रॉबेन द्वीप, दक्षिण अफ्रीका की वह सख्त जेल, जहां नेल्सन मंडेला ने अपने 27 वर्ष की कैद में से 18 साल बिताए। यहां की सलाखों के पीछे जीवन बेहद कठोर था। दिनभर की जीतोड़ मेहनत, सख्त नियम और अकेलेपन की घुटन। लेकिन हर साल दीवाली के आसपास एक अनोखी ज्योति यहां चमक उठती थी।
1991 में जेल से छूटने के एक साल बाद, 3 नवंबर को डरबन के सिटी हॉल में दिए गए अपने दीवाली भाषण में मंडेला ने भावुक होकर कहा कि दीवाली मुझे रॉबेन द्वीप पर बिताए दिनों की याद दिलाती है। यह सिर्फ एक स्मृति नहीं थी यह रंगभेद की अंधेरी जेल में प्रकाश, एकता और धार्मिक बहुलवाद की जीवंत मिसाल थी।
मंडेला ने कहा कि रॉबेन द्वीप पर दीवाली का उत्सव नियमित रूप से मनाया जाता था, जब दुनिया भर के हिंदू दीप जलाकर प्रकाशोत्सव की तैयारी करते, तब जेल में हिंदू पुजारी विशेष अतिथि बनकर आते। मंडेला ने अपने भाषण में इनके नाम स्पष्ट रूप से लिए। केप टाउन से श्री गोवेंदर और प्रिटोरिया से श्री पदयाची, ये पुजारी हिंदू कैदियों के साथ प्रार्थना करने आते और मिठाइयों के पैकेट साथ लाते, जेल की दीवारें भले ही ऊंची हों, लेकिन इन पुजारियों की उपस्थिति कैदियों के लिए उम्मीद की किरण बन जाती। उन्होंने कहा कि हिंदू पुजारी प्रार्थना करते, रामायण की कथाएं सुनाते और दीवाली के प्रतीक अंधकार पर प्रकाश की जीत को जेल की अंधेरी कोठरियों तक पहुंचाते।
मंडेला ने अपने भाषण में बताया कि जेल अधिकारियों की सोच संकीर्ण थी, वे कहते थे कि ये मिठाई के पैकेट केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए हैं, किसी गैर-हिंदू को छूने की अनुमति नहीं है। लेकिन मंडेला और उनके साथी कैदियों ने इस भेदभाव को चुनौती दी और तर्क दिया कि हिंदू धर्म का दर्शन समूची मानवता के लिए खुला है। इसका आधार संकीर्ण नहीं, बल्कि सार्वभौमिक है, यह सभी को गले लगाता है। कैदियों ने संघर्ष किया, बहस की और अंततः उन्हें जीत भी मिली। इस तरह रॉबेन द्वीप की जेल में दीवाली का उत्सव हिंदुओं तक सीमित नहीं रहा। यह सबके लिए साझा उत्सव बन गया।
मंडेला ने बताया कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। इस उत्सव में मंडेला अपने भारतीय साथियों के साथ शामिल होते। जिसमें मुख्य रूप से विल्टन मकवाय, अहमद कथराडा, इस्माइल इब्राहिम, बिली नायर, मैक महाराज, इस्सू चिबा, जॉर्ज नायकर के साथ मंडेला दीवाली मनाते थे। इस दौरान प्रार्थना सभाएं होतीं, मिठाइयां बांटी जातीं और एक-दूसरे की संस्कृति को अपनाया जाता। जेल की कठोरता के बीच यह छोटा-सा आयोजन बड़ा संदेश देता था कि धर्म बंटवारे का नहीं, जोड़ने का माध्यम है। कैदी एक-दूसरे की परंपराओं को समझते, सम्मान देते और साथ बैठकर प्रकाश का उत्सव मनाते। दीपक जलाने का प्रतीक यहां जेल की अंधेरी रातों में नई उम्मीद जगाता।
मंडेला ने दीवाली को लेकर कहा कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। यह दीवाली उत्सव महज मिठाई बांटने या प्रार्थना तक सीमित नहीं था। यह रंगभेद की नीतियों के खिलाफ एक सूक्ष्म विद्रोह था। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय खासकर हिंदू लंबे समय से अपार्टहाइड (Apartheid) यानी रंगभेद कानून का शिकार थे। लेकिन जेल में ये हिंदू पुजारी और कैदी मिलकर साबित कर रहे थे कि संस्कृतियां अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। मंडेला ने इस अनुभव को हमेशा याद रखा। उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा कि 5000 साल पुराने इस दीवाली के त्योहार से जुड़ना उनके लिए गर्व की बात है।
रॉबेन द्वीप की इन यादों ने मंडेला की सोच को गहराई दी। जेल की सलाखों के पीछे भी उन्होंने देखा कि कैसे हिंदू साथियों के साथ बिताया हर दीवाली का दिन अनेकता में एकता की नींव रखता है। पुजारियों के आने से न सिर्फ सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता, बल्कि हौसला भी बढ़ता। समाचार मिलते, संघर्ष की कहानियां साझा होतीं और कैदी एक-दूसरे के दर्द को समझते। यह घटना साबित करती है कि अपार्थाइड की अंधेरी ताकतों के खिलाफ दीपावली के प्रकाश की ज्योति कितनी शक्तिशाली हो सकती है। मंडेला और उनके साथियों ने इसे सामूहिक रूप से मनाकर दिखाया कि धर्म, जाति या रंग से ऊपर उठकर मानवता एक हो सकती है।
आज भी रॉबेन द्वीप की यह दीवाली मनाने की कहानी प्रेरणा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सहिष्णुता और एकता का दीप जलाया जा सकता है।
बता दें कि नेलशन मंडेला ने अपार्थाइड (Apartheid) जोकि दक्षिण अफ्रीका में 1948 से 1994 तक लागू की गई एक कानूनी नस्लभेद प्रणाली थी, के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्हें इसी के चलते 12 जून 1946 को उम्रकैद की सजा हुई और उन्हें रॉबेन द्वीप (केप टाउन से करीब 12 किमी दूर) भेज दिया गया। वे 27 वर्ष (1964-1990) जेल में रहे, जिसमें 18 वर्ष रॉबेन द्वीप पर गुजरे। 11 फरवरी 1990 को उन्हें रिहा किया गया।
(यह आर्टिकल नेल्सन मंडेला फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित 3 नवंबर 1991 के मूल भाषण पर आधारित है।)