1948 की दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के दफ्तर में एक महिला इंटरव्यू के लिए पहुंची। नाम था चोनिरा बेलियप्पा मुथम्मा (सी. बी. मुथम्मा)। यह वह समय था, जब भारतीय विदेश सेवा (IFS) का गठन हुए सिर्फ 2 वर्ष (9 अक्टूबर 1946) हुए थे और इस क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी लगभग न के बराबर थी। मुथम्मा लिखित परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करके यहां तक पहुंची थीं। लेकिन इंटरव्यू के कमरे में उनके सामने सवाल केवल उनकी योग्यता का नहीं था। सामने एक ऐसी व्यवस्था थी, जो पहले से मानकर चल रही थी कि विदेश सेवा महिलाओं के लिए उपयुक्त जगह नहीं है। मुथम्मा को बताया गया कि उन्हें कोई दूसरी सेवा चुननी चाहिए। लेकिन उन्होंने अपना मन नहीं बदला। वह भारतीय विदेश सेवा में जाना चाहती थीं।
इंटरव्यू के दौरान तत्कालीन UPSC चेयरमैन जोकि कांग्रेस सरकार के अंतर्गत आते थे, उन्होंने मुथम्मा को विदेश सेवा से हतोत्साहित करने की कोशिश की। मुथम्मा ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। इसके बाद बोर्ड के दूसरे सदस्यों से कहा गया कि उन्हें कम अंक दिए जाएं, ताकि उनका भारतीय विदेश सेवा में चयन न हो सके। कमरे में बैठे लोगों के लिए शायद यह केवल अंकों का सवाल था, लेकिन मुथम्मा के लिए यह उनके पूरे करियर का फैसला था। इंटरव्यू में कम अंक मिलने के बावजूद उनकी लिखित परीक्षा के मजबूत अंक उनके साथ थे। अंतिम चयन में वही अंक निर्णायक साबित हुए। जिस दरवाजे को उनके लिए बंद करने की कोशिश की गई थी, वह पूरी तरह बंद नहीं हो सका। 1949 में सी. बी. मुथम्मा भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुईं और इतिहास में दर्ज हो गया कि भारत को अपनी पहली महिला IFS अधिकारी मिल चुकी थी।
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