10 सितंबर 1943, मद्रास सेंट्रल जेल (वर्तमान चेन्नई), सुबह का समय था। ब्रिटिश जेल प्रशासन ने फांसी की पूरी तैयारी कर ली थी। कुछ ही देर में तीन भारतीय युवकों—सत्येंद्र चंद्र बर्धन, अब्दुल कादिर और फौजा सिंह को एक-एक कर फांसी के तख्ते तक लाया गया। इनमें सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में 21 साल के सत्येंद्र चंद्र बर्धन थे। आखिरी इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने कोई निजी मांग नहीं रखी।
उन्होंने ऊंची आवाज में ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष किया। कुछ ही क्षण बाद तीनों के गले में फंदा डाल दिया गया। ब्रिटिश सरकार की नजर में ये देशभक्त नहीं, बल्कि Enemy Agents Ordinance, 1943 के तहत ऐसे ‘दुश्मन एजेंट’ थे, जिन्हें जापान और आजाद हिंद फौज की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन को भीतर से कमजोर करने भेजा गया था।
लेकिन इन तीनों की कहानी केवल फांसी तक सीमित नहीं थी। वे उस गोपनीय अभियान का हिस्सा थे, जिसे इतिहास ‘Penang 20’ (पेनांग 20) के नाम से जानता है।
इस कहानी की शुरुआत 15 फरवरी 1942 से होती है। उस दिन जापानी सेना ने सिंगापुर पर कब्जा कर लिया था। इस लड़ाई में लगभग 80,000 ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलियाई और भारतीय सैनिक युद्धबंदी बने, इनमें करीब 45,000 भारतीय सैनिक ही थे। इन्हीं भारतीय युद्धबंदियों में ब्रिटिश भारतीय सेना की 1st Battalion, 14th Punjab Regiment के अधिकारी कैप्टन मोहन सिंह भी शामिल थे। मोहन सिंह का मानना था कि यदि इन भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के बजाय भारत की आजादी के लिए संगठित किया जाए, तो एक राष्ट्रीय सेना खड़ी की जा सकती है।
जापानी खुफिया अधिकारी मेजर इवाइची फुजीवारा के सहयोग से उन्होंने भारतीय युद्धबंदियों को संगठित करना शुरू किया और सितंबर 1942 में पहली भारतीय राष्ट्रीय सेना (Indian National Army–INA) का गठन किया। हालांकि, जापानी सैन्य नेतृत्व से मतभेदों के कारण यह पहली INA दिसंबर 1942 तक लगभग निष्क्रिय हो गई। हालांकि इसके बाद 4 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर पहुंचे, इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का नेतृत्व संभाला और 5 जुलाई 1943 को आजाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन किया।
इसके लिए 1942 की पहली छमाही में मलाया (वर्तमान मलेशिया) के पेनांग द्वीप को गुप्त प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया। सिंगापुर के पतन के बाद मार्च से अगस्त 1942 के बीच पेनांग स्थित आजाद हिंद स्कूल तथा जापानी सैन्य खुफिया संगठन फूजीवारा किकन (F-Kikan) की देखरेख में लगभग 20 भारतीय युवकों का चयन किया गया। यही दल बाद में इतिहास में ‘Penang 20’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन युवकों में सत्येंद्र चंद्र बर्धन, वक्कम अब्दुल खदर, फौजा सिंह, आनंदन, बोनिफेस परेरा और सी. जी. के. रेड्डी जैसे नाम प्रमुख रूप से दर्ज मिलते हैं। इनका उद्देश्य भारत में एक गुप्त खुफिया नेटवर्क स्थापित करना था।
कई महीनों तक इन युवकों को सामान्य सैनिकों की तरह नहीं, बल्कि सीक्रेट इंटेलिजेंस एजेंट के रूप में प्रशिक्षित किया गया। उन्हें वायरलेस ट्रांसमीटर चलाना, मॉर्स कोड, सांकेतिक भाषा (Cipher Codes), नक्शा पढ़ना, समुद्री मार्गों की पहचान, विस्फोटकों का सीमित उपयोग, गुप्त संदेश भेजना, ब्रिटिश निगरानी से बचना, नकली पहचान (False Identity) के साथ रहना और खुफिया सूचनाएं एकत्र करना सिखाया गया। प्रशिक्षण के दौरान एजेंटों की वास्तविक पहचान तक सीमित लोगों को ही पता होती थी। एजेंटों को पूरे नेटवर्क की जानकारी नहीं दी जाती थी।
उसके बाद सितंबर 1942 के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर 1942 के अंतिम सप्ताह के बीच ‘पेनांग 20’ के पहले 20 एजेंटों को तीन अलग-अलग दलों में भारत भेजा गया। इनमें से दो दल जापानी पनडुब्बियों (Submarines) के माध्यम से समुद्री रास्ते से आए, जबकि तीसरा दल बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के अराकान और इम्फाल मार्ग से पैदल भारत में दाखिल हुआ। पहला दल 27 सितंबर 1942 की रात मालाबार तट के तानूर (Tanur, वर्तमान केरल) के निकट रबर की नावों से उतरा, जिसमें वक्कम अब्दुल खदर, आनंदन और उनके तीन साथी शामिल थे।
दूसरा दल, जिसमें सत्येंद्र चंद्र बर्धन भी थे, काठियावाड़ (वर्तमान गुजरात) के ओखा–द्वारका तट के पास पनडुब्बी से उतरा। पनडुब्बी से लगभग पांच मील (करीब 8 किमी) दूर समुद्र में रबर की नावें उतारी गईं और पूरी रात लहरों से जूझने के बाद वे भारतीय तट तक पहुंचे। तीसरा दल अराकान–मणिपुर सीमा के रास्ते भारत में प्रवेश करने वाला था, जिसमें फौजा सिंह सहित अन्य एजेंट शामिल थे।
इन एजेंटों को भारत पहुंचने के बाद बंगाल, उड़ीसा, मद्रास, बंबई (अब मुंबई), कराची और पश्चिमी तट के अलग-अलग हिस्सों में फैलना था। उनका पहला कार्य भारतीय सेना, रेलवे, डाक एवं तार विभाग, बंदरगाहों और स्थानीय क्रांतिकारियों के बीच ऐसे लोगों की पहचान करना था, जो ब्रिटिश शासन से असंतुष्ट थे। इसके बाद छोटे-छोटे गुप्त केंद्र स्थापित कर वायरलेस ट्रांसमीटर के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशिया स्थित INA मुख्यालय तक नियमित सूचनाएं भेजनी थीं। इन सूचनाओं में ब्रिटिश सेना की आवाजाही, नौसैनिक गतिविधियां, हवाई अड्डों की स्थिति, रेलवे मार्ग, हथियारों की आपूर्ति और सैन्य ठिकानों की जानकारी शामिल थी।
यह केवल जासूसी अभियान नहीं था। नेताजी की अंतिम योजना यह थी कि जब INA पूर्वोत्तर सीमा खासकर मणिपुर और असम की दिशा से भारत में प्रवेश करे, तब देश के भीतर पहले से तैयार यह नेटवर्क रेलवे लाइनों, टेलीग्राफ संचार, सैन्य रसद (Military Logistics) और ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र को बाधित करे। साथ ही भारतीय सेना के भीतर सहानुभूति रखने वाले सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया जाए।
1942 के अंतिम महीनों और 1943 की शुरुआत में इस मिशन को अमल में लाया गया। एजेंटों को छोटे-छोटे दलों में पनडुब्बियों (Submarines) तथा छोटी नौकाओं के माध्यम से भारत के तटों के निकट उतारा गया। कुछ दलों को उड़ीसा तट, कुछ को मालाबार तट और कुछ को पूर्वी समुद्री क्षेत्रों से प्रवेश कराने की योजना थी। आदेश स्पष्ट था सभी एजेंट अलग-अलग दिशाओं में निकल जाएंगे। कोई भी एजेंट दूसरे दल के पूरे संपर्क नेटवर्क से परिचित नहीं होगा।
लेकिन ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां विशेष रूप से Intelligence Bureau (IB), Criminal Investigation Department (CID) और Military Intelligence पहले से सतर्क थीं। अंग्रेजों को यह डर था कि यदि ‘पेनांग 20’ अपने नेटवर्क को स्थापित करने में सफल हो गया, तो पूरे भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ा सशस्त्र विद्रोह (Spy Ring) खड़ा हो जाएगा।
परिणाम ये हुआ कि भारत पहुंचते ही कई एजेंट गिरफ्तार कर लिए गए। कुछ वायरलेस उपकरण, सांकेतिक दस्तावेज और संपर्क संकेत भी ब्रिटिश अधिकारियों के हाथ लग गए।
ब्रिटिश सरकार ने इस मामले को सामान्य आपराधिक मुकदमा नहीं माना। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) चल रहा था और ब्रिटेन जापान के साथ युद्ध में था। इसलिए गिरफ्तार एजेंटों पर Enemy Agents Ordinance, 1943 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 121 (सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ना) सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए। ब्रिटिश अभियोजन पक्ष का तर्क था कि ये लोग जापान की सहायता से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध गुप्त युद्ध छेड़ने आए थे। मुकदमा तेज़ी से चलाया गया और बचाव के अवसर बेहद सीमित रहे।
आखिर अदालत ने सत्येंद्र चंद्र बर्धन, अब्दुल कादिर और फौजा सिंह को मृत्युदंड सुनाया। 10 सितंबर 1943 को मद्रास सेंट्रल जेल में तीनों को फांसी दे दी गई। इसी अभियान से जुड़े कुछ अन्य एजेंटों को आजीवन कारावास और कठोर दंड भी दिए गए।
‘पेनांग 20’ अपने घोषित उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। पर मिशन ने साबित कर दिया कि आज़ाद हिंद फौज केवल मोर्चे पर लड़ने वाली सेना नहीं बल्कि आधुनिक खुफिया युद्ध, संचार नेटवर्क और आंतरिक प्रतिरोध की रणनीति पर भी काम कर रही थी।

