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    शिमला समझौता 1972 : आधी रात की एक बातचीत से कैसे हुआ समझौते पर हस्ताक्षर, लेकिन बाद में यह पाकिस्तान के सबसे बड़े अधूरे वादों में से एक बन गया

    Shimla Agreement 1972: दिसंबर 1971 में, एक बहुत बड़ी जंग अभी-अभी खत्म हुई थी। भारत ने युद्ध के मैदान में एक ऐतिहासिक और निर्णायक जीत हासिल की थी। एक ऐसी जीत जिसने उपमहाद्वीप का नक्शा ही बदल दिया और नई दिल्ली को बातचीत में वर्चस्व की स्थिति दे दी। भारत के पास था, जीती हुई जमीन का विशाल इलाका और 93,000 से ज्यादा पाकिस्तानी युद्धबंदी। पाकिस्तान के नए-नए बने राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के लिए, दांव पर लगी चीजें अकल्पनीय रूप से बड़ी थीं। वह अपने तबाह हो चुके देश को बचाने और अपने सैनिकों को घर वापस लाने की बेताबी में शिमला की इन पहाड़ियों पर आए थे। पाकिस्तान को हुए इसी भारी नुकसान की वजह से उसके राष्ट्रपति, जुल्फिकार अली भुट्टो, जुलाई 1972 में भारत के शिमला की पहाड़ियों पर आए, ताकि हारे हुए देश के पक्ष में एक समझौता कर सकें, जिसे 3 जुलाई 1972 के शिमला समझौते के नाम से जाना जाता है। 

    यह जगह बार्न्स कोर्ट थी, जो अब हिमाचल राजभवन है। हालांकि, बहुत कम लोगों को पता है कि इस सफलता की वजह क्या थी। यह मेज पर हुई कूटनीतिक बातचीत नहीं थी, बल्कि रात के खाने के बाद कैमरे से दूर हुई आम बातचीत थी, जिसने एक लगभग असफल हो चुकी चर्चा को एक बड़ा मोड़ दे दिया। इस निजी बातचीत के दौरान क्या हुआ, यही हम आज आपको बताने जा रहे हैं।


    पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो (बाएं) और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (दाएं)। इमेज सोर्स : India Today

    जब कूटनीति लगभग विफल हो गई

    दोनों नेताओं के बीच बातचीत के लिए बैठक 28 जून, 1972 को शुरू हुई और 30 जून तक बिना किसी आम सहमति के जारी रही। अगले दिन, 1 जुलाई, 1972 को, दोनों नेता एक गतिरोध पर पहुंच गए, जिसे बाद में बातचीत का सबसे अनिश्चित और नाजुक दौर बताया गया। भारतीय पक्ष की ओर से विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह और विदेश सचिव त्रिलोकी नाथ कौल थे, जबकि पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व अजीज अहमद और आफताब अहमद ने किया। 

    हालांकि, घंटों की बातचीत के बावजूद, दोनों पक्ष किसी व्यावहारिक रूपरेखा की पहचान करने में असमर्थ रहे। दोनों पक्षों के बीच विवाद के बिंदुओं में 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों (POWs) की वापसी और 1949 की युद्धविराम रेखा को एक स्थायी सीमा, या नियंत्रण रेखा (LoC) में बदलना शामिल था। यहां तक कि एक प्रारंभिक रूपरेखा पर भी सहमत न हो पाने के कारण बातचीत, एक बार फिर, अगले दिन के लिए टल गई।

    2 जुलाई को, बातचीत फिर से शुरू हुई। चूंकि यह नेताओं के यहां रहने का आखिरी दिन था, इसलिए दोनों टीमों ने बातचीत के नतीजों को दर्शाने वाला एक घोषणापत्र तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत की। फिर भी, कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अधिकारी एक संयुक्त घोषणापत्र का मसौदा तैयार करने के लिए भी संघर्ष करते रहे। फिर भी, बातचीत की गति को बनाए रखते हुए, दोनों पक्ष एक औपचारिक रात्रिभोज के लिए बैठे। ठीक उसी समय एक निर्णायक मोड़ आया।

    रात्रिभोज के बाद का निर्णायक मोड़

    दोनों तरफ के मंत्री पूरी तरह से थक चुके थे। एक जिद भरा, न टूटने वाला गतिरोध आ गया था। हारे हुए और थके-हारे, राजनयिक अपने-अपने कमरों में चले गए, यह मानकर कि अगली सुबह पूरी तरह से असफलता की सार्वजनिक घोषणा होगी। लेकिन असली सफलताएं शायद ही कभी शोर-शराबे वाली, भीड़-भाड़ वाली मेजों पर मिलती हैं। ये उन शांत, अनदेखी जगहों पर मिलती हैं जहां इंसान बिना किसी दिखावे या कवच के एक-दूसरे का सामना करते हैं।

    2 जुलाई की रात को, बार्न्स कोर्ट में औपचारिक रात्रिभोज के थोड़ी देर बाद, उसी रात दोनों नेताओं के बीच एक अनौपचारिक बातचीत हुई, एक ऐसा पल जिसे पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ ने ऐसे बताया है कि ‘अचानक गतिरोध टूट गया।‘ हालांकि, चूंकि यह दोनों नेताओं के बीच एक निजी, आमने-सामने की बातचीत थी और वहां कोई राजनयिक मौजूद नहीं था, इसलिए इसका जिक्र आधिकारिक रिकॉर्ड में नहीं मिलता। 

    उस रात के बारे में जो कुछ भी पता है, वह दोनों नेताओं के करीबी सहयोगियों और नौकरशाहों से पता चला है। इस रात, सचमुच एक बड़ी सफलता हासिल हुई, जो गहरी उदारता के एक काम से पैदा हुई थी, लेकिन जिसका हश्र इतिहास के सबसे बड़े अधूरे वादों में से एक बनना तय था।


    1972 में शिमला समझौते पर हस्ताक्षर के क्षण। चित्र स्रोत: News 18

    उस समय के ब्यूरोक्रेट एम.के. काव, जिन्हें जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी, युवा बेनजीर भुट्टो की देखभाल का काम सौंपा गया था, जो उनके साथ भारत आई थीं, को उस पल की यादें आज भी ताजा हैं। उन्होंने याद करते हुए बताया कि जब बातचीत टूट गई और सभी अपने-अपने कमरों में लौट गए, तो भुट्टो इंदिरा गांधी के कमरे में आए, ‘उनके पैरों पर गिर पड़े’ और उनसे कहा कि जब तक भारत पाकिस्तान के युद्धबंदियों (POWs) को रिहा नहीं कर देता, तब तक वह घर वापस नहीं जा सकते। काव ने बताया, ‘उन्होंने गांधी से कहा कि अगर वह किसी सम्मानजनक समझौते के बिना वापस गए, तो उन्हें भीड़ द्वारा मार डाला जाएगा, और उन्होंने गांधी से विनती की कि वह उन्हें कोई रास्ता दिखाएं।‘

    उस समय, गांधी ने भुट्टो से कहा कि वह चाहती हैं कि LoC (नियंत्रण रेखा) को एक अंतरराष्ट्रीय सीमा में बदल दिया जाए। भारत की प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति से साफ-साफ कह दिया कि अगर उन्हें यह बात लिखित में मिल जाती है, तो वह उनकी सभी मांगें मान लेंगी। 

    ठीक इसी पल सब कुछ बदल गया। जैसा कि इंदिरा गांधी के तत्कालीन सचिव पी.एन. धर बताते हैं, भारत की प्रधानमंत्री ने भुट्टो से पूछा कि क्या इसी समझ के आधार पर आगे बढ़ा जाए। इस पर भुट्टो ने जवाब दिया, “बिल्कुल! आप मुझ पर भरोसा कीजिए।” काव ने बताया कि गांधी भुट्टो की बातों के कायल हो गईं।

    इसके तुरंत बाद, दोनों नेता, इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो—मुख्य हॉल में गए और अपने-अपने अधिकारियों, पी.एन. धर और अजीज अहमद को बुलाया। वे उस मोटे तौर पर तैयार किए गए मसौदे पर बैठे और उसे अंतिम रूप दिया। आखिरकार, दोनों पक्ष सहमत हो गए, और दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने की तैयारी हो गई। इस मोड़ पर, बाकी राजनयिकों को बुलाया गया, और आधी रात के 40 मिनट बाद, यानी 3 जुलाई, 1972 को रात 12:40 बजे, औपचारिक रूप से समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

    भारत ने नब्बे हजार युद्धबंदियों को रिहा कर दिया और कब्जाई गई जमीनें लौटा दीं। उसने यह सब अत्यंत उदारता और सद्भावना के साथ किया, इस उम्मीद में कि यह महान कदम दोनों देशों के बीच एक स्थायी और मजबूत दोस्ती की नींव रखेगा।

    अधूरा वादा

    फिर भी, काव सही थे, गांधी, भुट्टो की लुभावनी बातों में आ गई थी, क्योंकि भुट्टो ने कभी अपना वादा नहीं निभाया। तब से, पाकिस्तान शिमला समझौते का लगातार उल्लंघन करता आ रहा है। LoC के पार से भारत में आतंकवादियों को हथियार देकर और घुसपैठ करवाकर, यहां तक कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान जमीनी हालात बदलने के लिए अपने सैनिक भेजकर भी और संयुक्त राष्ट्र तथा OIC की बैठकों में बार-बार कश्मीर का मुद्दा उठाकर, एक द्विपक्षीय विवाद को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाकर। 

    असल में, 2025 के पहलगाम हमले के बाद, जिसमें पाकिस्तानी आतंकवादियों ने दिन-दहाड़े 26 बेकसूर लोगों की जान ले ली थी, उसने शिमला समझौते को ‘निलंबित’ करने की घोषणा कर दी। हालांकि, यह एक कड़वी विडंबना है, क्योंकि जिस देश ने लगातार इस समझौते का उल्लंघन किया है, उसे इसे ‘निलंबित’ करने का कोई अधिकार नहीं है।

    50 से भी ज्यादा साल बाद, शिमला में आधी रात को हुई वह बैठक, आज भी एक शाश्वत याद दिलाती है कि जहां युद्ध ताकत से जीता जा सकता है, वहीं स्थायी शांति तभी बनी रह सकती है जब दोनों पक्ष पूरी निष्ठा से किसी वादे की रक्षा करें।

  • Kargil war :गोलियां लगने के बाद भी 4 बंकर तबाह किए, कैप्टन मनोज पांडे की खालूबार वाली आखिरी लड़ाई, जब पाकिस्तान की कमर टूटी  

    Kargil war :गोलियां लगने के बाद भी 4 बंकर तबाह किए, कैप्टन मनोज पांडे की खालूबार वाली आखिरी लड़ाई, जब पाकिस्तान की कमर टूटी  

    16,000 फीट की ऊंचाई पर बर्फीली रात में एक 24 साल का युवा कैप्टन दुश्मन के भारी गोलीबारी के बीच चार बंकरों को एक-एक करके तबाह कर रहा था, उसके शरीर में कई गोलियां लग चुकी थीं। यह है, कैप्टन मनोज कुमार पांडे की वह अद्भुत बहादुरी का किस्सा, जिसने कारगिल युद्ध के बटालिक सेक्टर का रुख ही बदल दिया। 

    आइए, जानते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान खालूबार रिज (Khalubar Ridge) की लड़ाई में आखिर क्या-क्या हुआ था और कैसे एक जवान अधिकारी के बलिदान ने इस युद्ध में भारत का पलड़ा भारी कर दिया था।

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  • मिजोरम शांति समझौता: 30 जून 1986 को हुई सबसे बड़ी शांति डील के पीछे एक अधिकारी की अनसुनी कहानी!

    मिजोरम शांति समझौता: 30 जून 1986 को हुई सबसे बड़ी शांति डील के पीछे एक अधिकारी की अनसुनी कहानी!

    पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिजोरम में शांति लाने के लिए एक ऐसा समझौता हुआ, जिसे मिजोरम समझौता के नाम से जाना जाता है, लेकिन इस समझौते के पीछे एक ऐसे भारतीय अधिकारी का दिमाग था, जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इस अधिकारी का नाम था आरडी प्रधान, जो उस समय भारत के गृह सचिव थे। उन्होंने करीब 20 वर्षों से विद्रोह की आग में झुलस रहे मिजोरम राज्य में विद्रोह को शांत कराकर इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। गृह सचिव आरडी  प्रधान की यह केवल  प्रशासनिक सफलता नहीं थी, बल्कि विश्वास, संवाद और संवेदनशीलता की भी गाथा थी, जिसने एक पूरे राज्य को हिंसा से निकालकर शांति की राह पर ला खड़ा किया।

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  • आदिवासी कुल्हाड़ियां जिन्होंने 21 ब्रिटिश सैनिकों का शिकार किया : महिलाओं के नेतृत्व में संथाल विद्रोह—फूलो-झानो

    आदिवासी कुल्हाड़ियां जिन्होंने 21 ब्रिटिश सैनिकों का शिकार किया : महिलाओं के नेतृत्व में संथाल विद्रोह—फूलो-झानो

    साम्राज्य हमेशा अपनी सैन्य शक्ति पर गर्व करते हैं, लेकिन एक ऐसी गर्जना थी जिससे साबित हुआ कि आत्म-सम्मान के सामने वह गर्व कितना तुच्छ है। 

    1855 में, झारखंड के जंगलों में, बिजली की दो कौंधों की तरह दो युवतियां एक ब्रिटिश सैन्य शिविर की ओर लपकीं। वह शिविर अपनी आधुनिक एनफील्ड राइफलों के दम पर खुद को अजेय मानकर इतरा रहा था। वे ऐसी वीरांगनाएं थीं, जो ऐसे आगे बढ़ीं, मानो स्वयं ‘वन-माता’ ने ही कोई उग्र रूप धारण कर लिया हो। उन दोनों के हाथों में पैनी कुल्हाड़ियां थीं और आंखों में ज्वालामुखी दहक रहे थे। भोर होते-होते, 21 ब्रिटिश सैनिकों के सिर उनके धड़ों से अलग हो चुके थे। युद्ध के विश्व इतिहास में पहले कभी न देखी गई यह ‘नरसंहार-लीला’ किसी और ने नहीं, बल्कि सिदो-कानू की बहनों—फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू ने रची थी।

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  • कोहिनूर की चमक से ज्यादा तेज थी उस महाराजा की बुद्धि, जिन्होंने बिना खून-खराबे के इतिहास को अपने नाम कर लिया

    कोहिनूर की चमक से ज्यादा तेज थी उस महाराजा की बुद्धि, जिन्होंने बिना खून-खराबे के इतिहास को अपने नाम कर लिया

    भारत के आंध्रा की कोल्लूर की खान से निकला यह जादुई रत्न, यह पौराणिक रत्न, जिसे तब ‘स्यमंतक मणि’ के नाम से जाना जाता था, कभी तेलंगाना के वारंगल के काकतीय मंदिर की देवी की आंख बना, फिर दिल्ली के सुल्तानों के ताज की शान, और आखिरकार लूट का सबसे बड़ा प्रतीक। यह है कोहिनूर हीरा।

    सन् 1739 में जब फारस का आक्रमणकारी नादिर शाह ने भारत पर धावा बोला, तो उसने केवल खजाना ही नहीं, भारत की इस अनमोल शान को भी लूट लिया। उसी ने इसे नाम दिया, कोह-ए-नूर… यानी रोशनी का पर्वत। आइए, हम समय के पहिये को पीछे घुमाते हैं और जानते हैं कि यह हीरा ‘शेर-ए-पंजाब’ महाराजा रणजीत सिंह के पास कैसे पहुंचा। क्या है इसको पंजाब लाने के पीछे की कहानी? 

    चित्र साभार : Source-ixigo

    जिस कहानी की हम बात कर रहे हैं…, उस वक्त यह कोहिनूर हीरा अफगान राजा शाह शुजा दुर्रानी के पास था। शाह शुजा दुर्रानी जो कि 1803 में शासक बना, लेकिन सत्ता की भूख ने भाई को ही भाई का दुश्मन बना दिया। शाह शुजा के भाई महमूद शाह दुर्रानी ने उसे 1809 में गद्दी से हटा दिया। अब शाह शुजा के जान के लाले पड़ गए। शाह शुजा अपनी जान बचाने के लिए भाग कर कश्मीर आ पहुंचा, जहां कश्मीर के उस वक्त के गवर्नर अता मोहम्मद खान को उसके पास कोहिनूर हीरा होने का पता लगा, तो उसने लगभग 1812 ई. में कोहिनूर के लालच में शाह शुजा को धोखे से कैद कर लिया। वफा बेगम जो कि अफगान शासक शाह शुजा दुर्रानी की पत्नी थीं, उन्हें अपने पति को कैद से छुड़ाने के लिए ऐसे मददगार की जरूरत थी, जो उनके पति शाह शुजा को कश्मीर के गवर्नर की कैद से छुड़ा सके। और उन दिनों महाराजा रणजीत सिंह की बहादुरी के चर्चे अफगानों से छुपे नहीं थे।  

    BBC-शाह शुजा 

    इस दौरान, लाहौर में रणजीत सिंह के भव्य दरबार में एक बेबस महिला के रूप में वफा बेगम मदद के लिए पहुंची। वफा बेगम ने रणजीत सिंह के सामने मदद की गुहार लगाई और वादा किया कि यदि वह उनके पति शाह शुजा को अता मोहम्मद की कैद मुक्त करा देंगे, तो कोहिनूर हीरा वह रणजीत सिंह जी को सौंप देंगी। महाराजा ने सोचा कि यही मौका है भारत की प्रतिष्ठा वापिस लाने का, जिसे विदेशी आक्रमणकारी भारत से छीनकर ले गए थे। रणजीत सिंह ने बिना देर किए इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। 

    साल 1812 की दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में महाराजा रणजीत सिंह की सेना अफगान वजीर फतेह खान से बात करके पीर पंजाल की बर्फीली पहाड़ियों और कठिन रास्तों से होते हुए, तकरीबन 12,000 सैनिकों के साथ आगे बढ़ी, जिसका नेतृत्व दीवान मोहकम चंद कर रहे थे। फतेह खान, जो कि कश्मीर जैसे समृद्ध प्रांत को हथियाकर कोहिनूर भी अपने कब्जे में लेना चाहता था ने महाराजा रणजीत सिंह से 1812 में गठबंधन किया था। 

    महाराजा रणजीत सिंह की सेना और वजीर फतेह खान कश्मीर पर आक्रमण की योजना के साथ आगे बढ़े। वजीर फतेह खान ने सिखों का साथ देने का दिखावा किया, जबकि अंदर ही अंदर वह खुद शाह शुजा को पकड़कर कोहिनूर हथियाना चाहता था। लेकिन दीवान मोहकम चंद ने फतेह खान का इरादा भांप लिया। और उसके वहां पहुंचने से पहले ही उन्होंने शेरगढ़ किले पर धावा बोल दिया और जीत का परचम लहरा दिया। अता मोहम्मद खान को पराजित करके शाह शुजा को उसकी कैद से मुक्त कराकर लाहौर ले आए।

    आजाद होने के बाद शाह शुजा की नीयत बदल गई। उसने एक हीरा रणजीत सिंह को सौंपा, लेकिन वह नकली निकला। यह साफ था कि उसने असली कोहिनूर छुपा लिया था। रणजीत सिंह ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझा। अब यह केवल एक सौदे की बात नहीं रह गई थी, बल्कि यह उनके सम्मान और सत्ता का प्रश्न बन चुका था। उन्होंने वफा बेगम और शाह शुजा से अपना वादा पूरा करने की बात कही, लेकिन शाह शुजा को कोई फर्क नहीं पड़ा।

    आखिरकार जून 1813 में वह क्षण आया जब रणजीत सिंह ने स्वयं इस समस्या का समाधान निकालने का निश्चय किया। लाहौर की मुबारक हवेली में शाह शुजा और रणजीत सिंह आमने-सामने बैठे। इस बार रणजीत सिंह ने तलवार नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘पगड़ी बदल’ (turban exchange Ceremony) की परंपरा का प्रस्ताव रखा। उस समय पगड़ी बदलना भाईचारे और विश्वास का प्रतीक माना जाता था, जिसे ठुकराना लगभग असंभव था। शाह शुजा ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

    जैसे ही दोनों ने अपनी पगड़ियां बदलीं, उसी क्षण इतिहास ने करवट ली। कहा जाता है कि शाह शुजा ने असली कोहिनूर अपनी पगड़ी में छुपा रखा था। पगड़ी बदलते ही वह हीरा रणजीत सिंह के हाथों में आ गया। बिना किसी युद्ध, बिना खून-खराबे के, रणजीत सिंह ने दुनिया का सबसे प्रसिद्ध हीरा हासिल कर लिया। 

    यह केवल एक जीत नहीं थी, बल्कि यह बुद्धिमत्ता, धैर्य और रणनीति की एक अद्भुत मिसाल थी। महाराजा रंजीत सिंह ने इसे अपने आर्मलेट में लगवा लिया और जहां भी जाते अपने साथ ले जाया करते थे। 

  • राजौरी की वो अनसुनी जंग : कैसे लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे ने मौत के साये में रास्ता बनाकर पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा!

    राजौरी की वो अनसुनी जंग : कैसे लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे ने मौत के साये में रास्ता बनाकर पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा!

    जम्मू-कश्मीर की दुर्गम पहाड़ियों में एक ऐसे वीर की गाथा गूंजती है, जो अद्भुत साहस, तीक्ष्ण बुद्धि और अटूट संकल्प का प्रतीक है। यह उस वीर भारतीय सैनिक के पराक्रम की कहानी है, जिसने गोलियों की बौछार, बारूदी सुरंगों और हर पल मंडराती मौत के बीच रास्ता बनाया, ताकि राजौरी को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करा सके। 

    1948 के उस कठिन दौर में, जब राजौरी सहित जम्मू-कश्मीर के कई क्षेत्रों में पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ कर वहां अपना कब्जा जमा लिया था, तब एक वीर जवान अपनी टीम के साथ राजौरी से पाकिस्तीनी सेना को खदेड़ने के लिए आगे बढ़ा। यह कोई साधारण मिशन नहीं था, बल्कि समय के विरुद्ध एक दौड़ थी। हर एक मिनट की देरी सैकड़ों जिंदगियों पर भारी पड़ सकती थी। यह वीर सैनिक कोई और नहीं, बल्कि परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे थे।

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  • एक सिख, एक संन्यासी और एक विक्रेता: 25 साल के नरेंद्र मोदी ने भेष बदलकर कैसे इमरजेंसी का मुकाबला किया और गिरफ्तारी को चकमा दिया

    एक सिख, एक संन्यासी और एक विक्रेता: 25 साल के नरेंद्र मोदी ने भेष बदलकर कैसे इमरजेंसी का मुकाबला किया और गिरफ्तारी को चकमा दिया

    25 और 26 जून, 1975 की दरमियानी रात को, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल (Emergency) की घोषणा करके लोकतंत्र का गला घोंट दिया। कुछ ही घंटों के भीतर, नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं, पूरे देश में प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई  और विपक्षी नेताओं को बिना किसी पूर्व सूचना के हिरासत में ले लिया गया। 

    यह कार्रवाई बहुत तेजी से हुई। तत्कालीन सरकार की कमियों को उजागर करने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, बोलने की आजादी पर रोक लगा दी गई और हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया। 

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  • मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब

    मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब

    मोगा 1989 जून, वो दिन जब पार्क बन गया था रणक्षेत्र और निहत्थे लोग हौसले के साथ गोलियों के सामने खड़े रहे। यह सिर्फ हमला नहीं था, साहस की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जहां डर नहीं, बल्कि अंत में संकल्प जीता।

    1990 का पंजाब…

    एक ऐसा समय, जब हवा भी डरकर बहती थी। गांव हों या शहर, हर तरफ एक ही सवाल था, ‘अगला निशाना कौन?’ 

    लेकिन इसी अंधेरे दौर में, कुछ लोग थे, जो हर सुबह बिना डरे एक मैदान में इकट्ठा होते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि मन में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संकल्प होता था। वे थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक। आज हम आपको बताएंगे, उस नरसंहार के बारे में जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 25 जून1989, वो तारीख जब अलगाववादियों ने विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत की अखंडता में विश्वास रखने वाले संगठन को डराकर चुप कराना चाहा, पर ये ना हो सका।

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  • युद्ध में घायल रानी दुर्गावती का आखिरी फैसला : कैद या मृत्यु? वो पल जब अकबर भी हार मान गया!

    युद्ध में घायल रानी दुर्गावती का आखिरी फैसला : कैद या मृत्यु? वो पल जब अकबर भी हार मान गया!

    24 जून 1564 को नरराई नाला (वर्तमान जबलपुर) की संकरी घाटी में एक ऐसी घटना घटी, जिसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया, जब रानी दुर्गावती ने मुगलों की कैद में जाने से बेहतर अपनी जान देना चुना। एक घायल रानी ने, चारों ओर दुश्मनों से घिरने के बाद भी झुकने से इनकार कर दिया। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे उन्होंने पराजय के क्षण में भी अपना भाग्य खुद लिखा? 

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  • जब 12 साल के केशव ने ठाना, उखाड़ना है अंग्रेजों का झंडा : सीताबर्डी किले तक सुरंग खोदने की हैरान कर देने वाली कहानी!

    जब 12 साल के केशव ने ठाना, उखाड़ना है अंग्रेजों का झंडा : सीताबर्डी किले तक सुरंग खोदने की हैरान कर देने वाली कहानी!

    नागपुर की एक पहाड़ी पर स्थित सीताबर्डी किला, आज भी खामोशी के साथ खड़ा है। उसकी दीवारें भले ही समय की धूल से ढक चुकी हों, लेकिन उसकी मिट्टी में एक ऐसी कहानी दबी है, जिसे इतिहास ने बहुत कम जगह दी। यह कहानी किसी बड़े युद्ध या किसी संगठित विद्रोह की नहीं है। 

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