प्रथम थे, जो भारतीय इतिहास के सबसे महान सैन्य कमांडरों में से एक थे। दिल्ली की ओर उनके कूच का मकसद मुगल राजधानी को जीतना नहीं था। इसके बजाय, उनका मकसद एक मजबूत राजनीतिक संदेश देना था कि मुगल साम्राज्य अब भारत की सबसे बड़ी ताकत नहीं रहा। 

    और पढ़ें