भगवा ध्वज के लिए ईसाई कामगारों ने जब बहाया पसीना : छत्रपति शिवाजी महाराज की दूरदृष्टि से पड़ी स्वदेशी नौसेना की नींव

छत्रपति शिवाजी महाराज

चारों तरफ समुद्र, बीच में एक किला। 30 फीट ऊंची दीवारों से घिरा यह किला एकदम अभेद्य। और किले को जिस भी ओर से देखें, आपको दिखेगा लहराता भगवा ध्वज

सिंधुदुर्ग किले पर लहराता भगवा ध्वज (2 वास्तविक तस्वीरों को ChatGPT की मदद से एक बनाया गया)

क्या हो, अगर आपको यह बताया जाए कि इस भगवे के लिए ईसाई कामगारों ने भी पसीना बहाया था? चौंकना स्वाभाविक है! लेकिन यह ऐसा इतिहास है, जिसे अक्सर छिपा लिया जाता है।

हिंदुओं ने भगवा विजयी पताका के लिए क्या-क्या किया है, यह तो सामान्य ज्ञान है। लेकिन कुशल ईसाई कारीगरों से भी यह काम करवाया गया, आज की कहानी इसी तथ्य पर, इसी इतिहास पर आधारित है। और इसे संभव कर दिखाया था छत्रपति शिवाजी महाराज ने।   
आज से 361 वर्ष पहले सन 1664 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने न सिर्फ एक सपना देखा, बल्कि उसे पूरा भी किया। मुंबई से 450 किलोमीटर दूर अरब सागर के बीचोबीच भगवा लहराता सिंधुदुर्ग किला बनाया। इसके लिए भारतीय वास्तुकारों के साथ-साथ समुद्री दुर्गों की बनावट के लिए प्रसिद्ध यूरोप के कुशल ईसाई कामगारों को भी काम पर लगाया गया था। सिंधुदुर्ग नाम का यह किला, जब बनकर तैयार हुआ, तो यहीं से स्वदेशी नौसेना की नींव भी पड़ी।

अब सोचिए, विदेशी आक्रांताओं से लड़ते हुए देश को हिंद स्वराज का सपना देने और उसे आकार देने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने आखिर विदेशी ईसाइयों को काम पर क्यों लगाया? विदेशियों को काम पर लगाया, तो इससे स्वदेशी नौसेना की नींव कैसे पड़ी? भारतीय नौसेना के जनक छत्रपति शिवाजी महाराज यह कैसे कर पाए?

वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति + Skilled Labour  को जोड़ने की दूरदृष्टि
वसुधैव कुटुंबकम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। छत्रपति भी इससे परे नहीं थे। इसी सिद्धांत के तहत वह अपनी छत्रछाया में रहने वाले हर एक नागरिक का सम्मान करते थे। यही वो सोच थी, जिसके कारण अंग्रेज और पुर्तगाली ईसाई कामगारों का विश्वास उन्होंने जीता था।
जिस Skilled Labour Workforce के कॉन्सेप्ट को अमेरिका ने 19वीं शताब्दी में समझा और स्वयं को विकसित दुनिया का सरताज बनाया, उस विचार या परिकल्पना को शिवाजी महाराज 200 साल पहले समझ चुके थे। वह यह भी समझ गए थे कि हिंद स्वराज की स्थापना, सिर्फ मुगल आक्रांताओं से युद्ध जीतकर नहीं की जा सकती है। क्योंकि समुद्री मार्गों के माध्यम से अंग्रेज, पुर्तगाली, डच, फ्रेंच सब के सब भारत को लूटने के लिए तैयार थे। इन सबके पास उस समय की सर्वश्रेष्ठ समुद्री तकनीक भी थी। यहीं पर शिवाजी की दूरदृष्टि ने बाजी मारी।

सिंधुदुर्ग किले की वास्तविक एरियल तस्वीर, साभार: maharashtratourism.gov.in


अपने मरीन इंजीनियरों को जितना मेहनताना अंग्रेज या पुर्तगाली देते थे, उससे ज्यादा पैसे देने की पेशकश शिवाजी महाराज ने दी, तो तरकीब काम कर गई। भले ही वे ईसाई थे, विदेशी भी थे, लेकिन काम कर रहे थे भारत की उन्नति के लिए, हिंद स्वराज के सपने को साकार कर रहे थे। इन कुशल कारीगरों ने समुद्री दुर्ग (ऊपर आप वास्तविक तस्वीर को देख सकते हैं) के निर्माण से लेकर छोटी लेकिन तीव्र गति वाले पानी के लड़ाकू जहाज भी बनाए, सब कुछ भारत के लिए। और ऐसा नहीं था कि उनके कौशल को भारतीय सीख नहीं रहे थे। जिसे आजकल हमलोग Technology and Skill transfer जैसे भारी-भरकम शब्द से नवाजते हैं, यह तब भी हुआ था।

अंग्रेज-पुर्तगाली-डच-फ्रेंच-सिद्दी-मुगल समेत कुल 27 देश-विरोधी ताकतों से छत्रपति शिवाजी महाराज लड़ रहे थे। मुगल उस समय भारतीय सत्ता पर काबिज थे लेकिन समुद्र की व्यापारिक और सैन्य क्षमताओं के दोहन से उन्होंने स्वयं को दूर रखा हुआ था। उस दौर में भारत में यूरोपीय आक्रांताओं के आगमन के बाद एकमात्र मराठा शक्ति ही थी, जिसने स्वदेशी नौसैना की क्षमताओं को पहचाना, उसके अनुसार अपने नौसैनिक बेड़ों को सशक्त किया।



अरब सागर में मराठा नौसैना की ‘बादशाहत’ (फोटो साभार: IndianExpress)

इतिहासकार डॉक्टर पीएस पिसुर्लेकर ने ‘पोर्तुगीज-मराठे संबंध’ (Portuguese Mahratta Relations) नाम की एक पुस्तक लिखी है। नौसेना के अलावा छत्रपति ने अन्य सैन्य प्रतिष्ठानों में भी कुशल ईसाई कामगारों की मदद ली थी, इस पुस्तक में उसका भी उल्लेख है। जैसे – बेलगांव किला और बीजापुर का फिरंगी टावर बनवाने में।

‘शिवाजी ने ईसाई पादरियों का काटा गला, क्योंकि उन्होंने नहीं स्वीकारा हिंदू धर्म’

जिस राजा के लिए हिंद स्वराज का सपना ही सब कुछ था, जिसकी 27 दुश्मनों से लड़ाई चल रही हो, जो उस समय भारत के एकमात्र नौसैनिक बेड़े के निर्माण में जुटा था, जो धर्म या मजहब के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर अपने सैनिकों या कामगारों पर ध्यान देता था, आखिर वो ईसाई पादरियों को हिंदू धर्म क्यों स्वीकार करवा रहा था? जो अपनी सेना तक को धर्म या मजहब के आधार पर युद्धबंदी नहीं बनाने का आदेश देते थे, उन्होंने पादरियों का गला काट डाला?

यह झूठ फैलाया गया एक अंग्रेज के द्वारा – सिर्फ बोल कर नहीं, बल्कि एक पत्र लिखकर। ताकि इतिहास में दर्ज हो सके। लेकिन जब पूरी कहानी ही शिवाजी बनाम पुर्तगालियों की है, तो भला एक अंग्रेज ने पत्र क्यों लिखा? इस सवाल के जवाब से झूठ का पर्दाफाश हुआ, एक नहीं, बल्कि कई इतिहासकारों द्वारा।

‘फूट डालो और शासन करो’, अंग्रेजों की यह शुरू से नीति रही थी। छिटपुट घटनाओं को छोड़कर पुर्तगालियों और शिवाजी के बीच प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति कभी नहीं बनी। अंग्रेजों की नीति के अनुसार, यह उनके लिए अनुकूल नहीं था। यही कारण है कि हिंदू बनाम ईसाई मजहब, पादरियों का धर्मांतरण कर हिंदू बनाने की धमकी और अंततः हत्या करने की कहानी गढ़ी गई ताकि ईसाई पुर्तगाली राजा और गोवा में उसके सैनिक-सेनापति भड़क जाएं, हिंदू राजा शिवाजी के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध में कूद पड़ें… और फायदा अंग्रेजों को हो जाए।

पुर्तगाली पादरियों ने ही दिया शिवाजी को क्लिनचीट, अंग्रेजी षड्यंत्र हुआ फेल

गोवा के बारदेज में शिवाजी महाराज ने हमला किया था, यह सच है। लेकिन कारण सामरिक था, सत्ता की संप्रभुता थी, न कि मजहबी। इस तथ्य के लिए नीचे 3 स्रोतों का सचित्र उदाहरण दिया गया है।


महाराष्ट्र राज्य साहित्य और संस्कृती मंडल की पुस्तक, लेखक: डॉक्टर पीएस पिसुर्लेकर  

इतिहासकार जदुनाथ सरकार की पुस्तक शिवाजी एंड हिज टाइम्स


एचएस सरदेसाई की पुस्तक शिवाजी द ग्रेट मराठा

इतिहासकार पिसुर्लेकर बताते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने गोवा के बारदेज पर हमला किया क्योंकि पुर्तगालियों ने उनके दुश्मन को अपने यहां शरण दी थी। इस हमले में 2 पादरी भी मारे गए क्योंकि तब पादरी सिर्फ चर्च का काम नहीं करते थे बल्कि कुशल सैनिक भी होते थे, युद्धों में भाग लेते थे। पुर्तगाली इतिहासकारों ने तो यहां तक लिखा है कि अगर छत्रपति शिवाजी महाराज की मंशा पादरियों को मारने की होती, तो सिर्फ 2 ही पादरियों की हत्या क्यों हुई, यह संख्या ज्यादा होनी चाहिए थी।

इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने भी बारदेज पर छत्रपति शिवाजी महाराज के हमले का कारण दुश्मन को शरण देना ही बताया है। उनके अनुसार 3 पादरी मारे गए थे। यहां लेकिन हिंदुओं, ब्राह्मणों का अपहरण और जबरन धर्मांतरण भी एक वजह बताई गई है। इस इतिहास को भी अगर सच मानें, तो यह सत्ता-संप्रभुता की लड़ाई थी, हर नागरिक को बिना भय के अपने धर्म को मानने की लड़ाई थी। लेकिन कहीं पर भी ईसाई पादरियों को जबरन हिंदू बनाने और इनकार करने पर गला काटने का जिक्र यहां भी नहीं है।

एचएस सरदेसाई ने अपनी पुस्तक में 3 पादरियों की मौत का जिक्र किया है। उन्होंने बताया है कि युद्ध में पादरियों को मारने की पूर्वनियोजित कोई मंशा नहीं थी, यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया के दौरान घटित हुई होगी। छत्रपति शिवाजी महाराज का उल्लेख करते हुए सभी धर्मों में उनकी आस्था और भेदभाव-रहित सत्ता संचालन का भी जिक्र किया गया है।

छत्रपति शिवाजी महाराज भगवे के लिए समर्पित थे। उन्हें विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ खड़े होने वाले वीर योद्धा के तौर पर याद किया जाए। साथ ही यह भी जरूरी है कि झूठे और फर्जी नैरेटिव की काट तथ्यों के साथ की जाए।