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  • जब रानी लक्ष्मीबाई किले में घिर गई थीं, तब झलकारी देवी ने बचाई थी जान, जानिए बलिदान की अद्भुत कहानी!

    जब रानी लक्ष्मीबाई किले में घिर गई थीं, तब झलकारी देवी ने बचाई थी जान, जानिए बलिदान की अद्भुत कहानी!

    झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वह अमर सहयोगी, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर रानी को अंग्रेजों के चंगुल से बचाया, वह नाम है झलकारी बाई। 1858 के मार्च-अप्रैल में जब ब्रिटिश सेना के जनरल सर ह्यू रोज ने झांसी के किले को घेर लिया था, तब स्थिति अत्यंत विकट हो चुकी थी। इस घड़ी में झलकारी बाई ने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया, जो इतिहास की किताबों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया। आइए, जानते हैं कि झलकारी देवी रानी लक्ष्मीबाई के संपर्क में कैसे आईं, उनकी खास बनी और जब रानी पर खतरा मंडराया, तो किस तरह के अपनी जान पर खेलकर कैसे इतिहास रच दिया।

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  • रॉबेन द्वीप की अंधेरी जेल में कैसे मनाई गई ‘दीवाली’? मंडेला ने खुद बताया सच

    रॉबेन द्वीप की अंधेरी जेल में कैसे मनाई गई ‘दीवाली’? मंडेला ने खुद बताया सच

    रॉबेन द्वीप, दक्षिण अफ्रीका की वह सख्त जेल, जहां नेल्सन मंडेला ने अपने 27 वर्ष की कैद में से 18 साल बिताए। यहां की सलाखों के पीछे जीवन बेहद कठोर था। दिनभर की जीतोड़ मेहनत, सख्त नियम और अकेलेपन की घुटन। लेकिन हर साल दीवाली के आसपास एक अनोखी ज्योति यहां चमक उठती थी। 

    1991 में जेल से छूटने के एक साल बाद, 3 नवंबर को डरबन के सिटी हॉल में दिए गए अपने दीवाली भाषण में मंडेला ने भावुक होकर कहा कि दीवाली मुझे रॉबेन द्वीप पर बिताए दिनों की याद दिलाती है। यह सिर्फ एक स्मृति नहीं थी यह रंगभेद की अंधेरी जेल में प्रकाश, एकता और धार्मिक बहुलवाद की जीवंत मिसाल थी।

    मंडेला ने कहा कि रॉबेन द्वीप पर दीवाली का उत्सव नियमित रूप से मनाया जाता था, जब दुनिया भर के हिंदू दीप जलाकर प्रकाशोत्सव की तैयारी करते, तब जेल में हिंदू पुजारी विशेष अतिथि बनकर आते। मंडेला ने अपने भाषण में इनके नाम स्पष्ट रूप से लिए। केप टाउन से श्री गोवेंदर और प्रिटोरिया से श्री पदयाची, ये पुजारी हिंदू कैदियों के साथ प्रार्थना करने आते और मिठाइयों के पैकेट साथ लाते, जेल की दीवारें भले ही ऊंची हों, लेकिन इन पुजारियों की उपस्थिति कैदियों के लिए उम्मीद की किरण बन जाती। उन्होंने कहा कि हिंदू पुजारी प्रार्थना करते, रामायण की कथाएं सुनाते और दीवाली के प्रतीक अंधकार पर प्रकाश की जीत को जेल की अंधेरी कोठरियों तक पहुंचाते।

    मंडेला ने अपने भाषण में बताया कि जेल अधिकारियों की सोच संकीर्ण थी, वे कहते थे कि ये मिठाई के पैकेट केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए हैं, किसी गैर-हिंदू को छूने की अनुमति नहीं है। लेकिन मंडेला और उनके साथी कैदियों ने इस भेदभाव को चुनौती दी और तर्क दिया कि हिंदू धर्म का दर्शन समूची मानवता के लिए खुला है। इसका आधार संकीर्ण नहीं, बल्कि सार्वभौमिक है, यह सभी को गले लगाता है। कैदियों ने संघर्ष किया, बहस की और अंततः उन्हें जीत भी मिली। इस तरह रॉबेन द्वीप की जेल में दीवाली का उत्सव हिंदुओं तक सीमित नहीं रहा। यह सबके लिए साझा उत्सव बन गया।

    मंडेला ने बताया कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। इस उत्सव में मंडेला अपने भारतीय साथियों के साथ शामिल होते। जिसमें मुख्य रूप से विल्टन मकवाय, अहमद कथराडा, इस्माइल इब्राहिम, बिली नायर, मैक महाराज, इस्सू चिबा, जॉर्ज नायकर के साथ मंडेला दीवाली मनाते थे। इस दौरान प्रार्थना सभाएं होतीं, मिठाइयां बांटी जातीं और एक-दूसरे की संस्कृति को अपनाया जाता। जेल की कठोरता के बीच यह छोटा-सा आयोजन बड़ा संदेश देता था कि धर्म बंटवारे का नहीं, जोड़ने का माध्यम है। कैदी एक-दूसरे की परंपराओं को समझते, सम्मान देते और साथ बैठकर प्रकाश का उत्सव मनाते। दीपक जलाने का प्रतीक यहां जेल की अंधेरी रातों में नई उम्मीद जगाता। 

    मंडेला ने दीवाली को लेकर कहा कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। यह दीवाली उत्सव महज मिठाई बांटने या प्रार्थना तक सीमित नहीं था। यह रंगभेद की नीतियों के खिलाफ एक सूक्ष्म विद्रोह था। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय खासकर हिंदू लंबे समय से अपार्टहाइड  (Apartheid) यानी रंगभेद कानून का शिकार थे। लेकिन जेल में ये हिंदू पुजारी और कैदी मिलकर साबित कर रहे थे कि संस्कृतियां अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। मंडेला ने इस अनुभव को हमेशा याद रखा। उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा कि 5000 साल पुराने इस दीवाली के त्योहार से जुड़ना उनके लिए गर्व की बात है। 

    रॉबेन द्वीप की इन यादों ने मंडेला की सोच को गहराई दी। जेल की सलाखों के पीछे भी उन्होंने देखा कि कैसे हिंदू साथियों के साथ बिताया हर दीवाली का दिन अनेकता में एकता की नींव रखता है। पुजारियों के आने से न सिर्फ सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता, बल्कि हौसला भी बढ़ता। समाचार मिलते, संघर्ष की कहानियां साझा होतीं और कैदी एक-दूसरे के दर्द को समझते। यह घटना साबित करती है कि अपार्थाइड की अंधेरी ताकतों के खिलाफ दीपावली के प्रकाश की ज्योति कितनी शक्तिशाली हो सकती है। मंडेला और उनके साथियों ने इसे सामूहिक रूप से मनाकर दिखाया कि धर्म, जाति या रंग से ऊपर उठकर मानवता एक हो सकती है।

    आज भी रॉबेन द्वीप की यह दीवाली मनाने की कहानी प्रेरणा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सहिष्णुता और एकता का दीप जलाया जा सकता है। 

    बता दें कि नेलशन मंडेला ने अपार्थाइड (Apartheid) जोकि दक्षिण अफ्रीका में 1948 से 1994 तक लागू की गई एक कानूनी नस्लभेद प्रणाली थी, के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्हें इसी के चलते 12 जून 1946 को उम्रकैद की सजा हुई और उन्हें रॉबेन द्वीप (केप टाउन से करीब 12 किमी दूर) भेज दिया गया। वे 27 वर्ष (1964-1990) जेल में रहे, जिसमें 18 वर्ष रॉबेन द्वीप पर गुजरे। 11 फरवरी 1990 को उन्हें रिहा किया गया।

    (यह आर्टिकल नेल्सन मंडेला फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित 3 नवंबर 1991 के मूल भाषण पर आधारित है।)

  • एक अपाहिज बच्चा, एक फौलादी कंधा और जन्म हुआ पिंगलवाड़ा का, जानिए भगत पूरन सिंह की अद्भुत कहानी

    एक अपाहिज बच्चा, एक फौलादी कंधा और जन्म हुआ पिंगलवाड़ा का, जानिए भगत पूरन सिंह की अद्भुत कहानी

    एक ऐसा इंसान, जिसने एक अपाहिज बच्चे में भगवान को ढूंढ़ा और अपनी पीठ को ही उसका सिंहासन बना दिया। हम बात कर रहे हैं भगत पूरन सिंह की और उनके ‘प्यारा सिंह’ की, जिन्होंने पिंगलवाड़ा जैसी महान संस्था को जन्म दिया। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएंगे कि कौन थे भगत पूरन सिंह और पिंगलवाड़ा बनाने की प्रेरणा उनको कहां से मिली।   

    साल 1934, एक सर्द और काली अमावस्या की रात। लाहौर के ऐतिहासिक गुरुद्वारा देहरा साहिब के मुख्य द्वार पर सन्नाटा पसरा हुआ था। तभी अंधेरे में दो साये आए और एक पोटली जैसा कुछ जमीन पर रखकर गायब हो गए। लाहौर अभी सुबह की पहली किरण से जाग ही रहा था कि गुरुद्वारा देहरा साहिब के विशाल लकड़ी के द्वार पर एक छोटा-सा बच्चा तकरीबन चार साल का, अकेला बैठा रो रहा था। वह बच्चा न बोल सकता था, न चल सकता था और न ही अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकता था। बच्चे में ‘स्पास्टिक और कुष्ठ रोग के शुरुआती लक्षण थे।

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  • स्वाधीनता की लड़ाई के बीच पनपी एक लव स्टोरी : एडविना की मौत पर नेहरू ने क्यों ब्रिटेन भेजा था INS त्रिशूल?

    स्वाधीनता की लड़ाई के बीच पनपी एक लव स्टोरी : एडविना की मौत पर नेहरू ने क्यों ब्रिटेन भेजा था INS त्रिशूल?

    1940 के दशक में भारत का स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर था। जहां एक ओर क्रांतिकारी अंग्रेजों से लड़ते हुए, अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे, तो दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसी कहानियां भी जन्म ले रही थीं, जिनकी चर्चा लंबे समय तक होती रही। 

    इन्हीं चर्चित घटनाओं में एक नाम बार-बार सामने आता है, जवाहर लाल नेहरू और भारत में अंतिम ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन की पत्नी एडविना का। जब देश स्वतंत्रता की लड़ाई के अंतिम दौर में था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे अनेक क्रांतिकारी अंग्रेजों से आरपार की लड़ाई लड़ते हुए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह क्रम आगे भी जारी था। लेकिन इस दौर में नेहरू और एडविना की निकटता चर्चा का विषय बन चुकी थी। तत्कालीन कई राजनेताओं, अधिकारियों और जीवनीकारों ने इन संबंधों का उल्लेख अपने संस्मरणों और किताबों में किया है, जिससे यह प्रेम कहानी इतिहास और राजनीति के बीच, एक विवादित अध्याय के रूप में दर्ज है।

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  • वास्को डी गामा ने स्वयं भारत का रास्ता नहीं खोजा था, अफ्रीका से भारत तक एक गुजराती नाविक ने दिखाया था रास्ता

    वास्को डी गामा ने स्वयं भारत का रास्ता नहीं खोजा था, अफ्रीका से भारत तक एक गुजराती नाविक ने दिखाया था रास्ता

    वास्को डी गामा की यात्रा 8 जुलाई 1497 को पुर्तगाल के लिस्बन से शुरू हुई थी, जब पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने उन्हें चार जहाजों और 170 नाविकों के साथ मसालों की तलाश में भारत भेजा। वे अफ्रीका के पश्चिमी तट से होते हुए केप ऑफ गुड होप पार कर गए, लेकिन वहां से आगे हिंद महासागर का रास्ता उनके लिए पूरी तरह अज्ञात था। मानसून की हवाएं, समुद्री धाराएं और तारों से दिशा तय करना यूरोपियों को नहीं आता था। 

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  • फिल्म  राजा हरिश्चंद्र :  जब फिल्म में फिमेल रोल के लिए नहीं तैयार हुईं कोई महिला। जानिए, तब कैसे बनी थी फिल्म?

    फिल्म  राजा हरिश्चंद्र :  जब फिल्म में फिमेल रोल के लिए नहीं तैयार हुईं कोई महिला। जानिए, तब कैसे बनी थी फिल्म?

    भारतीय सिनेमा की शुरुआती दौर में जब दादासाहेब फाल्के ने 1913 में अपनी और भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, तो उस समय की सामाजिक परिस्थितियों ने एक अनोखी चुनौती खड़ी की। फिल्म की मुख्य नायिका, रानी तारामती की भूमिका किसी महिला द्वारा नहीं निभाई जा सकी, क्योंकि कोई भी महिला एक्टिंग के लिए तैयार नहीं थी।

    उस दौर में समाज में महिलाओं के लिए फिल्मों या थिएटर में काम करना वेश्यावृत्ति के समान माना जाता था। पर्दे की प्रथा, रूढ़िवादी सोच और परिवार की बदनामी के डर ने महिलाओं को स्क्रीन पर आने से पूरी तरह रोका हुआ था। फाल्के ने अखबारों में विज्ञापन दिए, नाचने वाली लड़कियों और वेश्याओं से संपर्क किया, लेकिन सब व्यर्थ रहा। कुछ वेश्याएं ऑडिशन के लिए आईं, लेकिन वे उस रोल के लिए फिट नहीं थीं, एक को चुना भी गया लेकिन उसके मालिक ने बीच में ही मना कर दिया।

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  • पोप ने सॉरी क्यों कहा : कनाडा के रेजिडेंशियल स्कूलों के एक बच्चे की चुपचाप रोने की कहानी, क्या सॉरी काफी है?

    पोप ने सॉरी क्यों कहा : कनाडा के रेजिडेंशियल स्कूलों के एक बच्चे की चुपचाप रोने की कहानी, क्या सॉरी काफी है?

    1883 से 1996 तक, कनाडा सरकार ने ईसाई चर्चों के साथ पार्टनरशिप की थी। विशेष रूप से कैथोलिक चर्च, जो 139 रेजिडेंशियल स्कूलों में से 64 (46%) चलाता था, के साथ। उद्देश्य था, कम से कम 150,000 फर्स्ट नेशंस, इनुइट और मेटिस बच्चों को उनके परिवारों से जबरदस्ती निकालकर यूरो-कैनेडियन समाज में ‘मिलने’ के लिए मजबूर किया जा सके।

    इन सरकारी पैसों से, चर्च चलाने वाले इंस्टीट्यूशन ने इंडिजिनस भाषाओं और रस्मों पर बैन लगा दिया। बच्चों को कैथोलिक धर्म अपनाने पर मजबूर किया। इतना ही नहीं, बच्चों को भूखा रखा गया, बड़े पैमाने पर टीबी (जिसमें मौत की दर आम आबादी से 5 गुना अधिक थी) से मौते हुईं। इसके अलावा बच्चों से मारपीट हुई और पादरियों और ननों द्वारा बड़े पैमाने पर उन्हें यौन शोषण का शिकार बनाया गया।

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  • जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू का अहंकार : जब एक अपमान बन गया ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय

    जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू का अहंकार : जब एक अपमान बन गया ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय

    भारत के इतिहास का एक ऐसा युद्ध नायक, जिसने दूसरे विश्व युद्ध में दुश्मनों को धूल चटाई और 1948 में पाकिस्तान को हराया, लेकिन उसे अपने ही देश के रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा अपमान और षड्यंत्र का सामना करना पड़ा। वह थे जनरल कोडांडेरा सुबैया थिमैया, जो 1957 से 1961 तक भारतीय सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रहे। उन्होंने नेहरू को तब आगाह किया, जब देश में ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का खोखला नारा गूंज रहा था, जबकि सीमा पर चीन विस्तारवाद की चालाकियां चल रहा था।

    जनरल थिमैया ने चीन की इस नीति को पहले ही भांप लिया था। लेकिन नेहरू और रक्षामंत्री वीके कृष्णा मेनन ने उनकी चेतावनियों को न केवल ठुकराया, बल्कि उन्हें अपमानित कर सेनाध्यक्ष पद के इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। यह सच्ची कहानी है ‘एक वीर की राष्ट्रनिष्ठा और दो लोगों के अहंकार के बीच हुई टक्कर की’ जिसके चलते हमें चीन के हाथों बडा भू-भाग गंवाना पड़ा।

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  • राजपूत राजा और भगवान श्रीनाथ जी की कहानी : मेवाड़ ने कैसे उसे बचाया जिसे एक साम्राज्य नष्ट नहीं कर सका

    राजपूत राजा और भगवान श्रीनाथ जी की कहानी : मेवाड़ ने कैसे उसे बचाया जिसे एक साम्राज्य नष्ट नहीं कर सका

    1669 में, मुगल आक्रांता औरंगजेब ने पूरे उत्तर भारत में बड़े हिंदू मंदिरों को एक साथ तोड़ने का आदेश दिया। कुछ ही महीनों में, मथुरा और ब्रज क्षेत्र में पवित्र इमारतों को गिरा दिया गया। सबसे पूजनीय देवताओं में से एक, ‘श्रीनाथजी’, जो श्रीकृष्ण के बाल रूप थे, को अपवित्र किए जाने का खतरा था। उनकी मूर्ति मंदिर के साथ नष्ट नहीं हुई,  प्रतिमा को सावधानी पूर्वक वहां से पहले ही हटा दिया गया।

    लगभग 3 साल तक, यह प्रतिमा चुपचाप पूरे उत्तर भारत में घुमाई जाती रही, छिपाई गई, सुरक्षित रखी गई और आवश्यकता पड़ने पर स्थान से हटाई भी गई। मूर्ति को सिंहद में फिर से स्थापित करने से पहले 32 महीने की यात्रा पर ले जाया गया। यह पवित्र मूर्ति मुगल सत्ता के सबसे मजबूत दौर में कैसे बची रही? इसका जवाब 1671 में मेवाड़ साम्राज्य में लिए गए एक फैसले में है।

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  • शिक्षा के माध्यम से लोगों को प्रभावित करना : एंथनी फ्रांसिस शर्मा की स्मार्ट ‘गॉस्पेल’ रणनीति

    शिक्षा के माध्यम से लोगों को प्रभावित करना : एंथनी फ्रांसिस शर्मा की स्मार्ट ‘गॉस्पेल’ रणनीति

    नेपाल के ऊंचे पहाड़ों में, जहां हिंदू धर्म को प्रभुत्व था और धर्म बदलना कानून के विरुद्ध था, एंथनी फ्रांसिस शर्मा ने स्कूलों का प्रयोग करके लोगों को चुपचाप क्राइस्ट के पास लाने का काम किया।

    12 दिसंबर, 1937 को गोरखा जिले के एक गरीब हिंदू परिवार में जन्म लेने वाला एंथनी फ्रांसिस शर्मा ने साबित किया हैं कि कैसे जेसुइट स्कूल गॉस्पेल शेयर (ईसाई धर्म का संदेश (गॉस्पेल) दूसरों तक पहुंचाना या बताना)। करने के गुप्त अस्त्र बन गए। उसने लोगों को सीख देकर अपनी ओर खींचा और विश्वास के सबक भी सिखाए। उसका जीवन हमें बताता है, शिक्षा, जीसस का मैसेज वहां भी फैला सकती है, जहां इस पर रोक है।

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