मार्च 1891 में, सुदूर राज्य मणिपुर में कुछ ऐसा हुआ जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को सदमे में डाल दिया। असम के मुख्य आयुक्त जेम्स वालेस क्विंटन सहित कई ब्रिटिश अधिकारियों को पकड़ लिया गया और मार डाला गया। यह खबर पूरे औपनिवेशिक भारत में तेजी से फैल गई।
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जब ब्रिटिश शासन का टूटा घमंड : जानिए गुरु का बाग मोर्चा और सिखों का अभूतपूर्व अहिंसक संग्राम का इतिहास
अमृतसर से केवल 25 किलोमीटर दूर घुक्केवली गांव में गुरु अर्जन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी के पावन आगमन से जुड़े दो ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं। वहां महाराजा रणजीत सिंह ने एक विशाल भूमि दान की थी। वह अब ‘गुरु का बाग’ कहलाती है।
1920 के दशक तक इसका प्रबंधन उदासी संप्रदाय के महंत सुंदर दास के पास था। सिखों को गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए ब्रिटिश शासन ने हक नहीं दिया था, बल्कि हिंदू-सिखों के बीच ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के तहत उदासी संप्रदाय को दे रखा था।
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जब भाई दया सिंह ने हजारों किलोमीटर की जोखिम भरी यात्रा कर औरंगजेब तक पहुंचाया था गुरु गोबिंद सिंह जी का ‘जफरनामा’
वर्ष 1704 में पंजाब की धरती युद्ध, विश्वासघात और बलिदानों की साक्षी बन चुकी थी। आनंदपुर साहिब के लंबे घेरे, चमकौर के युद्ध और गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबजादों के बलिदान के बाद ऐसा लग रहा था कि मुगल शासन उस हर शक्ति का दमन कर देगी, जो उसके खिलाफ उठेगी। लेकिन वर्ष 1706 में एक ऐसी घटना घटी, जिसने न केवल औरंगजेब की सत्ता को चुनौती दी, बल्कि उसके नैतिक आधार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया।
यह घटना थी गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखे गए जफरनामा को मुगल शासक औरंगजेब तक पहुंचाने की और इस ऐतिहासिक कार्य को अंजाम दिया था खालसा पंथ के पहले पंच प्यारों में से एक, भाई दया सिंह ने। जफरनामा, जिसका अर्थ है ‘विजय-पत्र’, फारसी भाषा में लिखा गया एक ऐसा दस्तावेज, जिसमें गुरु गोबिंद सिंह जी ने औरंगजेब को उसके द्वारा किए गए विश्वासघात, अत्याचार और कुरान पर खाई गई झूठी कसमों की याद दिलाई थी। यह पत्र किसी सामान्य संदेशवाहक के हाथों नहीं भेजा जा सकता था। उस समय गुरु जी मुगल सत्ता के सबसे बड़े विरोधी माने जाते थे और उनके प्रत्येक अनुयायी पर नजर रखी जा रही थी। ऐसे में यह जिम्मेदारी भाई दया सिंह को सौंपी गई, उनके इस काम में भाई धरम सिंह को भी लगाया गया।
उन्हें पंजाब के दीना गांव से गुरु गोविंद सिंह का दूत बनकर अहमदनगर में डेरा डाले औरंगजेब को यह दस्तावेज सौंपना था।
गुरु गोबिंद सिंह चाहते, तो यह दस्तावेज औरंगजेब के किसी दूत के माध्यम से भी उस तक पहुंचा सकते थे, लेकिन गुरु जी जानना चाहते थे कि इसे पढ़ने पर क्रूर शासक के चेहरे के हाव-भाव क्या होंगे, उसकी तत्काल क्या प्रतिक्रिया होगी? ऐसे में उन्होंने भाई दया सिंह को दूत बनाकर भेजा, जिससे दया सिंह उस स्थिति को बाद में भली-भांति उन्हें बता सके।
उस समय औरंगजेब दक्कन में अपने अंतिम सैन्य अभियानों में व्यस्त था और उसका शाही शिविर अहमदनगर के आसपास स्थित था। पंजाब के दीना गांव से अहमदनगर की दूरी लगभग 1600 किलोमीटर थी। आज के आधुनिक परिवहन साधनों के बिना यह यात्रा उस समय बेहद कठिन थी। यह यात्रा लंबी होने के साथ-साथ खतरनाक भी थी। इस यात्रा में घोड़े, पैदल मार्ग और विभिन्न स्थानीय रास्तों का उपयोग करते हुए ही पहुंचना था। रास्ते में मुगल चौकियां थीं, सैनिक गश्त थी और गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुयायियों की तलाश लगातार चल ही रही थी। यदि उनकी पहचान उजागर हो जाती, तो उन्हें तुरंत गिरफ्तार करके मृत्युदंड दिया जा सकता था। इसके बावजूद उन्होंने यह मिशन स्वीकार किया। वे जानते थे कि यह दस्तावेज सत्य और न्याय का संदेश था, जिसे भारत के सबसे क्रूर शासक तक पहुंचाना आवश्यक था। भाई दया सिंह और भाई धरम सिंह को घोड़े, पैदल मार्ग और विभिन्न स्थानीय रास्तों का उपयोग करते हुए कई महीनों तक यात्रा करनी पड़ी।
अंतत: भाई दया सिंह और भाई धरम सिंह अहमदनगर आ पहुंचे। लेकिन अहमदनगर पहुंच जाना ही पर्याप्त नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती थी मुगल सम्राट तक प्रत्यक्ष पहुंच बनाना। आम व्यक्ति के लिए सम्राट तक पहुंचना लगभग असंभव था और यहां तो संदेशवाहक ऐसे व्यक्ति थे जो मुगल सत्ता के सबसे बड़े विरोधी के प्रतिनिधि थे। ऐसे में उनकी औरंगजेब से शीघ्र मुलाकात नहीं हो सकी। इसके लिए भी उन्हें कुछ हफ्ते और लग गए। क्योंकि यह पत्र उन्हें सीधे औरंगजेब को देना था नाकि उसके किसी दूत के माध्यम से भिजवाना था। फिर वह भी दिन आया, जब भाई दया सिंह औरंगजेब के सामने उपस्थित हुए और दस्तावेज उन्हें सौंप दिया।
जब औरंगजेब दस्तावेज पढ़ रहा था तो भाई दया सिंह उसके चेहरे के भावों को गौर से देख रहे थे। उन्होंने देखा कि औरंगजेब के चहरे के भाव तेजी से बदल रहे थे, पश्चात्ताप और आत्मग्लानि के भाव उसके चेहरे पर दिखे, उसके बाद चाहरे पर मायूसी साफ झलक रही थी। गुरु गोबिंद सिंह जी ने पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि उसने कुरान की कसम खाकर आनंदपुर छोड़ने का सुरक्षित मार्ग देने का वचन दिया था, लेकिन बाद में उस वचन को तोड़ दिया। गुरु जी ने उसे याद दिलाया कि सच्चा शासक वही होता है जो अपने वचनों का पालन करे।
सिख परंपरा में यह माना जाता है कि जफरनामा पढ़ने के बाद औरंगजेब आत्ममंथन करने लगा। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी को मिलने के लिए आमंत्रित भी किया। कुछ स्रोतों के अनुसार उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि गुरु जी के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। हालांकि इससे पहले कि दोनों की मुलाकात हो पाती, 20 फरवरी 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गई।
भाई दया सिंह की इस यात्रा का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने एक पत्र पहुंचाया। वास्तव में उन्होंने उस युग के सबसे क्रूर मुगल शासक के सामने सत्य को खड़ा किया। जब अधिकांश लोग औरंगजेब के भय से उसके सामने थरथर कांपते थे, तब भाई दया सिंह हजारों किलोमीटर की खतरनाक यात्रा करके उसके दरबार में गुरु का संदेश लेकर पहुंचे। 26 अगस्त 1669 में लाहौर में जन्में भाई दया सिंह का यह साहस, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का अद्वितीय उदाहरण है।
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भारत की पहली अदालती फांसी : राजा नंदकुमार की ‘न्यायिक हत्या’! अंग्रेजों का खूनी खेल
साल 1775। कलकत्ता में हजारों लोग की भीड़ जमा थी। एक प्रतिष्ठित भारतीय अधिकारी को फांसी पर चढ़ाया जाने वाला था। उसका अपराध हत्या, डकैती या देशद्रोह नहीं था। उसका सबसे बड़ा अपराध था, ब्रिटिश भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना।
राजा नंदकुमार बंगाल के एक प्रभावशाली प्रशासक और कर-संग्रह अधिकारी थे। उन्होंने वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ काम किया था और बंगाल की राजनीति को करीब से देखा था। 1774 में जब रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत वॉरेन हेस्टिंग्स ब्रिटिश भारत का पहला गवर्नर-जनरल बना, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही महीनों बाद उसके खिलाफ रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप सामने आएंगे।
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नेशनल हार्ट ट्रांसप्लांट डे : भारत में हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली प्रीति उन्हाले की कहानी
दिसंबर 2023 में, 51 साल की एक महिला ने भारत के पहले ‘ट्रांसप्लांट गेम्स’ में बैडमिंटन में गोल्ड मेडल जीता। कोर्ट के बाहर, वह AIIMS में मरीजों की काउंसलिंग करती हैं और उन्हें जानलेवा बीमारियों के बावजूद हिम्मत न हारने के लिए प्रेरित करती हैं। पहली नज़र में, उनके जीवन में कुछ भी खास नहीं लगता।
लेकिन असल बात तो यही है। पिछले 25 सालों से, प्रीति उन्हाले एक उस 14 साल के लड़के का दिल अपने शरीर में ट्रांसप्लांट करवाकर जी रही हैं, जिसकी सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उस लड़के का नाम तो किसी को नहीं पता, लेकिन उसके आखिरी तोहफ़े ने प्रीति को जीवन का दूसरा मौका दिया। आज, वह भारत में हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली महिला हैं।
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मेजर ओंकार सिंह कलकट: वह भारतीय अधिकारी, जिन्होंने पाकिस्तान के 1947 के हमले, ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ का पर्दाफाश किया
वर्ष 1947 में, विभाजन की अराजकता के बीच, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) के सीमावर्ती शहर बन्नू में, एक भारतीय सेना अधिकारी को एक गुप्त पत्र मिला, जिसमें जम्मू और कश्मीर पर आक्रमण, ऑपरेशन गुलमर्ग की रूपरेखा का विवरण दिया गया था। उनका नाम मेजर ओंकार सिंह कालकट था।
इसके बाद की कहानी बंटवारे से बर्बाद हुए इलाके से हिम्मत दिखाकर भागने और भारत के नेताओं को जम्मू-कश्मीर पर होने वाले हमले के बारे में आगाह करने की कोशिश की है। उस समय जम्मू-कश्मीर महाराजा हरि सिंह के अधीन एक स्वतंत्र रियासत थी।
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महारानी ताराबाई : जब 25 वर्षीय महारानी ने औरंगजेब के साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया
मार्च 1700। दक्कन की पहाड़ियों पर धूल उड़ रही थी और मराठा साम्राज्य का भविष्य अंधकार में डूबा दिखाई दे रहा था। छत्रपति शिवाजी महाराज के छोटे पुत्र और मराठा साम्राज्य के शासक छत्रपति राजाराम का निधन हो चुका था। वर्षों से चल रहे युद्ध ने मराठों को थका दिया था। उनके अनेक किले मुगल सेना के घेरे में थे और स्वयं सम्राट औरंगजेब लाखों सैनिकों के साथ दक्कन में डेरा डाले बैठा था।
दिल्ली से लेकर दक्कन तक यह चर्चा थी कि अब मराठों का अंत निश्चित है। लेकिन इसी निराशा के बीच 25 वर्ष की युवा महारानी ताराबाई भोसले आगे आईं। महान सेनापति हंबीरराव मोहिते की पुत्री ताराबाई बचपन से ही युद्ध और प्रशासन को समझती थीं। साल 1700 में पति की मृत्यु के बाद 25 वर्षीय विधवा ताराबाई ने मराठा सेना की कमान अपने हाथ में ले ली।
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अडास स्टेशन हत्याकांड 1942 : भारत छोड़ो आंदोलन में रमनभाई पटेल की शहादत
Adas Station Massacre 1942: 9 अगस्त 1942 को पूरे भारत में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए तेजी से कदम उठाए और उनके शुरुआती निशानों में से एक सरदार वल्लभभाई पटेल थे। अंग्रेज पटेल को इस आंदोलन के मुख्य आयोजकों में से एक मानते थे और उन्हें देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन संगठित करने की उनकी क्षमता से डर लगता था।
ठीक एक दिन पहले, बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में, वल्लभभाई पटेल ने एक जोरदार भाषण दिया था जिसमें भारतीयों से सविनय अवज्ञा और पूर्ण स्वतंत्रता के संघर्ष का समर्थन करने का आग्रह किया गया था।
कार्रवाई की आशंका को देखते हुए, पटेल ने आंदोलन के संगठनात्मक ढांचे को तैयार करने में भी मदद की थी ताकि वरिष्ठ नेताओं के जेल जाने पर भी यह जारी रह सके। उन्हें इस अभियान के पीछे एक बड़ी ताकत मानते हुए, अंग्रेजों ने सुबह 5:00 बजे उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अहमदनगर किले में कैद कर दिया।
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वो अदालत, जहां आरोपी नहीं कानून कटघरे में था : मदन लाल ढींगरा का कोर्ट में दिया गया वह बयान, जो इतिहास बन गया
उस दिन लंदन की अदालत में सन्नाटा पसरा हुआ था। सामने ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे बड़े न्यायाधीश बैठे थे, चारों ओर अंग्रेज अधिकारी और कटघरे में खड़ा था, एक 25 साल का भारतीय युवक। जिसके खिलाफ अत्याचारी ब्रिटिश सैन्य अधिकारी वायसराय विलियम हर्ट कर्जन वायली का वध करने के मामले पर सुनवाई चल रही थी।
अंग्रेजों को पूरी आशा थी कि यह युवक कोर्ट के सामने झुकेगा, अपने अपराध पर पछतावा जताएगा और खुद को सजा पाने से बचाने के लिए दलीलें देगा। लेकिन अगले कुछ मिनटों में जो हुआ, उसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई क्योंकि उस युवक ने दलीलें देने के बजाए, ब्रिटिश सरकार की न्याय व्यवस्था को ही चुनौती दे डाली। यह युवा कोई और नहीं बल्कि भारत के महान क्रांतिकारी मदन लाल ढिंगरा थे।
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1955 का गोवा सत्याग्रह : सहोद्रा देवी राय और करनैल सिंह बेनीपाल कैसे गोवा की आजादी की लड़ाई के प्रतीक बने
Goa Satyagraha of 1955: भारत की आजादी के आठ साल बाद भी गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन था। इसलिए, 15 अगस्त 1955 को, 20,000 से ज्यादा सत्याग्रहियों ने तिरंगा लेकर गोवा की सीमाओं पर इकट्ठा होने और एक बड़े अहिंसक आंदोलन के जरिए इसे भारत में शामिल करने की मांग करने का फैसला किया। इस आंदोलन में शामिल लोगों में दो अहम नाम थे: सहोदरा देवी राय, जो तिरंगा लेकर आगे बढ़ीं और पंजाब के एक युवा शिक्षक करनैल सिंह बेनीपाल, जो राष्ट्रीय एकता से प्रेरित होकर सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लेने आए थे।
सत्याग्रही शांतिपूर्वक कई जगहों से होते हुए गोवा में दाखिल हुए। ऐसी ही एक अहम जगह थी पात्रादेवी, जहां पुर्तगाली सैनिक और पुलिस भारी हथियारों के साथ तैनात थे और इलाके में किसी भी तरह के प्रवेश को रोकने के लिए सख्त पाबंदियां लागू थीं। साफ दिख रहे तनाव और राइफलों व मशीनगनों की मौजूदगी के बावजूद, प्रदर्शनकारी बिना हथियारों के आगे बढ़े। सहोदरा देवी राय भीड़ के ऊपर लहराते तिरंगे के साथ आगे बढ़ीं। यह उम्मीद और दृढ़ संकल्प का एक मज़बूत प्रतीक था।
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