अहमदशाह अब्दाली, महमूद गजनवी जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रांताओं ने जिस धरती से आकर भारत में लूटपाट और निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार किया, उसी गांधार (अफगानिस्तान) की धरती पर एक भारतीय वीर की ऐसी कहानी छिपी है, जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया। यह सच्ची कहानी एक ऐसे भारतीय शूरवीर की है, जिसके भय से कट्टरपंथी अफगानी पठान थर-थर कांपते थे। उसका खौफ इतना कि अफगानी पठान डर के मारे महिलाओं का सलवार पहने लगे थे।
यह योद्धा कोई और नहीं, बल्कि महान भारतीय शासक महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति सरदार हरि सिंह नलवा थे। जब उन्हें सीमांत इलाकों (खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान) का गवर्नर बनाया गया, तो डर के मारे कट्टरपंथी अफगान कबीलों ने अपनी इस्लामिक पहचान तक बदल डाली। हरि सिंह नलवा की यह कोई सामान्य सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि यह वह दौर था, जब एक भारतीय योद्धा ने सिर्फ भूगोल ही नहीं, बल्कि शत्रुओं की संस्कृति तक को प्रभावित कर दिया था।

सरदार हरि सिंह नलवा, इमेज सोर्स- bharatdiscovery.org
19वीं सदी के आरम्भिक दशक में जब महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य अपने चरम पर था, तब उत्तर-पश्चिमी सीमांत (आज का खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान) सबसे अशांत इलाकों में गिना जाता था। यह क्षेत्र सदियों से आक्रमणकारियों के लिए भारत में प्रवेश करने का मार्ग रहा था। इस्लामिक लूट, सनातनियों का जबरन मतांतरण और हिंसा यहां सामान्य बात थी। लेकिन जब सरदार हरिसिंह नलवा को इस क्षेत्र का गवर्नर बनाया गया, तो स्थिति परिवर्तित होने लगी। उन्होंने अपनी वीरता और सैन्य क्षमताओं से महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य को पेशावर, कंधार, मुल्तान, हेरात, कलात, बलूचिस्तान और फारस तक पहुंचा दिया। नलवा ने सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण ही स्थापित नहीं किया, बल्कि अफगान के इस्लामिक आक्रमणकारियों के मन में ऐसा भय पैदा किया कि कट्टरपंथी उनसे सामना करने की बजाए, महिलाओं के सलवार पहनकर अपनी जान बचाने की गुहार लगाते रहे।
सिख परंपरा के गुरुओं की शिक्षाओं में स्पष्ट था कि निहत्थों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर हाथ उठाना अधर्म है। यह सिद्धांत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सैन्य आचरण का भी हिस्सा था। जब सरदार हरिसिंह नलवा को गांधार (अफगानिस्तान) क्षेत्र का गवर्नर बनाया गया, तो उन्होंने भारत को लूटने और इस्लाम फैलाने की मंशा रखने वाले कट्टरपंथी अफगानी पठानों को चेतावनी दी कि यदि वे सिखों के क्रोध से बचना चाहते हैं, तो महिलाओं का वेश धारण कर लें, क्योंकि सिख स्त्रियों पर हमला नहीं करते।
पंजाब में उस समय (आज भी प्रचलित है) सलवार-कमीज महिलाओं का पहनावा था। भय के मारे अफगानी इसी प्रकार की सलवार-कमीज पहनने लगे। क्योंकि सलवार-कमीज पहने पठानों पर सिख योद्धा वार नहीं करते थे। डर के मारे पहनावे में शामिल हुई यह पोशाक, अफगानों की परंपरागत पोशाक बन गई। जो आज भी पठानी सूट के तौर पर पहनी जाती है।
इसके पहले अफगान पुरुष एक ढीला, चोगे जैसा वस्त्र पहनते थे, जो वर्तमान के अरब परिधान से मिलता-जुलता था। लेकिन जब यह धारणा फैली की सिख सैनिक महिलाओं के वेश में किसी पर हाथ नहीं उठाते, तो अफगानों ने पंजाबी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले सलवार-कमीज को अपनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह उनके ‘बचाव का उपाय’ और फिर उनकी मजहबी पहचान बन गया। जिसे आज हम ‘पठानी सूट’ कहते हैं। वह ढीली सलवार और लंबी कमीज आज उसी बदलाव का परिणाम माना जाता है।
सरदार हरि सिंह नलवा के इस वीरता के ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलते हैं। जो अफगानों में मन में उनके प्रति भरे खौफ को दिखाते हैं। पाकिस्तानी राज्य खैबर पख्तूनख्वा के स्वात स्टेट के पूर्व वलीमियां गुल औरंगजेब ने अफगान के तालिबान शासन को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने यह तर्क दिया कि जिन लोगों के पूर्वज भय के कारण महिलाओं का पहनावा अपना चुके हैं, वे आज महिलाओं पर हिजाब पहनने का दबाव कैसे बना सकते हैं। यह पत्र ऐतिहासिक सत्य से अधिक एक नैतिक टिप्पणी था, जिसने उस खौफ को फिर से जीवित कर दिया था जो हरि सिंह नलवा ने अफगानों के मन में बैठाया था।
हरि सिंह नलवा केवल तलवार के बल पर नहीं, बल्कि अपने नाम के भय से भी शासन करते थे। उन्होंने सीमांत क्षेत्र में वह संतुलन स्थापित किया, जिसने सदियों से चली आ रही अराजकता को चुनौती दी। उनका प्रभाव इतना गहरा था कि कट्टरपंथी सिर्फ हारे नहीं बल्कि अपनी पहनावे की संस्कृति ही बदल दी।28 अप्रैल, 1791 को पंजाब के गुजरांवाला में जन्में हरि सिंह बचपन से ही वीर थे। उनके पास भाला, तीर और तलवार चलाने की अद्भुत प्रतिभा थी। इससे प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती किया था। एक बार शिकार के समय हरि सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह की जान शेर के आक्रमण से बचाई थी। तब महाराजा रणजीत सिंह के मुंह से अचानक निकला, ‘अरे तुम तो राजा नल जैसे वीर हो।’ तभी से नल से प्रभावित उनका ‘नलवा’ शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया। बाद में उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की गई। जिससे उनका पूरा नाम सरदार हरि सिंह नलवा हो गया।

