पंचायती राज से नारी शक्ति वंदन अधिनियम तक: महिला सशक्तिकरण की 30वर्ष की यात्रा

नारी शक्ति

जब भारत‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ मना रहा है, तो मीना बेन जैसी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि जमीनी स्तर के लोकतंत्र ने नेतृत्व के क्षेत्र में महिलाओं के लिए कैसे नए दरवाजे खोले हैं।

गुजरात के व्यारा गांव में एक शांत सुबह, गांव वालों का एक छोटा सा समूह पंचायत दफ्तर के पास इकट्ठा हुआ और आने वाले चुनावों पर चर्चा करने लगा। उम्मीदवारों में एक ऐसा नाम भी था, जिसने कई लोगों को चौंका दिया। नाम था-मीना बेन। एक ऐसे गांव में जहां महिलाएं सार्वजनिक सभाओं में भी शायद ही कभी बोलती थीं, वहां सरपंच के पद के लिए किसी महिला का चुनाव लड़ना लगभग अकल्पनीय लगता था।

फुसफुसाहटें जल्द ही खुले विरोध में बदल गईं। कुछ गांव वालों ने इस विचार पर हंसी उड़ाई, जबकि दूसरों ने जोर देकर कहा कि नेतृत्व करना महिलाओं का काम नहीं है। यहां तक कि अपने ही समुदाय के भीतर भी, मीना बेन को संदेह और विरोध का सामना करना पड़ा। चुनाव प्रचार के दौरान बहुत कम आर्थिक मदद और लगातार आलोचनाओं के बीच, आगे का रास्ता बहुत मुश्किल लग रहा था। फिर भी, मीना बेन ने पीछे हटने से इनकार कर दिया।

उनका यह साहस, एक ऐतिहासिक सुधार की वजह से संभव हो पाया था, जो कई साल पहले हुआ था। 1992 में, 73वें संवैधानिक संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया और स्थानीय शासन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दीं। पहली बार, पूरे भारत में अनगिनत ग्रामीण महिलाओं को फैसले लेने की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अवसर मिला।

इस अवसर का लाभ उठाते हुए, मीना बेन चुनावी मैदान में उतरीं और आखिरकार व्यारा गांव की पहली महिला सरपंच बनीं। उनकी जीत ने महिलाओं के नेतृत्व के बारे में चली आ रही पुरानी मान्यताओं को चुनौती दी। इस पल को और भी ज्यादा यादगार बनाने वाली बात यह थी कि उनके नेतृत्व में बनी पंचायत में सभी सदस्य महिलाएं ही थीं। उन्होंने उन रोजमर्रा की समस्याओं को हल करने पर ध्यान केंद्रित किया जिनका सामना गांव वाले सालों से कर रहे थे। उनके द्वारा किए गए आरम्भिक कार्यों में से एक था, गाव को आसपास के कस्बों से जोड़ने वाली एक पक्की सड़क का निर्माण। यह भले ही एक छोटा सा विकास कार्य लगे, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा हुआ। अब गर्भवती महिलाएं आपात स्थिति में ज्यादा आसानी से अस्पताल पहुंच सकती थीं, और गांव वाले बिना किसी कठिनाई के गांव के बाहर यात्रा कर सकते थे।

जब पंचायत का नेतृत्व महिलाएं कर रही थीं, तो स्थानीय शासन का माहौल भी बदल गया। गांव की महिलाएं बिना किसी हिचकिचाहट के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों और अपनी निजी चिंताओं के बारे में खुलकर बातें करने लगीं। मीना बेन के कार्यकाल के दौरान, 30 से ज्यादा परिवारों को रहने के लिए उचित घर मिले  और सरकारी कल्याणकारी योजनाएं लोगों तक ज्यादा प्रभावी ढंग से पहुंचने लगीं। धीरे-धीरे, वही गांव वाले जिन्होंने कभी उनके नेतृत्व पर शक किया था, अपने आसपास हो रहे बदलाव को देखने लगे।

मीना बेन जैसी कहानियां उस बड़े बदलाव को दिखाती हैं जो पंचायती राज सुधारों के साथ आरम्भ हुआ था। पिछले कुछ सालों में, स्थानीय शासन में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। आज, कई राज्यों ने अनुच्छेद 243(D) के तहत पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। अब, 73वें संशोधन के लगभग तीन दशक बाद, एक और अहम कदम ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (128वां संवैधानिक संशोधन) के रूप में सामने आया है, जिसका मकसद विधायी निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को मजबूत करना है।

इन सुधारों का असर पूरे देश में दिखाई दे रहा है। 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में स्थानीय शासन के तीन स्तरों पर 2.6 लाख से ज्यादा ग्राम पंचायतें काम कर रही हैं। इन सभी में मिलाकर लगभग 31 लाख चुने हुए प्रतिनिधि हैं, और इनमें से लगभग 46 प्रतिशत, यानी करीब 14 से 15 लाख—महिलाएं हैं

राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर  मीना बेन की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि जब महिलाओं को शासन में जगह दी जाती है, तो वे सिर्फ हिस्सा ही नहीं बनतीं, बल्कि वे अपने समुदायों में बदलाव भी लाती हैं।