पंजाब की पावन धरती पर एक ऐसा ऐतिहासिक प्रसंग घटित हुआ, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की आध्यात्मिक शक्ति के सामने मुगल आक्रांताओं को भी झुकना पड़ा।
इस ऐतिहासिक घटना में एक ओर था मुगल आक्रांता अकबर, तो दूसरी ओर थे गुरु अमर दास जी, जिनके पास न कोई सेना थी और न ही राजमहल। फिर भी जब अकबर का सामना गुरु अमरदास जी से हुआ, तो प्रभाव सत्ता का नहीं, बल्कि समानता, सेवा और सिद्धांतों का दिखाई दिया।
अकबर जैसा कूटनीतिक मुगल आक्रांता, गुरु अमरदास जी के व्यक्तित्व और उनकी शिक्षाओं से इतना प्रभावित हुआ कि वह अपनी इस्लामिक विस्तारवादी नीति को छोड़, भूमिदान करने की इच्छा प्रकट करने लगा। लेकिन गुरु अमर दास जी ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। यह प्रसंग भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अद्वितीय उदाहरण है। जिसके बारे में अधिकांश लोगों को नहीं पता।
यह घटना सन् 1569 की है। अकबर दिल्ली से लाहौर जाते समय पंजाब के गोइंदवाल में रुका। यहां उसे गुरु अमरदास जी के बारे में पता चला। अकबर ने उस समय सुलह-ए-कुल नाम से एक कूटनीतिक पहल शुरू की थी जिसके तहत वह सनातन धर्म से जुड़े विभिन्न मतों और संप्रदाय के प्रभावशाली लोगों के साथ बैठक करता था। भारत में मुगलों का इस्लामिक शासन चलता रहे, इसके पीछे यह उसकी कूटनीति चाल थी।
गुरु अमरदास जी को उनके शिष्यों ने अकबर के आने की सूचना दी। कुछ अनुयायियों ने उन्हें सुझाव दिया कि अकबर का स्वागत करने के लिए विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन गुरु अमरदास जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गुरु का दरबार किसी राजा या साधारण व्यक्ति में भेद नहीं करता। यहां सभी समान हैं, चाहे राजा हो या प्रजा।
अकबर अपनी सेना के साथ गोइंदवाल साहिब गुरुद्वारा पहुंचा। यहां उसने सबसे पहले लंगर की व्यवस्था देखी, जहां हर व्यक्ति एक ही पंक्ति में बैठकर सादा भोजन ग्रहण करता था। यात्रियों, गरीबों, अजनबियों और संगत सभी के लिए लंगर दिन-रात खुला रहता था। सभी के लिए समान व्यवस्था थी।

सेवादारों ने अकबर को भी लंगर में बैठाकर सभी के साथ भोजन कराया। अकबर को किसी प्रकार का राजसी सम्मान या विशेष आसन नहीं दिया गया। यह समानता का जीवंत संदेश था। इसे देखकर वह आश्चर्यचकित हुआ क्योंकि इस्लाम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, जहां सभी के अधिकार समान हों। अकबर ने यह भी देखा कि लंगर में सेवा करने वाले स्वयं श्रद्धालु ही हैं और भोजन भी समाज के सहयोग से तैयार होता है। इस व्यवस्था ने उसे गहराई से प्रभावित किया, क्योंकि यहां सत्ता नहीं, सेवा का सम्मान था और अधिकार नहीं, बल्कि समानता का भाव था। गुरु अमरदास जी का यह आदर्श उस समय के सामाजिक ढांचे के लिए अत्यंत प्रेरणादायक था।
भोजन के बाद जब अकबर की गुरु अमरदास जी से बातचीत हुई, तो वह उनके तेजस्वी व्यक्तित्व को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। उसने गुरुजी से पूछा कि जहां उसके साथ हर समय श्रेष्ठ हकीम रहते हैं और उसके लिए सबसे उत्तम भोजन तैयार किया जाता है, वहीं इतनी अधिक आयु होने के बावजूद गुरु के चेहरे पर इतना अद्भुत तेज कैसे है?
गुरु अमरदास जी ने मुस्कुराते हुए अकबर को उत्तर दिया कि वे भी वही साधारण भोजन ग्रहण करते हैं, जो सभी लोग लंगर में करते हैं। उनके चेहरे की आभा किसी विशेष आहार से नहीं, बल्कि परमात्मा के निरंतर स्मरण, सेवा और सत्य के मार्ग से आती है।
यह उत्तर केवल अकबर के प्रश्न का जवाब नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसके भीतर बसे ईश्वर-स्मरण और निष्काम सेवा से प्रकट होता है।
गुरु अमरदास जी के सिद्धांतों और लंगर की व्यवस्था से प्रभावित होकर अकबर ने विदा होने से पहले उनके सामने एक प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि वह लंगर के संचालन के लिए भूमि दान करना चाहता है, ताकि यह महान सेवा कार्य और अधिक व्यापक रूप से चलता रहे।
लेकिन गुरु अमरदास जी ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अकबर को बताया की गुरु नानक की परंपरा का आधार है कि ईमानदारी से कमाना और अपनी कमाई में से दूसरों के साथ बांटना। गुरु का लंगर किसी राजा के अनुदान पर नहीं, बल्कि संगत की श्रद्धा, सेवा और स्वैच्छिक योगदान पर चलता है। यदि राजसी दान स्वीकार कर लिया जाए, तो यह उस मूल भावना के विपरीत होगा, जिसके आधार पर लंगर की स्थापना हुई है। गुरु ने स्पष्ट किया कि यहां हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार देता है और अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करता है। यही कारण है कि इस व्यवस्था में किसी प्रकार का ऊंच-नीच या आश्रित होने का भाव उत्पन्न नहीं होता।
गुरु अमरदास जी के विचारों को सुनकर अकबर उनके सामने नतमस्तक हो गया। इसीलिए यह प्रसंग केवल एक सम्राट और एक संत की भेंट का वर्णन नहीं है, बल्कि यह भारत की उस आध्यात्मिक शक्ति का भी उदाहरण है, जिसने सत्ता को भी अपने सिद्धांतों के सामने प्रभावित होने पर विवश कर दिया। यही कारण है कि उनका यह निर्णय आज भी सेवा, समानता और आत्मसम्मान की अमर मिसाल माना जाता है। 5 मई, 1479 को जन्मे गुरु अमरदास जी ने 1 सितंबर 1574 को अपनी देह का त्याग किया। वह अपने पूरे जीवन काल में गुरु नानकदेव जी के विचारों को आगे बढ़ाते रहे।

