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  • उन्होंने अंग्रेजों की जासूसी की, उन पर गोली चली, फिर भी ना डरीं : 16 साल की महिला जासूस सरस्वती राजामणि की अनकही कहानी

    उन्होंने अंग्रेजों की जासूसी की, उन पर गोली चली, फिर भी ना डरीं : 16 साल की महिला जासूस सरस्वती राजामणि की अनकही कहानी

    “हम लूटने वालों को गोली मारकर मार देते हैं, है ना? अंग्रेज हमें लूट रहे हैं, और बड़ी होकर मैं उनमें से कम से कम एक को तो गोली जरूर मारूंगी।” 

    1937 में कही गई ये बातें 10 साल की सरस्वती राजामणि की थीं। तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि वह छोटी सी बच्ची अपनी बात को कितनी गंभीरता से ले रही थी। सात साल बाद, केवल 16 साल की उम्र में, भागने के बजाय सरस्वती राजामणि ने एक नाचने वाली लड़की का वेश धरा और अंग्रेजों के कम्पाउंड में घुस गईं। फिर गार्ड्स को अफीम मिली ड्रिंक्स पिलाकर और उनके सुस्त होने की प्रतिक्षा की। जब गार्ड्स बेहोश हो गए, तो सरस्वती, दुर्गा की कोठरी तक पहुंचीं और अंग्रेजों की कड़ी निगरानी के बीच उन्हें भागने में मदद की। 

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  • फुलागुरी धावा (1861) : असम का पहला किसान विद्रोह और वे तीन शहीद, जिन्होंने अंग्रेजों का सामना किया।

    फुलागुरी धावा (1861) : असम का पहला किसान विद्रोह और वे तीन शहीद, जिन्होंने अंग्रेजों का सामना किया।

    Phulaguri Dhawa (1861):1861 में, असम के फुलागुरी में टेढ़ी-मेढ़ी कोलोंग नदी के किनारे, लोगों की जिंदगी खेतों, जंगलों और मौसमों के हिसाब से चलती थी। तिवा और कचारी जनजातियों के लोग पीढ़ियों से वहां अपनी रीतियों और परंपराओं के साथ रह रहे थे। 

    लेकिन अब यह लय टूटने लगी थी। अंग्रेजों ने पोस्ता की खेती पर रोक लगा दी थी, जिससे लोगों को महंगी सरकारी अफीम खरीदने पर मजबूर होना पड़ा। एक नए ‘रेसिडेंस टैक्स’ (घर में रहने का टैक्स) की वजह से लोगों को अपने ही घरों में रहने के लिए पैसे देने पड़ते थे। और अब यह डर भी सताने लगा था कि तंबाकू, पान, सुपारी और पान के पत्तों पर भी टैक्स लगाया जाएगा। जो गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा था, उसने आखिरकार गांव वालों को घरों से बाहर निकलकर फुलागुरी की ओर बढ़ने पर मजबूर कर दिया।

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  • जब भगत सिंह को गिरफ्तारी से बचाया था, जानिए दुर्गा भाभी ने अंग्रेजों को कैसे दिया था सबसे बड़ा चकमा?

    जब भगत सिंह को गिरफ्तारी से बचाया था, जानिए दुर्गा भाभी ने अंग्रेजों को कैसे दिया था सबसे बड़ा चकमा?

    17 दिसंबर 1928 का दिन लाहौर के इतिहास में क्रांतिकारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य भगत सिंह और शिवराम राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेते हुए ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स को गोली मार दी। 

    वास्तविक निशाना जेम्स स्कॉट था, लेकिन सॉन्डर्स मारा गया। हत्या के तुरंत बाद ब्रिटिश पुलिस ने पूरे लाहौर में सख्त नाकेबंदी लगा दी। सैकड़ों पुलिसकर्मी, खुफिया एजेंट और चेकपॉइंट्स सक्रिय हो गए। वे खासतौर पर दाढ़ी-केश वाली सिख छवि वाले युवा क्रांतिकारी भगत सिंह की तलाश में थे। शहर में तनाव व्याप्त था और गिरफ्तारी लगभग तय मानी जा रही थी।

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  • चतरा की लड़ाई 1857: जयमंगल पांडे ने कैसे अंग्रेजों के खिलाफ़ रुख किया और उनसे लड़ाई लड़ी

    चतरा की लड़ाई 1857: जयमंगल पांडे ने कैसे अंग्रेजों के खिलाफ़ रुख किया और उनसे लड़ाई लड़ी

    The Battle of Chatra (1857): साल 1857 में, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध बड़ा विद्रोह छोटा नागपुर तक पहुंच गया और इस इलाके को अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोध का एक और मोर्चा बना दिया। रांची से लेकर डोरंडा, हजारीबाग और चतरा तक, भारतीय विद्रोही सैनिक और स्थानीय समर्थक ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार को मानने से इनकार करने लगे। जल्द ही चतरा इस संघर्ष का एक अहम युद्ध-क्षेत्र बन गया। 

    चतरा केवल एक युद्ध-क्षेत्र नहीं था, यह छोटा नागपुर, बिहार व अवध में विद्रोहियों के मजबूत ठिकानों के बीच एक रणनीतिक प्रवेश-द्वार था। अंग्रेजों के लिए, विद्रोहियों को चतरा में ही रोकना बहुत जरूरी था ताकि वे कंपनी के शासन के विरुद्ध कोई बड़ा और संगठित मोर्चा न बना सकें। 

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  • भगत सिंह के शव से जुड़ा वह रहस्य, जिसे छिपाने के लिए अंग्रेजों ने लगा दिया था पूरा तंत्र

    भगत सिंह के शव से जुड़ा वह रहस्य, जिसे छिपाने के लिए अंग्रेजों ने लगा दिया था पूरा तंत्र

    23 मार्च 1931…, यह तारीख सुनते ही हर भारतीय के मन में भगत सिंह के बलिदान का चित्र उभर आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस रात भारत के इस अमर क्रांतिकारी ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा, उसके बाद अंग्रेजों ने ऐसा क्या किया, जिसे दशकों तक लोगों की नजरों से छिपाकर रखा गया? 

    यह कहानी सिर्फ एक फांसी की नहीं, बल्कि उस क्रूरता की है, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया था। अंग्रेजी हुकूमत ने केवल भगत सिंह की जान ही नहीं ली, बल्कि उनके निर्जीव शरीर तक से ऐसा व्यवहार किया, जो कोई जानवरों के साथ भी करने से पहले हजार बार सोचे। आखिर उस रात लाहौर सेंट्रल जेल के अंदर क्या हुआ था? क्यों अंग्रेज अधिकारियों ने इतनी जल्दबाजी दिखाई? आखिर क्यों भगत सिंह के पार्थिव शरीर के साथ ऐसी क्रूरता की गई? इस सवाल का जवाब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक अध्याय में छिपा है।

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  • सुहासिनी गांगुली ने चटगांव शस्त्रागार छापे के क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से कैसे बचाया?

    सुहासिनी गांगुली ने चटगांव शस्त्रागार छापे के क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से कैसे बचाया?

    1930 के दशक में अंग्रेज, चटगांव शस्त्रागार छापे के पीछे के क्रांतिकारियों की तलाश में बंगाल के कोने-कोने में छानबीन कर रहे थे। इनाम घोषित किए गए, छापे तेज हो गए और गिरफ्तारियां आम बात हो गईं। फिर भी  युवा क्रांतिकारी अंग्रेजों की पकड़ से दूर रहे क्योंकि वे एक ऐसी जगह छिपे थे, जिस पर किसी को शक भी नहीं हो सकता था, एक युवा स्कूल शिक्षिका सुहासिनी गांगुली के घर में, जिन्होंने चंदननगर के एक साधारण से घर को सबसे सुरक्षित छिपने की जगहों में से एक में बदल दिया था।

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  • Battle Of Haifa: जब ब्रिटिश बख्तरबंद गाड़ियां और पैदल सैनिक भी नाकाम रहे, तब भारतीय घुड़सवारों ने जीत लिया हाइफा

    Battle Of Haifa: जब ब्रिटिश बख्तरबंद गाड़ियां और पैदल सैनिक भी नाकाम रहे, तब भारतीय घुड़सवारों ने जीत लिया हाइफा

    Battle Of Haifa: प्रथम विश्व युद्ध अपने अंतिम चरण में था। फिलिस्तीन में उस्मानी साम्राज्य की सेना लगातार पीछे हट रही थी, लेकिन हाइफा अब भी एक कठिन सैन्य चुनौती बना हुआ था। शहर के सामने किशोन नदी, पीछे माउंट कार्मेल की ऊंचाइयां और इनके बीच दुश्मन की तोपें, मशीनगनें और मजबूत रक्षात्मक मोर्चे मौजूद थे।

    इससे पहले बख्तरबंद गाड़ियों और ब्रिटिश इकाइयों के प्रयास भी इस क्षेत्र में निर्णायक सफलता हासिल नहीं कर सके थे। लेकिन 23 सितंबर 1918 को हाइफा की ओर बढ़ रही सेना के पास एक ऐसा हथियार था, जिसे आधुनिक युद्ध लगभग अप्रासंगिक मानने लगा था, घोड़े, तलवारें और लंबे भाले। इन पर सवार थे भारत के जोधपुर और मैसूर लांसर्स। कुछ ही घंटों में उन्होंने यह साबित कर दिया कि सही भूभाग, सही गति और साहस के साथ घुड़सवार सेना अब भी मशीनगनों और तोपों से लैस दुश्मन को परास्त कर सकती है।

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  • भाऊसाहेब रंगारी ने भगवान गणेश के नाम पर रची थी क्रांति, जिसने अंग्रेजों की उड़ा दी थी नींद! 

    भाऊसाहेब रंगारी ने भगवान गणेश के नाम पर रची थी क्रांति, जिसने अंग्रेजों की उड़ा दी थी नींद! 

    अंग्रेजों को हराने के लिए हमेशा तलवारें ही नहीं उठाई गईं, एक धार्मिक उत्सव भी सबसे बड़ा हथियार बना था। स्वधीनता संग्राम के दौरान महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत भी, ऐसी ही एक क्रांतिकारी योजना थी। जिसके पीछे थे श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी (भाऊ लक्ष्मण जावले)। 

    व्यवसायी भाऊसाहेब क्रांतिकारियों की मदद करने के लिए जाने जाते थे। इसीलिए उन्होंने गणेशोत्सव को केवल पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्र जागरण का अभियान बना दिया। यह वह दूरदर्शी सोच थी, जिसने एक धार्मिक आयोजन को अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध सांस्कृतिक क्रांति और राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बना दिया। पहली बार सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन करने वाले भाऊसाहेब रंगारी गणेश उत्सव को क्रांति का माध्यम कैसे बनाया, यह कहानी काफी रोचक है।

    1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने पूरे देश में दमन की नीति अपनाई। सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। ऐसे समय में पुणे के शालुकर बोल क्षेत्र में रहने वाले भाऊसाहेब रंगारी, राष्ट्र की दशा को लेकर चिंतित थे। वे पेशे से प्रसिद्ध राजचिकित्सक थे, लेकिन उनका मन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था।

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  • कोरल मिल हड़ताल के दौरान वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ 1,700 मजदूरों का नेतृत्व कैसे किया?

    कोरल मिल हड़ताल के दौरान वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ 1,700 मजदूरों का नेतृत्व कैसे किया?

    जब तमिलनाडु में तूतीकोरिन (जिसे अब आधिकारिक तौर पर थूथुकुडी के नाम से जाना जाता है) में कोरल मिल के श्रमिक 27 फरवरी, 1908 को काम छोड़कर चले गए, यानी हड़ताल किया, तो वे बेहतर मजदूरी के लिए लड़ रहे थे। 

    हड़ताल खत्म होने तक उन्होंने ब्रिटिश राज का आत्मविश्वास हिला दिया था। ब्रिटिश स्वामित्व वाली सूती मिल के अंदर विरोध प्रदर्शन के रूप में जो शुरू हुआ, उसने जल्द ही तूतीकोरिन में श्रमिकों, वकीलों, व्यापारियों, किसानों और आम नागरिकों को एकजुट कर दिया। जिस व्यक्ति ने इसे संभव बनाया वह वी.ओ.सी. यानी चिदम्बरम पिल्लई थे। चिदम्बरम पिल्लई जो (वी.ओ.सी. के नाम से भी जाने जाते थे), एक प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, वकील और तमिलनाडु के उद्यमी थे, जिनके नेतृत्व ने स्थानीय श्रम विवाद को औपनिवेशिक सरकार के लिए संकट में बदल दिया।

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  • जब महादजी सिंधिया ने अंग्रेजों को खर्च के बोझ से हराया! ग्वालियर की वह कहानी, जिसे इतिहास में दबा दिया गया

    जब महादजी सिंधिया ने अंग्रेजों को खर्च के बोझ से हराया! ग्वालियर की वह कहानी, जिसे इतिहास में दबा दिया गया

    3 अगस्त 1780 को अंग्रेजों ने ग्वालियर के अभेद्य किले पर कब्जा कर लिया। यह सब कुछ तब हुआ, जब ग्वालियर के शासक महादजी सिंधिया, ग्वालियर में नहीं थे। आधुनिक तोपों और हथियारों के बल पर मिली इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को विश्वास हो गया था कि अब महादजी सिंधिया और मराठों की उत्तर भारत में शक्ति समाप्त हो जाएगी।

    लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता था कि महादजी केवल तलवार के बल पर युद्ध नहीं लड़ते थे, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत मराठा युद्ध नीति थी। आखिर में यही युद्ध नीति, अंग्रेजों पर आर्थिक रूप से इतनी भारी पड़ी कि वह संधि करने पर मजबूर हुए। जिसके बाद सिर्फ ग्वालियर किला ही नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-भाग फिर से महादजी के राज्य में शामिल हो गया। आखिर उन्होंने यह सब कैसे किया? वह कौन सा रणनीति थी?  यह काफी रोचक कहानी है।

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