फिल्म  राजा हरिश्चंद्र :  जब फिल्म में फिमेल रोल के लिए नहीं तैयार हुईं कोई महिला। जानिए, तब कैसे बनी थी फिल्म?

राजा हरिशचंद्र

भारतीय सिनेमा की शुरुआती दौर में जब दादासाहेब फाल्के ने 1913 में अपनी और भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, तो उस समय की सामाजिक परिस्थितियों ने एक अनोखी चुनौती खड़ी की। फिल्म की मुख्य नायिका, रानी तारामती की भूमिका किसी महिला द्वारा नहीं निभाई जा सकी, क्योंकि कोई भी महिला एक्टिंग के लिए तैयार नहीं थी।

उस दौर में समाज में महिलाओं के लिए फिल्मों या थिएटर में काम करना वेश्यावृत्ति के समान माना जाता था। पर्दे की प्रथा, रूढ़िवादी सोच और परिवार की बदनामी के डर ने महिलाओं को स्क्रीन पर आने से पूरी तरह रोका हुआ था। फाल्के ने अखबारों में विज्ञापन दिए, नाचने वाली लड़कियों और वेश्याओं से संपर्क किया, लेकिन सब व्यर्थ रहा। कुछ वेश्याएं ऑडिशन के लिए आईं, लेकिन वे उस रोल के लिए फिट नहीं थीं, एक को चुना भी गया लेकिन उसके मालिक ने बीच में ही मना कर दिया।

इस घोर निराशा के बीच फाल्के की नजर पड़ी एक रेस्तरां के रसोइए पर, जिसका नाम था अन्ना सालुंके। अन्ना सालुंके, जिनका पूरा नाम अन्ना हरि सालुंके था, ग्रांट रोड के एक छोटे से रेस्तरां में वेटर या कुक के रूप में काम करते थे। उनकी मासिक सैलरी सिर्फ 10 रुपए थी। फाल्के जब चाय पीने के लिए उस रेस्तरां गए, तो उन्होंने अन्ना की नाजुक कद-काठी, पतले हाथों और स्त्री-सुलभ नजाकत को देखा। वे तुरंत समझ गए कि यह युवक तारामती की भूमिका के लिए उपयुक्त हो सकता है। फाल्के ने उन्हें समझाया और 15 रुपये मासिक वेतन का लालच दिया। अन्ना शुरू में हिचकिचाए, लेकिन फाल्के के लगातार प्रयास और आर्थिक प्रलोभन से मान गए।

अन्ना सालुंके पुरुष और महिला किरदार में, वह पुरुष थे पर तारामती बनकर सबका दिल जीता

अब सबसे बड़ी समस्या मूंछों की थी। अन्ना और अन्य पुरुष कलाकार अपनी मूंछें नहीं मुंडवाना चाहते थे, क्योंकि उस समय हिंदू रिवाज के अनुसार पिता की मृत्यु से पहले मूंछ रखना एक तरह का धार्मिक कर्तव्य था। फाल्के ने उन्हें और उनके पिताओं को समझा-बुझाकर राजी किया। अंत में अन्ना ने मूंछें उतार दीं और साड़ी पहनकर, मेकअप लगाकर तारामती बन गए। इस तरह भारतीय सिनेमा की पहली ‘हीरोइन’ का रोल एक पुरुष रसोइए ने किया।

इस फैसले के पीछे 1913 के बॉम्बे की सामाजिक सच्चाई छिपी थी। थिएटर में भी स्त्री की भूमिकाएं पुरुष ही निभाते थे। फाल्के ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि उन्होंने कलाकारों से उनके परिवारों में कहलवाया कि वे ‘हरिश्चंद्र फैक्ट्री’ में काम करते हैं, ताकि उनके घरवालों को शक न हो। फिल्म की शूटिंग वांगणी और त्र्यंबकेश्वर के जंगलों में हुई, जहां पुरुष कलाकारों ने महिलाओं के काम जैसे चावल छानना और आटा गूंथना भी सीखा ताकि दृश्य प्राकृतिक लगें। अन्ना सालुंके की तारामती इतनी विश्वसनीय बनी कि दर्शक कभी नहीं सोच पाए कि यह कोई पुरुष है। साइलेंट फिल्म होने के कारण आवाज की कोई समस्या नहीं थी। सिर्फ इंटरटाइटल्स और भाव-भंगिमाओं से उन्होंने पत्नी की पीड़ा, मां का स्नेह और राजमहिषी का गौरव बखूबी उतारा। फिल्म की सफलता में उनकी भूमिका अहम थी, क्योंकि तारामती की कहानी बिना भावुकता के अधूरी रह जाती।

लगभग 15 हजार रुपए की लागत और 6 महीने 27 दिन के अथक प्रयास के बाद ‘राजा हरिश्चंद्र’ की शूटिंग पूरी हुई और 21 अप्रैल 1913 को बॉम्बे के ओलंपिया थियेटर में कुछ खास लोगों के लिए फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गई। ये वो लोग थे, जिन्हें फिल्मों की अच्छी समझ थी। इस स्क्रीनिंग में मिली प्रशंसा के बाद दादा साहेब ने फिल्म को आम लोगों के सामने लाने का फैसला किया।

3 मई 1913 वो ऐतिहासिक दिन था, जब बॉम्बे के कॉरोनेशन सिनेमाहॉल में भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ रिलीज की गई। फिल्म सुपरहिट साबित हुई और इसके साथ ही यह तारीख और दादा साहेब फाल्के का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’

अन्ना सालुंके की यह भूमिका महज एक संयोग नहीं थी, बल्कि भारतीय सिनेमा के विकास का प्रतीक बन गई। फिल्म रिलीज होने के बाद ‘राजा हरिश्चंद्र’ ने बॉम्बे में हाउसफुल शो किए और पूरे देश में चर्चा बनी। लोग पौराणिक कथा को स्क्रीन पर देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। अन्ना को रातोंरात प्रसिद्धि मिली। बाद में उन्होंने फाल्के की 1917 की फिल्म ‘लंका दहन’ में राम और सीता दोनों भूमिकाएं निभाईं। जो भारतीय सिनेमा का पहला डबल रोल था। उनकी काया अब ज्यादा मांसल हो चुकी थी, फिर भी साड़ी में सीता के रूप में वे बिंब दिखते थे। वह ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ (1917) में फिर तारामती बने और ‘सत्यनारायण’, ‘बुद्ध देव’ जैसी फिल्मों में भी स्त्री भूमिकाएं कीं। कुल मिलाकर अन्ना ने 1913 से 1931 तक लगभग अठारह वर्षों तक अभिनय किया और बाद में सिनेमैटोग्राफर बन गए। उनकी फिल्मोग्राफी में ‘अहिरावण महिरावण वध’, ‘पांडव वनवास’, ‘शिशुपाल वध’ जैसी माइथोलॉजिकल फिल्में शामिल हैं।

यह घटना उस दौर की जेंडर पॉलिटिक्स को उजागर करती है। जहां एक तरफ महिलाएं घर की चारदीवारी में कैद थीं, वहीं पुरुषों को स्त्री की भूमिकाएं निभानी पड़ रही थीं। फाल्के की मेहनत ने न केवल सिनेमा को जन्म दिया, बल्कि लिंग भेद की सीमाओं को भी चुनौती दी। अन्ना सालुंके जैसे कलाकारों ने साबित किया कि अभिनय कला लिंग से परे है। हालांकि, कुछ वर्ष बाद ही स्थिति बदलनी शुरू हुई। फाल्के की अगली फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में दुर्गा बाई कामत पहली असली महिला अभिनेत्री बनीं, जिनकी बेटी कमला बाई गोखले पहले बाल कलाकार बनीं। लेकिन अन्ना सालुंके की विरासत हमेशा याद रहेगी। 1944 में मात्र 47 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘पहली हीरोइन’ के रूप में अमर हैं।

आज जब हम बॉलीवुड की महिलाओं की स्वतंत्रता और विविध भूमिकाओं को देखते हैं, तो अन्ना सालुंके की कहानी हमें उस संघर्ष की याद दिलाती है जिसने इस उद्योग की नींव रखी। कोई महिला तैयार नहीं थी, इसलिए एक रसोइए ने साड़ी पहनी, मेकअप किया और इतिहास रच दिया।

फाल्के ने कहा था कि उन्होंने इंग्लैंड से लौटकर भारत की देवी-देवताओं को स्क्रीन पर लाने का सपना देखा था। उस सपने को साकार करने में अन्ना सालुंके जैसे अज्ञात नायक का योगदान अनमोल है।

30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र के नासिक में जन्मे दादासाहेब फाल्के (धुंडिराज गोविंद फाल्के) को भारतीय सिनेमा का पितामह कहा जाता है। उन्होंने भारत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण, निर्देशन और लेखन किया था। उन्हें भारतीय फिल्म उद्योग का जनक माना जाता है, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की नींव रखी।

दादा साहब फाल्के के नाम पर भारतीय फिल्मों का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ की स्थापना 1969 में हुई। और संयोग की बात है कि अपनी पहली फिल्म में किसी महिला को काम करने के लिए मनाने में असफल रहे दादा साहब के नाम से शुरू सर्वोच्च फिल्म पुरस्कार एक महिला देविका रानी को ही मिला।