दमिश्क के दरबार में खलीफा ने एक लकड़ी का बक्सा खोला और दो बंदी राजकुमारियों को अंदर देखने का आदेश दिया। यह खलीफा के सबसे सफल सेनापति, मुहम्मद बिन कासिम की लाश थी, जो एक सिली हुई बैल की खाल में सड़ रही थी। खलीफा ने कहा, “जो लोग मेरा अनादर करते हैं उनका यही हाल होता है।” लेकिन ये घटना घटी कैसे?
712 ई. में, अरोर की लड़ाई में इस्लामिक आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध के राजा दाहिर की हत्या के बाद उनकी बेटियों सूर्या देवी और उनकी छोटी बहन परिमल देवी को जंजीरों में बांधकर घसीटा गया था। भारतीय इस्पात, रेशम, मसाले, हाथी दांत और कीमती रत्नों से लदे व्यापारिक जहाजों से भरा राजा दाहिर का समृद्ध क्षेत्र बिखर गया और उनकी बेटियों को खलीफा के लिए उपहार के रूप में दमिश्क भेज दिया गया।
एक विदेशी महल में फंसी और हरम में भेजे जाने के लिए चुनी गई सूर्य देवी ने अपने पास बचे एकमात्र हथियार का सहारा लिया, अपनी बुद्धिमानी। अपने पिता के दरबार में शासन-कला, सैन्य विज्ञान और वैदिक दर्शन की शिक्षा पाने वाली सूर्य देवी का पालन-पोषण सिंध की राजकुमारी के तौर पर हुआ था। अब बंदी बनी सूर्य देवी ने खलीफा का भरोसा और विश्वास जीतने की कोशिश शुरू कर दी।
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जब सही मौका आया, तो उसने खलीफा को बताया कि दमिश्क भेजने से पहले मुहम्मद बिन कासिम ने दोनों बहनों की बेअदबी की थी। यह आरोप सोच-समझकर लगाया गया था। खलीफा के लिए यह देशद्रोह जैसा था, एक जनरल द्वारा उसकी चीज हड़प लेना। गुस्से में आकर उसने तुरंत आदेश दिया, ‘कासिम को कच्चे चमड़े में लपेटकर एक संदूक में बंद किया जाए और पूरे साम्राज्य में घुमाया जाए’।
आदेश का पालन हुआ, और 10-12 दिन बाद जब जहाज़ पहुंचा, तो उसकी लाश इतनी सड़ चुकी थी कि कीड़े उसे खा रहे थे। मुहम्मद बिन कासिम,जिसने लाखों लोगों को मारा, मंदिर और खजाना लूटा और लाखों लोगों को बंदी बनाया, उसे उसी के खलीफा ने मरवा दिया।
तभी सूर्य देवी ने सच कबूल किया। यह सब उनके पिता की मौत और उनके राज्य को जलाए जाने का बदला लेने के लिए प्लान किया गया था। उन्होंने राजा दाहिर का बदला लेने और खुद को व परिमल देवी को गुलामी से बचाने के लिए कासिम की जान का सौदा किया था।
खलीफा को एहसास हुआ कि उन्हें बहकाकर उसके सबसे काबिल जनरलों में से एक को मरवा दिया गया था। गुस्से में आकर उसने दोनों राजकुमारियों को महल की दीवार में जिंदा चुनवा देने का आदेश दिया। कैद में बेइज्जती सहने के बजाय उन्होंने मौत को चुना और ऐसा करके, उन्होंने अपनी आखिरी जीत हासिल की।
सूर्य देवी और परिमल देवी की समझदारी इस बात में है कि कैसे उन्होंने पूरी तरह बेबस हालत में भी मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ा। बिना किसी सेना, बिना किसी साथी और बिना किसी आजादी के, उन्होंने राजनीतिक चालों और संकट के समय सही फैसले लेने की काबिलियत का इस्तेमाल करके उस जनरल को हरा दिया जिसने उनका घर बर्बाद कर दिया था।
इस तरह सिंध की बेटियों ने तब मुकाबला किया, जब उनकी सेनाएं ऐसा नहीं कर पाईं।

