मार्च 1700। दक्कन की पहाड़ियों पर धूल उड़ रही थी और मराठा साम्राज्य का भविष्य अंधकार में डूबा दिखाई दे रहा था। छत्रपति शिवाजी महाराज के छोटे पुत्र और मराठा साम्राज्य के शासक छत्रपति राजाराम का निधन हो चुका था। वर्षों से चल रहे युद्ध ने मराठों को थका दिया था। उनके अनेक किले मुगल सेना के घेरे में थे और स्वयं सम्राट औरंगजेब लाखों सैनिकों के साथ दक्कन में डेरा डाले बैठा था।
दिल्ली से लेकर दक्कन तक यह चर्चा थी कि अब मराठों का अंत निश्चित है। लेकिन इसी निराशा के बीच 25 वर्ष की युवा महारानी ताराबाई भोसले आगे आईं। महान सेनापति हंबीरराव मोहिते की पुत्री ताराबाई बचपन से ही युद्ध और प्रशासन को समझती थीं। साल 1700 में पति की मृत्यु के बाद 25 वर्षीय विधवा ताराबाई ने मराठा सेना की कमान अपने हाथ में ले ली।
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