अक्टूबर 1948 का समय। कश्मीर युद्ध अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुका था। भारतीय सेना की 19 इन्फैंट्री डिवीजन उड़ी सेक्टर से आगे बढ़कर मुजफ्फराबाद और डोमेल की दिशा में दबाव बना रही थी। लेकिन रास्ते में केवल दुश्मन के सैनिक ही नहीं, बल्कि पहाड़ों पर तैनात विमानभेदी तोपों का एक घातक जाल भी खड़ा था। उरी, चकोटी और डोमेल क्षेत्र में लगी ये एंटी-एयरक्राफ्ट गनें भारतीय वायुसेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी थीं। जैसे ही कोई विमान नीचे आता, उस पर गोलियों और गोले की बौछार शुरू हो जाती।
भारतीय सेना जानती थी कि डोमेल पर दबाव डाले बिना आगे बढ़ना कठिन होगा। लेकिन डोमेल ब्रिज लगभग अभेद्य माना जाता था। यह पुल “लगभग 100 प्रतिशत एंटी-एयरक्राफ्ट सुरक्षा” के दायरे में था।
और पढ़ें








