3 अगस्त 1780 को अंग्रेजों ने ग्वालियर के अभेद्य किले पर कब्जा कर लिया। यह सब कुछ तब हुआ, जब ग्वालियर के शासक महादजी सिंधिया, ग्वालियर में नहीं थे। आधुनिक तोपों और हथियारों के बल पर मिली इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को विश्वास हो गया था कि अब महादजी सिंधिया और मराठों की उत्तर भारत में शक्ति समाप्त हो जाएगी।
लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता था कि महादजी केवल तलवार के बल पर युद्ध नहीं लड़ते थे, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत मराठा युद्ध नीति थी। आखिर में यही युद्ध नीति, अंग्रेजों पर आर्थिक रूप से इतनी भारी पड़ी कि वह संधि करने पर मजबूर हुए। जिसके बाद सिर्फ ग्वालियर किला ही नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-भाग फिर से महादजी के राज्य में शामिल हो गया। आखिर उन्होंने यह सब कैसे किया? वह कौन सा रणनीति थी? यह काफी रोचक कहानी है।
ग्वालियर किले पर कब्जा होने के बाद महादजी ने समझ लिया था कि अंग्रेजों की आधुनिक सेना से सीधे टकराना आत्मघाती होगा। वह जानते थे कि अंग्रेजों के पास बेहतर तोपें और आधुनिक हथियार हैं। लेकिन फिर भी वह किसी भी कीमत पर, मराठा शासन के स्वाभिमान के प्रतीक ग्वालियर किले पर अपना अधिकार चाहते थे।
ऐसे में उन्होंने सीधे मैदान में निर्णायक लड़ाई लड़ने के बजाए, पारंपरिक मराठों की युद्ध नीति ‘स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी’ (जलाओ और नष्ट करो की नीति) अपनाई। जिसके तहत महादजी की सेना ने अंग्रेजी सेना की रसद व्यवस्था की चेन पूरी तरह तोड़ दी। खेतों की फसलें नष्ट कर दी गईं, ताकि यहां से भी उन्हें खाने को कुछ न मिल सके। कुओं के पानी को पीने के लिए अनुपयोगी बना दिया। महादजी को पता था कि अंग्रेजों को हराने का सबसे प्रभावी तरीका उनकी रसद और संसाधनों पर प्रहार करना है, न कि केवल सैनिकों पर।

एक ओर महादजी अंग्रेजी सेना की सप्लाई चेक को तोड़ रहे थे, तो दूसरी ओर उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में गुरिल्ला युद्ध करने पर मजबूर कर रहे थे। ऐसा इसलिए, ताकि किसी एक निर्णायक युद्ध में अपनी पूरी शक्ति झोंकने के बजाय, संघर्ष को लंबा खींचा जा सके। मालवा और उत्तर भारत में मराठा सेना लगातार ‘स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी नीति के तहत अंग्रेजों पर दबाव बनाती रही।
अंग्रेजों के लिए दूसरा सबसे बड़ा झटका यह था, जहां उत्तर भारत में वह महादजी की सेना के साथ युद्ध लड़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी को मैसूर के शासक हैदर अली के साथ भी युद्ध लड़ना पड़ रहा था। महादजी जी ने अपनी रणनीति से ईस्ट इंडिया कंपनी को दो बड़े मोर्चों पर फंसा दिया था जिससे सैनिक, धन और रसद सामग्री लगातार समाप्त हो रही थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए युद्ध का खर्च असहनीय होता जा रहा था।
महादजी सिंधिया जानते थे कि समय अब उनके पक्ष में काम कर रहा है। उन्होंने युद्ध को इतना खींचा कि कंपनी की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। अंततः अंग्रेजों को महसूस हुआ कि इस युद्ध को केवल सैन्य बल और आधुनिक हथियारों के बल पर नहीं जीता जा सकता। उसके लिए महादजी जैसी रणनीति बनानी पड़ती है।
आखिर में 1 जुलाई 1781 को सिपरी नामक स्थान के पास महादजी सिंधिया को अंग्रेजों पर निर्णायक विजय प्राप्त हुई। ग्वालियर का किला जीतने के बाद भी, अंग्रेजों की हार हुई। 13 अक्टूबर 1781 को दोनों पक्षों के बीच अस्थायी युद्धविराम हुआ। अंग्रेज महादजी से संधि करने की गुहार लगाने लगे।
लगातार वार्ताओं के बाद 17 मई 1782 को ग्वालियर के निकट सालबाई गांव में ऐतिहासिक ‘सालबाई संधि’ हुई। इस संधि में अंग्रेजों ने मराठों से छीने गए अधिकांश प्रदेश लौटाने पर सहमति दी, यमुना के पश्चिम के क्षेत्रों पर महादजी सिंधिया के अधिकार को स्वीकार किया और सबसे महत्वपूर्ण बात, ग्वालियर का किला भी फिर से महादजी सिंधिया के अधीन आ गया। उत्तर भारत में महादजी का प्रभाव पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा।
यह संघर्ष बताता है कि महादजी सिंधिया की सबसे बड़ी जीत किसी एक युद्ध में नहीं, बल्कि उनकी पूरी रणनीति में थी। उन्होंने अंग्रेजों की रसद आपूर्ति को बाधित कर संधि के लिए गिड़गिड़ाने के लिए मजबूर किया। धैर्य के साथ अंग्रेजों को लंबे, महंगे तथा थकाऊ युद्ध में उलझाए रखा। उन्होंने समझ लिया था कि अंग्रेजों की असली ताकत उनकी आधुनिक सेना है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी लंबा युद्ध और बढ़ता खर्च है। महादजी ने उसी कमजोरी पर लगातार प्रहार किया। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज ग्वालियर का किला जीतकर भी पूरा युद्ध हार गए। जबकि महादजी सिंधिया किला खोकर भी अंततः विजेता बनकर उभरे।
यही कारण है कि इतिहास महादजी सिंधिया को केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि ऐसा रणनीतिकार मानता है, जिसने अपनी कूटनीति और धैर्य से अंग्रेजों को अपनी शर्तों पर संधि करने के लिए मजबूर कर दिया।

