वह चिंगारी जिसने ज़ुल्म को चुनौती दी – भारत के पहले सिख राष्ट्रपति, ‘ज्ञानी जैल सिंह’ का प्रेरणादायक संघर्ष

ज्ञानी जैल सिंह

‘जहां भी जुल्म होगा, वहां क्रांति जरूर उठेगी!’ यह एक अटल सत्य है। इतिहास के पन्नों में दर्ज हर क्रांति का जन्म भूख, अपमान और अन्याय से ही हुआ है। जब 1946 में फरीदकोट रियासत में जुल्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, तब एक ऐसे योद्धा की कहानी सामने आई, जो लोगों की आवाज बना और जिसने उस जुल्म का डटकर मुकाबला किया। यह कहानी है ज्ञानी जैल सिंह के जीवन-संघर्ष की।

गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा फरीदकोट

राजा हरिंदर सिंह के शासनकाल में, जिन्होंने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया था, आम जनता गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी। वहां हर रोज फसल का 60 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा टैक्स के रूप में छीन लेना, अकाल के समय भी लोगों को बेरहमी से सताना और किसानों व आम लोगों से ‘बेगारी’ (जबरदस्ती मजदूरी) के नाम पर जानवरों की तरह काम करवाना आम बात थी। उस रियासत में आम लोगों के लिए शिक्षा और आजादी का कोई नामोनिशान नहीं था। उन अंधेरे दिनों में, ज्ञानी जैल सिंह, एक जलती हुई चिंगारी बनकर उभरे। जैसे ही उन्होंने अपनी आवाज उठानी शुरू की, लोगों के मन में बैठा वह गहरा डर पूरी तरह से छूमंतर हो गया। 

ज्ञानी जैल सिंह, स्रोत: jeevanparichay

1938 : क्रांति की नींव, नरक जैसे पांच साल

इन जुल्मों से आहत होकर, ज्ञानी जैल सिंह ने 1938 में ‘फरीदकोट प्रजा मंडल’ नामक एक राजनीतिक मंच की स्थापना की, जो कांग्रेस पार्टी से जुड़ा हुआ था। इस मंच के माध्यम से, उन्होंने लोगों को रियासती शासकों के तानाशाही रवैये के प्रति जागरूक करना आरम्भ किया। उन्होंने आम लोगों को भी सैनिकों की तरह अनुशासित स्वयंसेवकों में बदल दिया। इसके लिए, उन्होंने नेताजी की ‘आजाद हिंद फौज’ के ‘अनुशासन’ से प्रेरणा ली। धर्मों की सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों को एकजुट करते हुए, उन्होंने राजा के जुल्मों पर सवाल उठाना आरम्भ कर दिया। जहां एक ओर राजा अपनी मनमानी करते हुए लोगों पर जुल्म ढा रहा था, वहीं दूसरी ओर ये स्वयंसेवक एक अनुशासित शक्ति में तब्दील हो गए और उस मुकाम तक पहुंच गए, जहां वे राजा का डटकर मुकाबला कर सकते थे।

लोगों ने राजा के आदेशों की अवहेलना करना शुरू कर दिया। इससे राजा के मन में यह डर बैठ गया कि उसका सिंहासन डगमगाने लगा है। इस स्थिति को सहन न कर पाने के कारण, राजा ने जैल सिंह को गिरफ्तार करवा लिया और एक छोटी, अंधेरी कोठरी में कैद कर दिया। सजा : हर दिन 23 घंटे का एकांत कारावास

1938 से 1943 तक, पांच सालों तक, उन्हें एक ऐसे कमरे की चार दीवारी के अंदर, जहां कोई रोशनी नहीं थी, भयानक शारीरिक और मानसिक यातनाएं सहनी पड़ीं। कमरे में न कोई रोशनी थी, न बात करने के लिए कोई इंसान, बाहर पुलिसवालों की हंसी और सैनिकों के बूटों की आवाज के सिवा कुछ भी सुनाई नहीं देता था। उस सन्नाटे ने उन्हें गहरी मानसिक पीड़ा दी। वहीं से उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘जैल सिंह’ रख लिया।

1946 : झंडा सत्याग्रह,  आत्म-सम्मान के लिए एक संघर्ष

जेल से रिहा होने के बाद, उनका संघर्ष और तेज हो गया। मई 1946 में, प्रजा मंडल ने फरीदकोट में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का फैसला किया। उन्होंने इसे देश की आजादी का प्रतीक माना। जैल सिंह के नेतृत्व में हजारों लोग हाथों में झंडा थामे आगे बढ़े। लेकिन, रियासत के सैनिकों ने वह झंडा छीन लिया, सबके सामने उसे जमीन पर फेंक दिया और अपने पैरों से रौंदकर उसका अपमान किया।

उस झंडे का धूल में गिरना, देश की आत्मा का अपमान करने जैसा था! उस पल, जैल सिंह का गुस्सा अपने चरम पर पहुंच गया। ठीक उसी पल, उनके भीतर से एक योद्धा पूरी तरह से बाहर निकल आया। उस आंदोलन की तपिश इतनी फैल गई कि पंडित जवाहरलाल नेहरू को खुद फरीदकोट आना पड़ा और जैल सिंह के साथ मिलकर झंडा फहराना पड़ा। राजा की सत्ता, लोगों की उस ताकत के आगे झुक गई।

1982 में भारत के मुख्य न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़, ज्ञानी ज़ैल सिंह को भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाते हुए, फोटो क्रेडिट : wikimedia.org/wiki

कैदी से राष्ट्रपति तक…

फरीदकोट की जीत के बाद, उनका ध्यान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ओर मुड़ गया। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में शामिल होकर, उन्होंने सीधे तौर पर अंग्रेजों से लोहा लेना शुरू कर दिया। उस अंधेरे कमरे में उन्होंने जो तकलीफें सहीं, उनसे उन्हें डर नहीं लगा, बल्कि देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला मिला। आजादी के बाद, उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री के तौर पर देश की सेवा की। उसके बाद, उन्होंने इस देश के पहले सिख राष्ट्रपति के तौर पर कार्यभार संभाला। ज्ञानी जैल सिंह वह महान शख्सियत हैं, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर कोई जुल्म के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो एक आम इंसान भी इतिहास रच सकता है।