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  • क्रांति का बिगुल बनीं एक किताब की कविताएं, जब बाबाराव सावरकर के कविता संग्रह से बौखला गई थी ब्रिटिश सरकार 

    क्रांति का बिगुल बनीं एक किताब की कविताएं, जब बाबाराव सावरकर के कविता संग्रह से बौखला गई थी ब्रिटिश सरकार 

    वर्ष 1907 के आखिरी महीनों में नासिक की गलियों में एक छोटी-सी किताब चुपके-चुपके हाथों-हाथ बंट रही थी। नाम था ‘लघु अभिनव भारत माला’। यह कोई सामान्य कविता-संग्रह नहीं था। यह 18 कविताओं की एक माला थी, जिसे गणेश दामोदर सावरकर यानी बाबाराव सावरकर ने प्रकाशित किया था। सोलापुर के स्वराज्य प्रेस में दिसंबर 1907 में 3000 प्रतियां छपीं और 18 मार्च 1908 को नासिक से आधिकारिक रूप से प्रकाशित हुईं, जिसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना था।

    यह पुस्तक ‘अभिनव भारत’ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की विचारधारा का आईना थी। बाबाराव और उनके छोटे भाई विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) इस संगठन के प्रमुख स्तंभ थे। संगठन का उद्देश्य था, ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना। लेकिन बंदूकों और बमों के साथ-साथ वे शब्दों को भी हथियार बनाना चाहते थे। ‘लघु अभिनव भारत माला’ किताब उसी हथियार का एक रूप थी। कविताएं बाहर से पौराणिक और ऐतिहासिक लगती थीं, जिसमें गणेश, कृष्ण, शिव, शिवाजी और मावलों की कहानियां थीं। लेकिन अंदर से ये ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीखा हमला थीं। 

    ऐसी कविताओं के कुछ उदाहरण यहां दिए गए हैं। पुस्तक की पांचवीं कविता में कृष्ण द्वारा ‘विदेशी राक्षसों’ के वध का उल्लेख है। लेकिन वास्तविकता में यह कविता भारतीयों को ब्रिटिशों के खिलाफ तलवार उठाने के लिए प्रेरित करती थी। इसी तरह, सातवीं कविता में आग्रह किया जा रहा है कि ‘तलवार उठाओ, दासता के राक्षसों का वध करो’, अर्थात नागरिकों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हथियार उठाने का आह्वान है, न कि स्वतंत्रता के लिए भीख मांगने का। नौवीं कविता एक सीधा प्रश्न उठाती है, ‘किसे बिना युद्ध के स्वतंत्रता मिली?’ यह कविता इस विचार को प्रबल करती है कि यदि स्वराज्य लक्ष्य है, तो ब्रिटिशों से संघर्ष आवश्यक है। इसी प्रकार, सत्रहवीं कविता (चौथी से सातवीं पंक्तियां) में ब्रिटिश शासकों को ‘राक्षस’ बताया गया है और उनके खिलाफ युद्ध का आह्वान किया गया है।

    बाबाराव सावरकर (फोटो क्रेडिट: दिव्य मराठी)

    जब ब्रिटिश शासन को बाबाराव सावरकर की इन गुप्त गतिविधियों का पता चला, तो वे सतर्क हो गए और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। 30 मई 1909 को नासिक पुलिस ने बाबाराव को इस पुस्तक के कारण गिरफ्तार कर लिया। उन पर केस चला और 8 जून 1909 नासिक की सत्र अदालत ने उन्हें धारा 124A के तहत दो वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई, और धारा 121 के तहत आजीवन निर्वासन और सारी संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। नासिक के सत्र न्यायाधीश के फैसले के विरुद्ध बाबाराव ने बाम्बे हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने इस किताब में कुल 18 कविताओं में से 4 कविताओं को मुख्य आरोपों का आधार बनाया। ये चार कविताएं किताब में नंबर 5, 7, 9 और 17 हैं। जबकि निचली अदालत में पूरी किताब बिना किसी आपत्ति के साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर ली गई थी। हाईकोर्ट ने नासिक सत्र अदालत के फैसले को बरकरार रखा और बाबाराव सावरकर को सेलुलर जेल (अंडमान) भेज दिया गया।

    13 जून 1879 को महाराष्ट्र के नासिक के भगूर गांव में जन्मे गणेश सावरकर ने अपने लेखन, विशेषकर ‘लघु अभिनव भारत माला’ के माध्यम से युवाओं में देशभक्ति और ब्रिटिश सत्ता के अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना जगाई। उनका निधन 16 मार्च 1945 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ।

    बाबाराव की इस कहानी से पता चलता है कि साहित्य भी क्रांति का सबसे तेज हथियार बन सकता है। बाबाराव सावरकर ने शब्दों से ऐसी तलवार बनाई, जो ब्रिटिशर्स को सिर से पांव तक डरा गई। यह घटना हमें सिखाती है कि जब अत्याचार चरम पर हो तो एक सच्चा देशभक्त अपनी आवाज को दबने नहीं देता, भले ही उसकी कीमत आजीवन निर्वासन ही क्यों न हो।

  • जौनपुर का ‘गब्बर’: बांके चमार की दहशत से हिल गई थी ब्रिटिश सरकार, जानिए पूरी कहानी!

    जौनपुर का ‘गब्बर’: बांके चमार की दहशत से हिल गई थी ब्रिटिश सरकार, जानिए पूरी कहानी!

    आज के जमाने में, जहां बिजनेसमैन बैंकों और कस्टमर्स से करोड़ों रुपए ठगकर देश छोड़कर भाग जाते हैं, वहीं 1857 के बांके चमार की कहानी हिम्मत और कुर्बानी का सबूत है। ब्रिटिश सरकार उनके असर से इतनी डर गई थी कि उन्होंने उनके सिर पर ₹50,000 का इनाम रख दिया था, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी। यह आज की करेंसी में लगभग ₹30 करोड़ के बराबर थी। यह इनाम ब्रिटिश सेनाओं के बीच बांके चमार के प्रति उनके गहरे डर को दिखाता था। उनके डर की वजह से उन्हें अक्सर जौनपुर का ‘गब्बर’ कहा जाता था।

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