एक ‘मृत सिपाही’ को गवाह बनाकर अंग्रेजों ने 172 लोगों को सुनाई थी फांसी की सजा

चौरी-चौरा कांड

सोचिए, अगर कोई मृत व्यक्ति अदालत में पहुंचकर गवाही दे और उसकी गवाही पर 172 लोगों को फांसी की सजा भी सुना दी जाए। शायद किसी को भी इस बात पर विश्वास नहीं होगा, लेकिन यह घटना बिल्कुल सच है। बस, इसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। 

यह घटना है, 1922 में गोरखपुर में हुए चौरी-चौरा कांड की। इसमें अंग्रेजों ने सैकड़ों किसानों के जीवन का फैसला चंद कागजों और गुमनाम बयानों से तय किया था। जिसका गवाह था, ब्रिटिश इंडियन पुलिस में काम करने वाला एक सिपाही, जिसे अंग्रेज पहले ही मृत घोषित कर चुके थे।

ब्रिटिश जज ने उसी मृत सिपाही के बयान के एक-एक शब्द को सबूत मानकर 172 भारतीयों को मौत की सजा सुनाई। तब सवाल उठता है कि आखिर वह सिपाही कौन था? जिसे मोहरा बनाकर ब्रिटिश सरकार ने  दमन की मिसाल कायम की। चौरी-चौरा की घटना में न्याय से ज्यादा साजिश थी और साजिश से अधिक क्रूरता। इस आर्टिकल में हम क्रूरता के अनसुने पहलुओं को जानेंगे।

2 फरवरी 1922 को गोरखपुर के गौरी बाजार में ग्रामीणों ने महंगाई, शराब की दुकानों और लगान के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। लेकिन ग्रामीणों के अनुशासित विरोध प्रदर्शन को ब्रिटिश पुलिस ने जान-बूझकर हिंसा में बदल दिया। पहले पुलिस ने ग्रामीणों पर लाठियां बरसाईं फिर और फिर कई लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया। 

इसका विरोध करने के लिए हजारों की संख्या में क्रांतिकारी 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा थाने के सामने जमा हुए। लेकिन पुलिस ने अचानक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर गोलियों की बौछार कर दी, जिनसे तीन निर्दोष मारे गए। इस घटना से आक्रोशित भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया और फिर थाने में आग लगा दी। आगजनी में 22 पुलिसकर्मियों की मौत हुई। अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी के साथ, इन्हीं मृतकों की सूची में कांस्टेबल रघुबीर सिंह का भी नाम शामिल करा दिया।

रघुबीर को ‘मृत’ बताकर अंग्रेजों ने मृतकों की संख्या बढ़ाई। उन्होंने यह सब रणनीति इसलिए बनाई थी, ताकि घटना को संगठित, रक्तपातपूर्ण विद्रोह सिद्ध किया जा सके। लेकिन अंग्रेजों के पास कोर्ट में यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य ही नहीं थे। 

तभी घटना के 7 महीने बाद 22 सितंबर 1922 को अचानक कांस्टेबल रघुबीर सामने आया, जिसे अंग्रेजों ने मृत बताकर शहीद घोषित कर दिया था। अंग्रेजों ने कोर्ट में रघुबीर से यह बयान दिलवाया कि घटना के समय वह व्यक्तिगत काम से मुंडेरा बाजार गया था। वापस आते समय उसे थाने में आग लगाने की जानकारी मिली। जिसके चलते वह पास में रहने वाले किसान हीरालाल के बगीचे में छिप गया। फिर रात करीब 10 बजे दारोगा लक्ष्मण सिंह उसे बगीचे से निकालकर साथ ले गए। ‘मृत कांस्टेबल’ का यह जीवित होना ही केस का पहला बड़ा मोड़ बना।

गोरखपुर सेशन कोर्ट के जज एचई होल्मस की अदालत में चौरा-चौरी कांड के ‘जीवित साक्ष्य’ के तौर पर कांस्टेबल रघुबीर को पेश किया गया। 7 महीनों तक अंग्रेजों ने उसे बिना वकील, बिना परिवार की जानकारी, हिसारत में रखकर गवाही के लिए तैयार किया। गवाही के दौरान  ब्रिटिश जज एचई होल्मस ने भी उनकी सभी बातों सबूत के तौर पर माना और 172 अभियुक्त ग्रामीणों को फांसी की सजा सुना डाली। एक साथ 172 लोगों को फांसी की सुजा सुनाना यह कोई सामान्य बात नहीं थी। अंग्रेजों की यह क्रूरता राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई। 

तब प्रसिद्ध वकील और स्वाधीनता संग्राम सेनानी मदन मोहन मालवीय जी की इस केस में इंट्री हुई। मालवीय जी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज एचई होल्मस के फैसले को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि जब आगजनी हुई, तो उसके धुएं में लोगों की पहचान कैसे हुई? मालवीय जी ने हाई कोर्ट में ग्रामीणों के पक्ष में ऐसे ही मजबूत तर्क रखे। जिसका परिणाम यह हुआ कि कांस्टेबल रघुबीर की गवाही के आधार पर जिन 172 ग्रामीणों को फांसी की सजा सुनाई गई थी, उसे रद्द करना पड़ा। लेकिन फिर भी दमनकारी अंग्रेजी हुकूमत ने हाईकोर्ट के माघ्यम से 19 ग्रामीणों को फांसी की सजा सुनाई।

शहीद स्मारक  चौरी चौरा, पिक्चर क्रेडिट : theprint.in

19 को फांसी की सजा के अलावा, 2 ग्रामीणों की पुलिस हिरासत में मौत भी हुई। साथ ही 14 ग्रामीणों को आजीवन कारावास, 19 को 8 साल का सश्रम कारावास, 57 को 5 साल का कारावास, 20 को 3 साल का कारावास, 3 क्रांतिकारियों को 2 साल का कारावास की सजा सुनाई। केवल 38 लोग दोषमुक्त हुए। यह सब अंग्रेजों ने चालाकी से कॉन्स्टेबल रघुबीर को गवाह बनाकर कराया। इस घटना के बाद देशवासियों के बीच अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा और फूट पड़ा। 1947 में हमारा देश स्वाधीन हुआ और इस घटना का भी स्वतंत्रता मिलने में बड़ा योगदान रहा।