सिरिजाप की आखिरी लड़ाई से चीन के युद्धबंदी तक : मेजर धन सिंह थापा की युद्धबंदी गाथा

Major Dhan Singh Thapa

Written by

in

20 अक्तूबर 1962 की सुबह लद्दाख की पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर स्थित सिरिजाप-1 (Sirijap-1) चौकी चारों ओर से चीनी सेना से घिर चुकी थी। सामने लगभग 600 से अधिक चीनी सैनिक थे और चौकी की रक्षा में थे केवल 28 भारतीय गोरखा सैनिक। 

उस चौकी का नेतृत्व कर रहे थे 1/8 गोरखा राइफल्स के कंपनी कमांडर मेजर धन सिंह थापा। उस दिन भारत ने उन्हें खो दिया समझा, लेकिन सच्चाई कुछ और थी। जिस अधिकारी को देश ने शहीद मानकर परमवीर चक्र दे दिया था, वह वास्तव में चीन की जेल में जीवित था और अगले कई महीनों तक युद्धबंदी के रूप में अमानवीय यातनाएं सहता रहा।

28 अप्रैल 1928 को शिमला में जन्मे धन सिंह थापा 28 अगस्त 1949 को 8 गोरखा राइफल्स में कमीशन हुए। अक्टूबर 1962 तक भारत-चीन सीमा पर तनाव चरम पर पहुंच चुका था। भारत की फॉरवार्ड पॉलिसी के तहत पैंगोंग झील के उत्तर में कई छोटी-छोटी चौकियां बनाई गई थीं। इनमें सिरिजाप-1 सबसे महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यह चुशूल हवाई पट्टी की सुरक्षा के लिए पहली रक्षा पंक्ति मानी जाती थी। यदि यह चौकी गिरती, तो चुशूल सेक्टर पर चीन का दबाव कई गुना बढ़ जाता।

19 अक्टूबर 1962 की रात मेजर थापा को साफ दिखाई देने लगा कि चीनी सेना असामान्य रूप से बड़ी संख्या में उनकी चौकी के चारों ओर एकत्र हो रही है। उन्होंने अपने सैनिकों से केवल एक आदेश कहा-“Dig fast, dig deep” यानी जितनी जल्दी हो सके, उतनी गहरी खाइयां खोदो।

AI Generated

20 अक्टूबर की भोर लगभग 4:30 बजे चीनी सेना ने भारी तोपों और मोर्टार से गोलाबारी शुरू कर दी। लगभग ढाई घंटे तक पूरी चौकी आग के गोले बरसने से कांपती रही। वायरलेस संचार लगभग नष्ट हो गया। इसके तुरंत बाद सैकड़ों चीनी सैनिक आगे बढ़े। मेजर थापा और उनके गोरखाओं ने हलकी मशीनगनों और .303 राइफलों से ऐसा जवाब दिया कि पहला हमला विफल हो गया। चीनी सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन यह शुरुआत भर थी।

कुछ देर बाद दूसरा हमला हुआ। 

इस बार गोलाबारी और भी भीषण थी। चीनी सैनिक झील की ओर से उभयचर नौकाओं (Amphibious Craft) के सहारे भी बढ़े। इसके बावजूद गोरखाओं ने उन्हें फिर पीछे धकेल दिया। तब चीन ने तीसरा और निर्णायक हमला किया। इस बार पैदल सेना के साथ बख्तरबंद वाहन और टैंक भी आगे बढ़े। लगातार कई घंटों की लड़ाई के बाद चौकी लगभग पूरी तरह तबाह हो चुकी थी। अधिकांश भारतीय सैनिक या तो शहीद हो चुके थे या गंभीर रूप से घायल थे।

इसी दौरान एक गोला सीधे मेजर थापा के बंकर पर गिरा। धुएं और मलबे के बीच वह किसी तरह बाहर निकले। उनके पास गोला-बारूद लगभग समाप्त हो चुका था। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वह खाई में कूद पड़े और नजदीकी लड़ाई में कई चीनी सैनिकों का सामना किया। अंततः वे गंभीर रूप से घायल अवस्था में चीनी सैनिकों द्वारा पकड़ लिए गए। चौकी पर मौजूद अधिकांश सैनिक या तो वीरगति को प्राप्त हो चुके थे या बंदी बना लिए गए थे।

भारतीय मुख्यालय तक जो सूचना पहुंची, उसमें बताया गया कि सिरिजाप-1 चौकी पर कोई भी जीवित नहीं बचा। बच निकलने वाले सैनिकों को भी यह नहीं पता था कि मेजर थापा जीवित पकड़े गए हैं। परिणामस्वरूप भारत सरकार और सेना ने उन्हें शहीद घोषित कर दिया। उनके अद्वितीय साहस के लिए 26 जनवरी 1963 को उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र देने की घोषणा कर दी गई। उस समय किसी को यह पता नहीं था कि पुरस्कार का वास्तविक अधिकारी चीन की जेल में जीवित बैठा है।

इसके बाद मेजर धन सिंह थापा के जीवन की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई। चीन उन्हें युद्धबंदी बनाकर अपने शिविर में ले गया, जहां हर दिन उनकी शारीरिक शक्ति से अधिक उनके मनोबल को तोड़ने की कोशिश होती थी। घंटों तक चलने वाली पूछताछ में उनसे भारतीय सेना की तैनाती, हथियारों और रणनीति से जुड़े प्रश्न पूछे जाते। कई बार एक ही सवाल अलग-अलग अधिकारियों द्वारा बार-बार पूछा जाता, ताकि उनके उत्तरों में विरोधाभास निकाला जा सके। उन्हें भारतीय सेना और सरकार के विरुद्ध बयान देने तथा चीनी प्रचार के समर्थन में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला जाता, लेकिन उन्होंने हर बार इनकार किया।

युद्धबंदी शिविर की परिस्थितियां भी किसी यातना से कम नहीं थीं। कड़ाके की ठंड, सीमित भोजन, अपर्याप्त चिकित्सा और अपने साथियों से अलग-थलग रहने की मजबूरी ने कैदियों की शारीरिक और मानसिक परीक्षा ली। घायल होने के बावजूद मेजर थापा को शीघ्र और पर्याप्त उपचार नहीं मिला। कई दिनों तक उन्हें अपने परिवार या भारत के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। चीनी अधिकारी लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते रहे कि भारत युद्ध हार चुका है और अब प्रतिरोध का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन मेजर थापा ने न तो कोई सैन्य जानकारी दी और न ही ऐसा कोई बयान दिया जिसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जा सके। उनके लिए यह कैद केवल शरीर की नहीं, बल्कि आत्मबल की भी परीक्षा थी और इस परीक्षा में भी वे उतने ही अडिग रहे, जितने सिरिजाप-1 की खाइयों में थे।

भारत में इस बीच उनके परिवार ने उन्हें शहीद मानकर श्रद्धांजलि दी। समाचार पत्रों में उनका नाम वीरगति प्राप्त अधिकारियों की सूची में प्रकाशित हुआ। देश ने उनके सर्वोच्च बलिदान को स्वीकार कर लिया था। लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद जब भारत और चीन के बीच युद्धबंदियों की सूची का आदान-प्रदान हुआ, तब एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि मेजर धन सिंह थापा जीवित थे। यह समाचार उनके परिवार, सेना और पूरे देश के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

21 नवंबर 1962 को चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की। इसके बाद अगले कुछ महीनों में युद्धबंदियों की वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई। अंत में 1963 में मेजर धन सिंह थापा अन्य भारतीय युद्धबंदियों के साथ स्वदेश लौटे। उनका स्वागत किसी विजेता की तरह हुआ। उनका परमवीर चक्र वापस नहीं लिया गया, क्योंकि यह सम्मान उनके अद्वितीय साहस के लिए था, न कि केवल उनकी शहादत की धारणा पर आधारित। युद्ध के बाद उन्होंने भारतीय सेना में अपनी सेवा जारी रखी। वे आगे चलकर लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे और 1980 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद कुछ समय उन्होंने नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी कार्य किया। 6 सितंबर 2005 को पुणे में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान वही रही, एक ऐसा गोरखा अधिकारी जिसने अंतिम गोली तक लड़ाई लड़ी, दुश्मन की कैद में भी अपना सिर नहीं झुकाया।