‘जहां भी जुल्म होगा, वहां क्रांति जरूर उठेगी!’ यह एक अटल सत्य है। इतिहास के पन्नों में दर्ज हर क्रांति का जन्म भूख, अपमान और अन्याय से ही हुआ है। जब 1946 में फरीदकोट रियासत में जुल्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, तब एक ऐसे योद्धा की कहानी सामने आई, जो लोगों की आवाज बना और जिसने उस जुल्म का डटकर मुकाबला किया। यह कहानी है ज्ञानी जैल सिंह के जीवन-संघर्ष की।
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National heritage, historical events, founding narratives
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फिल्म राजा हरिश्चंद्र : जब फिल्म में फिमेल रोल के लिए नहीं तैयार हुईं कोई महिला। जानिए, तब कैसे बनी थी फिल्म?
भारतीय सिनेमा की शुरुआती दौर में जब दादासाहेब फाल्के ने 1913 में अपनी और भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, तो उस समय की सामाजिक परिस्थितियों ने एक अनोखी चुनौती खड़ी की। फिल्म की मुख्य नायिका, रानी तारामती की भूमिका किसी महिला द्वारा नहीं निभाई जा सकी, क्योंकि कोई भी महिला एक्टिंग के लिए तैयार नहीं थी।
उस दौर में समाज में महिलाओं के लिए फिल्मों या थिएटर में काम करना वेश्यावृत्ति के समान माना जाता था। पर्दे की प्रथा, रूढ़िवादी सोच और परिवार की बदनामी के डर ने महिलाओं को स्क्रीन पर आने से पूरी तरह रोका हुआ था। फाल्के ने अखबारों में विज्ञापन दिए, नाचने वाली लड़कियों और वेश्याओं से संपर्क किया, लेकिन सब व्यर्थ रहा। कुछ वेश्याएं ऑडिशन के लिए आईं, लेकिन वे उस रोल के लिए फिट नहीं थीं, एक को चुना भी गया लेकिन उसके मालिक ने बीच में ही मना कर दिया।
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जब सत्यजीत रे ने गिरवी रखी पॉलिसी और पत्नी के गहने : फिल्म ‘पथेर पंचाली’ के पीछे छुपा 5 साल का असली संघर्ष
1950 का दशक। कलकत्ता (अब कोलकाता) की एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने वाला शांत युवक ने अपने मन में एक असंभव-सा सपना पाल लिया था। यह सपना था, फिल्म बनाने का, जो उस दौर में दिन में सपना देखने जैसा था।
यह युवक कोई और नहीं, बल्कि भारत के महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे थे। 2 मई 1921 को कोलकाता में जन्म लेने वाले सत्यजीत रे के पास पहली फिल्म बनाने के लिए न तो धन था और न ही अनुभव। फिर भी उनके दिल में एक कहानी धड़क रही थी, ‘पथेर पंचाली’ (पाथेर पांचाली भी प्रचलित) की।
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एडॉल्फ हिटलर द्वारा स्वस्तिक का दुरुपयोग: कैसे एक पवित्र प्रतीक का प्रयोग नस्लीय प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए किया गया
5,000 से भी ज़्यादा सालों से, स्वस्तिक भारतीय सभ्यता का एक ऐसा प्रतीक रहा है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है और पूरे उपमहाद्वीप में इसे खुशहाली, समृद्धि और शुभारम्भ का प्रतीक माना जाता है। यह निरंतरता का भी प्रतीक है, जिसका प्रयोग प्राचीन काल से लेकर आज तक बड़े स्तर पर होता आ रहा है।
हिंदुत्व परंपराओं में स्वस्तिक आज भी मंदिरों की दीवारों, घरों की चौखटों, पवित्र ग्रंथों, सिक्कों, वास्तुशिल्प के नमूनों और पूजा-पाठ की वस्तुओं पर दिखाई देता है।
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भारत के महान वीर योद्धा सरदार हरिसिंह नलवा, जिनके खौफ से अफगानी कट्टरपंथी पहनने लगे थे सलवार
अहमदशाह अब्दाली, महमूद गजनवी जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रांताओं ने जिस धरती से आकर भारत में लूटपाट और निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार किया, उसी गांधार (अफगानिस्तान) की धरती पर एक भारतीय वीर की ऐसी कहानी छिपी है, जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया। यह सच्ची कहानी एक ऐसे भारतीय शूरवीर की है, जिसके भय से कट्टरपंथी अफगानी पठान थर-थर कांपते थे। उसका खौफ इतना कि अफगानी पठान डर के मारे महिलाओं का सलवार पहने लगे थे।
यह योद्धा कोई और नहीं, बल्कि महान भारतीय शासक महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति सरदार हरि सिंह नलवा थे। जब उन्हें सीमांत इलाकों (खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान) का गवर्नर बनाया गया, तो डर के मारे कट्टरपंथी अफगान कबीलों ने अपनी इस्लामिक पहचान तक बदल डाली। हरि सिंह नलवा की यह कोई सामान्य सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि यह वह दौर था, जब एक भारतीय योद्धा ने सिर्फ भूगोल ही नहीं, बल्कि शत्रुओं की संस्कृति तक को प्रभावित कर दिया था।
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लेफ्टिनेंट जनरल के. बहादुर सिंह : वह व्यक्ति, जिसने NDC को बचाया
भारत की रक्षा संबंधी सोच 1959 में तब आकार लेने लगी, जब भारत ने नेशनल डिफेंस कॉलेज (NDC) की स्थापना की और बहादुर सिंह को इसका पहला कमांडेंट नियुक्त किया गया। इस संस्थान को आरम्भ से खड़ा करने की जिम्मेदारी संभालते हुए, बहादुर सिंह ने इसे केवल एक सैन्य प्रशिक्षण केंद्र से कहीं ज्यादा एक ऐसे मंच के रूप में ढाला, जहां वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और सिविल सेवक एक साथ रणनीति, शासन-प्रशासन और वैश्विक मामलों का अध्ययन करते थे, जिससे खुली चर्चा और विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा मिला।
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बिजोन सेतु नरसंहार : जब एक IAS अधिकारी ने चुप्पी तोड़नी चाही, तो सत्ता ने किया खामोश!
कोलकाता के बिजोन सेतु पर 30 अप्रैल 1982 की सुबह जो हुआ, उसे सिर्फ ‘उन्मादी भीड़ की करतूत’ कहकर टाल दिया गया। इसी दिन भड़की हिंसा में आनंद मार्ग के 17 साधुओं की पीट-पीटकर और जिंदा जलाकर हत्या कर दी गई। जिसके आरोप लगे कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर। घटना के 44 वर्ष बीत जाने के बाद भी, आज तक सबूतों के अभाव में पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिला।
लेकिन इस घटना का एक दबा हुआ पक्ष भी है। जिसकी चर्चा आमतौर पर नहीं होती। यह कहानी है, एक आईएएस अधिकारी की, जिसने फाइलों के पीछे छिपे सच को पढ़ लिया था। इस अधिकारी की नाम था शेर सिंह। यदि उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाता, तो यह प्रश्न अवश्य उठता कि उस दौरान बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार केवल असफल थी, या फिर जानबूझकर निष्क्रिय?
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पोप ने सॉरी क्यों कहा : कनाडा के रेजिडेंशियल स्कूलों के एक बच्चे की चुपचाप रोने की कहानी, क्या सॉरी काफी है?
1883 से 1996 तक, कनाडा सरकार ने ईसाई चर्चों के साथ पार्टनरशिप की थी। विशेष रूप से कैथोलिक चर्च, जो 139 रेजिडेंशियल स्कूलों में से 64 (46%) चलाता था, के साथ। उद्देश्य था, कम से कम 150,000 फर्स्ट नेशंस, इनुइट और मेटिस बच्चों को उनके परिवारों से जबरदस्ती निकालकर यूरो-कैनेडियन समाज में ‘मिलने’ के लिए मजबूर किया जा सके।
इन सरकारी पैसों से, चर्च चलाने वाले इंस्टीट्यूशन ने इंडिजिनस भाषाओं और रस्मों पर बैन लगा दिया। बच्चों को कैथोलिक धर्म अपनाने पर मजबूर किया। इतना ही नहीं, बच्चों को भूखा रखा गया, बड़े पैमाने पर टीबी (जिसमें मौत की दर आम आबादी से 5 गुना अधिक थी) से मौते हुईं। इसके अलावा बच्चों से मारपीट हुई और पादरियों और ननों द्वारा बड़े पैमाने पर उन्हें यौन शोषण का शिकार बनाया गया।
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पंचायती राज से नारी शक्ति वंदन अधिनियम तक: महिला सशक्तिकरण की 30वर्ष की यात्रा
जब भारत‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ मना रहा है, तो मीना बेन जैसी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि जमीनी स्तर के लोकतंत्र ने नेतृत्व के क्षेत्र में महिलाओं के लिए कैसे नए दरवाजे खोले हैं।
गुजरात के व्यारा गांव में एक शांत सुबह, गांव वालों का एक छोटा सा समूह पंचायत दफ्तर के पास इकट्ठा हुआ और आने वाले चुनावों पर चर्चा करने लगा। उम्मीदवारों में एक ऐसा नाम भी था, जिसने कई लोगों को चौंका दिया। नाम था-मीना बेन। एक ऐसे गांव में जहां महिलाएं सार्वजनिक सभाओं में भी शायद ही कभी बोलती थीं, वहां सरपंच के पद के लिए किसी महिला का चुनाव लड़ना लगभग अकल्पनीय लगता था।
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स्पेन के कैथोलिक चर्च में दुराचार का बड़ा खुलासा: कैसे सर्वाइवर मिगुएल हर्टाडो ने चर्च के यौन शोषण कांड को उजागर किया
“हां, 220 बच्चों का यौन शोषण हुआ। ये क्रूरता ईसाई चर्च के धार्मिक गुरु या मार्गदर्शक, पादरियों और धर्म प्रचारकों ने किए, जो भगवान के प्रतिनिधि माने जाते हैं।”
23 अप्रैल, 2021 को स्पेनिश कैथोलिक चर्च (स्पेनिश एपिस्कोपल कॉन्फ्रेंस) का यह बयान सुनकर पूरा संसार चकित रह गया। यह घटना, जिसने उन भक्तों को घोर धोखा दिया जो मानते थे कि उन्हें प्रभु यीशु के उन प्रतिनिधियों की सहायता से स्वर्ग में स्थान मिलेगा, कैथोलिक चर्च के इतिहास का सबसे कड़वा सच है।
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