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  • गोपीनाथ बोरदोलोई ने कांग्रेस, जिन्ना और अंग्रेजों का विरोध करके असम को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से कैसे बचाया

    गोपीनाथ बोरदोलोई ने कांग्रेस, जिन्ना और अंग्रेजों का विरोध करके असम को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से कैसे बचाया

    जब कोई 1947 के बंटवारे के बारे में सोचता है, तो सबसे पहले यही ख्याल आता है कि पंजाब और बंगाल को कितनी बेरहमी से अलग किया गया था। शरणार्थियों से भरी ट्रेनें, दंगे, टूटे हुए परिवार और भारत-पाकिस्तान के जन्म की तस्वीरें आंखों के सामने आ जाती हैं। 

    लेकिन, बहुत कम लोगों को याद है कि एक और इलाका भी दांव पर लगा था और पाकिस्तान का हिस्सा बनने की कगार पर था, असम। लेकिन एक इंसान ने ऐसा होने से रोक लिया। वह थे, गोपीनाथ बोरदोलोई। इन्होंने यह पक्का करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी कि असम पाकिस्तान में शामिल न हो, और उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश राज के खिलाफ बहादुरी से मोर्चा संभाला। आज, ‘लोकप्रिय’ या ‘असम के शेर’ के तौर पर याद किए जाने वाले गोपीनाथ बोरदोलोई ही थे, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि असम भारत के नक्शे में शामिल हो।

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  • मुंबई ब्लास्ट इनवेस्टीगेशन (2006) : जानिए केपी रघुवंशी और उनकी टीम ने कैसे खोली पूरी साजिश?

    मुंबई ब्लास्ट इनवेस्टीगेशन (2006) : जानिए केपी रघुवंशी और उनकी टीम ने कैसे खोली पूरी साजिश?

    Mumbai Blasts Investigation 11 जुलाई 2006 की वह बरसाती शाम आज भी मुंबई के इतिहास का सबसे डरावना अध्याय मानी जाती है। उस शाम भी लोकल ट्रेनों में रोज की तरह लाखों लोग सफर कर रहे थे। ऑफिस से घर लौटते चेहरों पर थकान थी, लेकिन किसी को यह आभास नहीं था कि अगले 11 मिनट में शहर खून और चीखों से भर जाएगा।

     शाम 6 बजकर 24 मिनट से 6 बजकर 35 मिनट के बीच मुंबई की सात लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके हुए। फर्स्ट क्लास डिब्बों में रखे गए काले बैग अचानक मौत बन गए। बारिश में भीगे प्लेटफॉर्मों पर लाशें बिखरी थीं, ट्रेन के डिब्बे फट चुके थे और पूरा शहर सदमे में था। उसी भय के माहौल में एक नाम उभरा जिसने यह तय कर लिया था कि इस हमले के पीछे छिपे हर चेहरे को बेनकाब करके रहेंगे। यह कोई और नहीं उस समय केमहाराष्ट्र एटीएस प्रमुख कृष्ण पाल सिंह रघुवंशी, यानी केपी रघुवंशी थे।

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  • कोलाचेल का युद्ध : केरल के समुद्र तट पर लड़ा गया वह युद्ध, जिसने पूरे यूरोप को हिला दिया, जानिए महाराजा मार्तंड वर्मा की शौर्य गाथा

    कोलाचेल का युद्ध : केरल के समुद्र तट पर लड़ा गया वह युद्ध, जिसने पूरे यूरोप को हिला दिया, जानिए महाराजा मार्तंड वर्मा की शौर्य गाथा

    The Battle of Colachel: हिंद महासागर की उफनती लहरों पर एक ऐसी कहानी तैरती, है जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। यह उस हिंदू सम्राट की सच्ची वीरगाथा है, जिसने 18वीं सदी के उस दौर में, जब विदेशी सेनाओं को अजेय माना जाता था, तब यूरोप की सबसे शक्तिशाली समुद्री सेना को घुटनों पर ला दिया था। 

    यह कहानी है त्रावणकोर के महाराजा मार्तंड वर्मा की, जिन्होंने साल 1741 में हुई कोलाचेल की लड़ाई में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को ऐसी शिकस्त दी थी कि जिसकी गूंज पूरे यूरोप में सुनाई दी। साथ ही भारत पर कब्जा करने का डचों का सपना हमेशा-हमेशा के लिए टूट गया। लेकिन दुर्भाग्य से विदेशी मानसिकता से प्रभावित इतिहासकारों ने महाराजा मार्तंड वर्मा की इस विजय को इतिहास में वह स्थान नहीं दिया, जो मिलना चाहिए था।

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  • नाथुला का हीरो : जब कैप्टन डागर चीनी सेना पर बने कहर, पलट दी थी बाजी!

    नाथुला का हीरो : जब कैप्टन डागर चीनी सेना पर बने कहर, पलट दी थी बाजी!

    11 सितंबर 1967 को भारत-चीन सीमा पर पूर्वी सिक्किम में 4310 मीटर ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास (नाथुला दर्रा) पर एक सामान्य दिन अचानक ही युद्ध में बदल गया। सीमा पर कांटेदार तार लगाते समय चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर अचानक भारी गोलीबारी शुरू कर दी। इस दौरान 25 वर्षीय कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर ने घायल होने के बावजूद दुश्मन पर सीधा हमला कर दिया। 

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  • वो योद्धा, जिसने अपनी जान देकर महाराणा प्रताप को बचाया! हल्दीघाटी के वीर झाला बीदा की अनसुनी कहानी!

    वो योद्धा, जिसने अपनी जान देकर महाराणा प्रताप को बचाया! हल्दीघाटी के वीर झाला बीदा की अनसुनी कहानी!

    हल्दीघाटी के मैदान में एक वीर ने अपनी वीरता से एक ऐसी रणगाथा लिखी, जो केवल युद्ध कौशल की नहीं, बल्कि अद्वितीय स्वामिभक्ति, साहस और बलिदान की भी पराकाष्ठा है। यह वीरगाथा है उस योद्धा की, जिन्हें इतिहास में झाला बीदा के नाम से जाना जाता है। 

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  • रॉबेन द्वीप की अंधेरी जेल में कैसे मनाई गई ‘दीवाली’? मंडेला ने खुद बताया सच

    रॉबेन द्वीप की अंधेरी जेल में कैसे मनाई गई ‘दीवाली’? मंडेला ने खुद बताया सच

    रॉबेन द्वीप, दक्षिण अफ्रीका की वह सख्त जेल, जहां नेल्सन मंडेला ने अपने 27 वर्ष की कैद में से 18 साल बिताए। यहां की सलाखों के पीछे जीवन बेहद कठोर था। दिनभर की जीतोड़ मेहनत, सख्त नियम और अकेलेपन की घुटन। लेकिन हर साल दीवाली के आसपास एक अनोखी ज्योति यहां चमक उठती थी। 

    1991 में जेल से छूटने के एक साल बाद, 3 नवंबर को डरबन के सिटी हॉल में दिए गए अपने दीवाली भाषण में मंडेला ने भावुक होकर कहा कि दीवाली मुझे रॉबेन द्वीप पर बिताए दिनों की याद दिलाती है। यह सिर्फ एक स्मृति नहीं थी यह रंगभेद की अंधेरी जेल में प्रकाश, एकता और धार्मिक बहुलवाद की जीवंत मिसाल थी।

    मंडेला ने कहा कि रॉबेन द्वीप पर दीवाली का उत्सव नियमित रूप से मनाया जाता था, जब दुनिया भर के हिंदू दीप जलाकर प्रकाशोत्सव की तैयारी करते, तब जेल में हिंदू पुजारी विशेष अतिथि बनकर आते। मंडेला ने अपने भाषण में इनके नाम स्पष्ट रूप से लिए। केप टाउन से श्री गोवेंदर और प्रिटोरिया से श्री पदयाची, ये पुजारी हिंदू कैदियों के साथ प्रार्थना करने आते और मिठाइयों के पैकेट साथ लाते, जेल की दीवारें भले ही ऊंची हों, लेकिन इन पुजारियों की उपस्थिति कैदियों के लिए उम्मीद की किरण बन जाती। उन्होंने कहा कि हिंदू पुजारी प्रार्थना करते, रामायण की कथाएं सुनाते और दीवाली के प्रतीक अंधकार पर प्रकाश की जीत को जेल की अंधेरी कोठरियों तक पहुंचाते।

    मंडेला ने अपने भाषण में बताया कि जेल अधिकारियों की सोच संकीर्ण थी, वे कहते थे कि ये मिठाई के पैकेट केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए हैं, किसी गैर-हिंदू को छूने की अनुमति नहीं है। लेकिन मंडेला और उनके साथी कैदियों ने इस भेदभाव को चुनौती दी और तर्क दिया कि हिंदू धर्म का दर्शन समूची मानवता के लिए खुला है। इसका आधार संकीर्ण नहीं, बल्कि सार्वभौमिक है, यह सभी को गले लगाता है। कैदियों ने संघर्ष किया, बहस की और अंततः उन्हें जीत भी मिली। इस तरह रॉबेन द्वीप की जेल में दीवाली का उत्सव हिंदुओं तक सीमित नहीं रहा। यह सबके लिए साझा उत्सव बन गया।

    मंडेला ने बताया कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। इस उत्सव में मंडेला अपने भारतीय साथियों के साथ शामिल होते। जिसमें मुख्य रूप से विल्टन मकवाय, अहमद कथराडा, इस्माइल इब्राहिम, बिली नायर, मैक महाराज, इस्सू चिबा, जॉर्ज नायकर के साथ मंडेला दीवाली मनाते थे। इस दौरान प्रार्थना सभाएं होतीं, मिठाइयां बांटी जातीं और एक-दूसरे की संस्कृति को अपनाया जाता। जेल की कठोरता के बीच यह छोटा-सा आयोजन बड़ा संदेश देता था कि धर्म बंटवारे का नहीं, जोड़ने का माध्यम है। कैदी एक-दूसरे की परंपराओं को समझते, सम्मान देते और साथ बैठकर प्रकाश का उत्सव मनाते। दीपक जलाने का प्रतीक यहां जेल की अंधेरी रातों में नई उम्मीद जगाता। 

    मंडेला ने दीवाली को लेकर कहा कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। यह दीवाली उत्सव महज मिठाई बांटने या प्रार्थना तक सीमित नहीं था। यह रंगभेद की नीतियों के खिलाफ एक सूक्ष्म विद्रोह था। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय खासकर हिंदू लंबे समय से अपार्टहाइड  (Apartheid) यानी रंगभेद कानून का शिकार थे। लेकिन जेल में ये हिंदू पुजारी और कैदी मिलकर साबित कर रहे थे कि संस्कृतियां अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। मंडेला ने इस अनुभव को हमेशा याद रखा। उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा कि 5000 साल पुराने इस दीवाली के त्योहार से जुड़ना उनके लिए गर्व की बात है। 

    रॉबेन द्वीप की इन यादों ने मंडेला की सोच को गहराई दी। जेल की सलाखों के पीछे भी उन्होंने देखा कि कैसे हिंदू साथियों के साथ बिताया हर दीवाली का दिन अनेकता में एकता की नींव रखता है। पुजारियों के आने से न सिर्फ सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता, बल्कि हौसला भी बढ़ता। समाचार मिलते, संघर्ष की कहानियां साझा होतीं और कैदी एक-दूसरे के दर्द को समझते। यह घटना साबित करती है कि अपार्थाइड की अंधेरी ताकतों के खिलाफ दीपावली के प्रकाश की ज्योति कितनी शक्तिशाली हो सकती है। मंडेला और उनके साथियों ने इसे सामूहिक रूप से मनाकर दिखाया कि धर्म, जाति या रंग से ऊपर उठकर मानवता एक हो सकती है।

    आज भी रॉबेन द्वीप की यह दीवाली मनाने की कहानी प्रेरणा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सहिष्णुता और एकता का दीप जलाया जा सकता है। 

    बता दें कि नेलशन मंडेला ने अपार्थाइड (Apartheid) जोकि दक्षिण अफ्रीका में 1948 से 1994 तक लागू की गई एक कानूनी नस्लभेद प्रणाली थी, के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्हें इसी के चलते 12 जून 1946 को उम्रकैद की सजा हुई और उन्हें रॉबेन द्वीप (केप टाउन से करीब 12 किमी दूर) भेज दिया गया। वे 27 वर्ष (1964-1990) जेल में रहे, जिसमें 18 वर्ष रॉबेन द्वीप पर गुजरे। 11 फरवरी 1990 को उन्हें रिहा किया गया।

    (यह आर्टिकल नेल्सन मंडेला फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित 3 नवंबर 1991 के मूल भाषण पर आधारित है।)

  • बिरसा मुंडा पुण्यतिथि: जब 400 जनजातीय लोगों पर बरसी गोलियां, जानिए डोम्बारी बुरु नरसंहार का छुपाया गया सच!

    बिरसा मुंडा पुण्यतिथि: जब 400 जनजातीय लोगों पर बरसी गोलियां, जानिए डोम्बारी बुरु नरसंहार का छुपाया गया सच!

    झारखंड की पहाड़ियों में एक ऐसी चीखें आज भी गूंजती हैं, जिन्हें इतिहास ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। यह चीखें हैं डोम्बारी बुरु नरसंहार में मारे गए, 400 जनजातीय क्रांतिकारियों की। जब दमनकारी ब्रिटिश शासन ने निहत्थे जनजातीय समाज के पुरुषों, बच्चों और महिलाओं पर गोलियों की बरसात की थी। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि वह क्षण था, जब एक पूरी सभ्यता को कुचलने का प्रयास किया गया। इस विद्रोह की आत्मा थे, बिरसा मुंडा, जिनकी आवाज ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ (अपना देश, अपना राज) बनकर जंगलों और पहाड़ों में गूंज उठी थी। लेकिन अंग्रेजों को यह इतना खतरनाक लगा कि उन्होंने इसे हमेशा के लिए दबाने का निर्णय लिया। डोम्बारी बुरु की पहाड़ी आज भी उस दिन की गवाही देती है, जब ब्रिटिश सत्ता ने इतिहास का सबसे क्रूरता पूर्ण भयावह रूप दिखाया था।

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  • इंदिरा गांधी ने दुनिया की सबसे खूबसूरत महारानी, ​​गायत्री देवी को तिहाड़ जेल क्यों भेजा? 

    इंदिरा गांधी ने दुनिया की सबसे खूबसूरत महारानी, ​​गायत्री देवी को तिहाड़ जेल क्यों भेजा? 

    “तिहाड़ जेल किसी मछली बाजार जैस था। छोटे-मोटे चोरों और चीखती-चिल्लाती वेश्याओं से भरी हुई।” यह नजारा जुलाई 1975 का है, जब एक महारानी, जिनका नाम दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं की सूची में शामिल था, भारत की सबसे बदनाम जेल के अंदर थीं। 

    शिफॉन की साड़ी और अपने खास मोतियों के हार से सजी यह महारानी कोई और नहीं, बल्कि जयपुर की राजमाता महारानी गायत्री देवी थीं, जिन्होंने स्वयं को बदबूदार तिहाड़ जेल में, अपराधियों और पागलों के बीच घिरा पाया। लेकिन क्यों? 

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  • सुधारक या मुगल दूत? जब राजा राममोहन राय अकबर द्वितीय की पेंशन बढ़वाने इंग्लैंड गए

    सुधारक या मुगल दूत? जब राजा राममोहन राय अकबर द्वितीय की पेंशन बढ़वाने इंग्लैंड गए

    एक समाज सुधारक, जो सती प्रथा का कट्टर विरोधी है और भारतीय समाज को आधुनिक बनाने का सपना देखता है, अचानक दिल्ली के लाल किले से मुगल सम्राट का दूत बन जाता है। वह ब्रिटिश राजा के दरबार में जाकर न केवल सुधारों की बात करता है, बल्कि उन मुगलों की जेब भरने की गुहार लगाता है, जिनके पूर्वजों ने हिंदू मंदिर तोड़े और लाखों जानें लीं, साथ ही हिन्दू धर्म को पूरी तरह से मिटाने का प्रयास किया। 

    यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि 1831 की सच्ची घटना है, जब राजा राममोहन राय इंग्लैंड पहुंचे। कैसे एक सुधारक मुगल हितैषी बना, और क्यों बना, यह आज भी विवाद पैदा करता है। 

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  • 1st Amendment & Press Freedom : जब नेहरू की नाराजगी प्रेस की स्वतंत्रता पर भारी पड़ी! लोकतंत्र की अनोखी कहानी

    1st Amendment & Press Freedom : जब नेहरू की नाराजगी प्रेस की स्वतंत्रता पर भारी पड़ी! लोकतंत्र की अनोखी कहानी

    स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दुनिया को गुटनिरपेक्षता का उपदेश दे रहे थे, तभी एक छोटी-सी साप्ताहिक पत्रिका ने उनकी विदेश नीति को निशाना बनाया और विदेश नीति पर सवाल खड़े किए। नेहरू के लिए यह कोई साधारण आलोचना भर नहीं थी, बल्कि यह एक व्यक्तिगत चोट थी, जो इतनी चुभी कि उन्होंने संविधान ही बदल दिया। 1951 का पहला संविधान संशोधन, जो नेहरू की गहरी नाराजगी का नतीजा था, इसकी वजह थी रोमेश थापर की क्रॉस रोड्स मैगजीन, जो उनकी विदेश नीति की कटु आलोचना कर रही थी। 

    आइए, जानते हैं कि लोकतंत्र की शुरुआत में ही प्रेस की आवाज दबाने की कोशिश क्यों और कैसे शुरू हुई?  

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