नायर की गवाही की कसौटी : लंदन की अग्नि-परीक्षा में जलियांवाला का सच

Chettur Sankaran Nair

1919 में, जब जलियांवाला बाग का भयानक समाचार ब्रिटिश भारत के गलियारों तक पहुंची, तो उस समय एक ऐसा व्यक्ति भी था, जो इस व्यवस्था के भीतर ही मौजूद था।उसका नाम था चेट्टूर शंकर नायर।

वे एक अत्यंत सम्मानित और प्रतिष्ठित विधिवेत्ता थे, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और वायसराय की कार्यकारी परिषद के पूर्व सदस्य रह चुके थे।  

चेट्टूर शंकर नायर कानून, न्याय, शासन और सुधार में विश्वास रखते थे। लेकिन जब उन्हें जलियांवाला बाग में लोगों के सामूहिक नरसंहार की रिपोर्ट मिली और साथ ही ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा इसके लिए दिए गए स्पष्टीकरण के बारे में पता चला, तो रिपोर्ट में बताई गई हत्याओं की संख्या देखकर उन्हें गहरा सदमा लगा।

चेट्टूर शंकर नायर न केवल लोगों के इस सामूहिक नरसंहार से विचलित थे, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा इसके लिए दिए गए स्पष्टीकरण से भी बेहद परेशान थे। एग्जीक्यूटिव काउंसिल (कार्यकारी परिषद) के भीतर हुई अपनी बैठक के दौरान, उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण पर आपत्ति जताई, उनके शासन और व्यवस्था की कड़ी आलोचना की  और यह भी कहा कि यह पूरी तरह से नैतिकता और कानूनी व्यवस्था के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

ब्रिटिश लोगों के भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के दोहरे मापदंडों, तथा जलियांवाला बाग नरसंहार की सुनवाई के तरीके से आहत होकर, उन्होंने वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला किया। उस समय यह सबसे ऊंचे पदों में से एक था, जिस पर कोई भारतीय आसीन हो सकता था। उनका यह फैसला बहुत कठिन और दुर्लभ था, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की व्यवस्था के दोहरे मापदंड वाले रवैये के कारण यह कदम उठाया।  

जैसे-जैसे साल बीतते गए, चेट्टूर शंकर नायर का असंतोष यहीं नहीं रुका। वर्ष 1922 में उन्होंने ‘गांधी एंड एनार्की’ (Gandhi & Anarchy) नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने गांधीजी के दृष्टिकोणों और कार्यप्रणालियों की कड़ी आलोचना की। इस पुस्तक में उन्होंने तर्क दिया कि असहयोग आंदोलन ने कानून-व्यवस्था के प्रति सम्मान को कमजोर किया है। सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) के कारण भीड़-हिंसा भड़की है और बिना किसी संस्थागत सुरक्षा या गारंटी के किया गया राजनीतिक आंदोलन, व्यवस्था के भीतर अराजकता ही पैदा करेगा।

चेट्टूर शंकर नायर ने ओ’डायर पर भी आरोप लगाया, जो पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर थे कि जलियांवाला बाग में हुए अत्याचारों के लिए वह सीधे तौर पर दोषी थे। उन्होंने डायरपर पंजाब के लोगों को आतंकित करने, निर्दोष लोगों के नरसंहार और मार्शल लॉ को सही ठहराने का आरोप लगाया। इसके जवाब में, ओ’डायर ने नायर के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया।

साम्राज्य न केवल उस व्यक्ति का बचाव कर रहा था, बल्कि अपनी प्रतिष्ठा का भी बचाव कर रहा था। ओ’डायर ने मानहानि का दावा भी किया। नायर ने कहा कि उन्होंने नरसंहार की सच्चाई के बारे में बात की थी। इस दौरान, पंजाब के प्रशासन, मार्शल लॉ के उपायों और नरसंहार से जुड़ी घटनाओं की जांच की गई। ये सभी मामले सार्वजनिक दायरे में आ गए। और जूरी ने ओ’डायर के पक्ष में फैसला सुनाया। नायर के पास दो विकल्प थे, या तो माफी मांग लें, या जुर्माने के तौर पर 500 पाउंड का भुगतान करें।

लेकिन नायर ने 500 पाउंड का भुगतान करना चुना। उनके पास माफी मांगने का विकल्प भी था, जिससे जुर्माने की संभावना कम हो जाती, मामला खत्म हो जाता और उन्हें राहत मिल सकती थी। ऐसा करने से यह साबित हो जाता कि पंजाब में दमन की उनकी आलोचना पूरी तरह से गलत थी। इसलिए उन्होंने पहला विकल्प चुना।

कानूनी तौर पर वे यह लड़ाई हार गए, लेकिन अपने उस इनकार के द्वारा उन्होंने एक नैतिक मर्यादा बनाए रखी,  उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान को खुश करने के लिए सच्चाई को झुकने नहीं दिया। क्योंकि अगर वे पहला विकल्प चुनते, तो उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आती, और शाही अदालत में एक भारतीय न्यायाधीश के तौर पर उनके रुख पर ही सवाल उठ जाते।

इन सब बातों के बाद भी नायर के इस कदम ने एक और भी अधिक शक्तिशाली बात साबित की। वे उस समय के पहले ऐसे भारतीय न्यायाधीश थे, जिन्होंने पंजाब क्षेत्र में नैतिकता के मामले में साम्राज्य की विफलता पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया। उन्होंने गुस्से में आकर चीख-पुकार नहीं मचाई। उन्होंने हिंसा नहीं भड़काई। उन्होंने बदले की भावना नहीं रखी। उन्होंने कानून का सहारा लिया। उन्होंने तर्कों का इस्तेमाल किया। उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी और जब व्यवस्था ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया, तो उन्होंने जुर्माना स्वीकार कर लिया, लेकिन माफी मांगने की अपमानजनक शर्त को स्वीकार नहीं किया।

इतिहास अक्सर नाटकीय विद्रोहों का गुणगान करता है, लेकिन शंकर  नायर का विद्रोह कुछ अलग था। यह गरिमामय, संयमित और अडिग था। उन्होंने यह साबित कर दिया कि प्रतिरोध भी सत्यनिष्ठा का रूप ले सकता है और सच्चाई को जोर-शोर से चिल्लाने की जरूरत नहीं होती।  

कभी-कभी बिना माफी मांगे, 500 पाउंड का भुगतान करना, किसी भी नारे से कहीं ज्यादा जोरदार गूंज पैदा कर सकता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में, उनका नाम यह स्मरण कराता है कि ‘सत्ता भले ही फैसले जीत ले, पर अंतरात्मा तो इतिहास जीत सकती है।’