Recent Posts

  • राष्ट्रपति भवन के वो 10 सेकंड, जिसकी गूंज वर्षों तक सुनाई दी : जब एयर चीफ मार्शल टिपनिस ने जनरल मुशर्रफ को सलाम नहीं किया

    राष्ट्रपति भवन के वो 10 सेकंड, जिसकी गूंज वर्षों तक सुनाई दी : जब एयर चीफ मार्शल टिपनिस ने जनरल मुशर्रफ को सलाम नहीं किया

    15 जुलाई 2001, नई दिल्ली का राष्ट्रपति भवन। पाकिस्तान के राष्ट्रपति और सैन्य शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ के स्वागत के लिए लाल कालीन बिछ चुका था। आगरा शिखर सम्मेलन (14–16 जुलाई 2001) का दूसरा दिन था और कैमरे हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थे। 

    भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख स्वागत पंक्ति में खड़े थे। उनमें सबसे आगे थे एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस, भारतीय वायुसेना के 18वें प्रमुख, जिन्होंने 31 दिसंबर 1998 से 31 दिसंबर 2001 तक वायुसेना का नेतृत्व किया और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन सफेद सागर का संचालन किया।

    कुछ ही क्षण बाद जनरल मुशर्रफ उनके सामने पहुंचे। दोनों ने हाथ मिलाया। लेकिन वहां मौजूद लोगों ने तुरंत एक बात नोटिस की, एयर चीफ मार्शल टिपनिस ने मुशर्रफ को सैन्य सलामी नहीं दी।

    और पढ़ें
  • हर वोट की अहमियत : अरुणाचल में मलोगाम के अकेले वोटर तक पहुंचने के लिए चुनाव अधिकारी 40 किलोमीटर का सफर कैसे तय करते हैं?

    हर वोट की अहमियत : अरुणाचल में मलोगाम के अकेले वोटर तक पहुंचने के लिए चुनाव अधिकारी 40 किलोमीटर का सफर कैसे तय करते हैं?

    अपनी पीठ पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) बांधे, चुनाव अधिकारी गमर बाम अरुणाचल प्रदेश के सबसे दूर-दराज इलाके में पहाड़ के एक संकरे रास्ते से सावधानी से गुजर रहे हैं। उनके पीछे उनकी पोलिंग टीम घने जंगलों से होते हुए चुनाव का सामान लेकर चल रही है। 

    अब सोचिए, चुनाव अधिकारियों की एक टीम इतनी मुश्किल यात्रा क्यों करेगी? इसलिए ताकि अरुणाचल प्रदेश के अंजाव ज़िले के दूर-दराज़ गांव ‘मलोगम’ में रहने वाली एक महिला, सोकेला तायंग, अपना वोट देने का संवैधानिक अधिकार इस्तेमाल कर सकें। यही भारतीय लोकतंत्र की शांत और अनोखी खूबसूरती है।

    और पढ़ें
  • भाऊसाहेब रंगारी ने भगवान गणेश के नाम पर रची थी क्रांति, जिसने अंग्रेजों की उड़ा दी थी नींद! 

    भाऊसाहेब रंगारी ने भगवान गणेश के नाम पर रची थी क्रांति, जिसने अंग्रेजों की उड़ा दी थी नींद! 

    अंग्रेजों को हराने के लिए हमेशा तलवारें ही नहीं उठाई गईं, एक धार्मिक उत्सव भी सबसे बड़ा हथियार बना था। स्वधीनता संग्राम के दौरान महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत भी, ऐसी ही एक क्रांतिकारी योजना थी। जिसके पीछे थे श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी (भाऊ लक्ष्मण जावले)। 

    व्यवसायी भाऊसाहेब क्रांतिकारियों की मदद करने के लिए जाने जाते थे। इसीलिए उन्होंने गणेशोत्सव को केवल पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्र जागरण का अभियान बना दिया। यह वह दूरदर्शी सोच थी, जिसने एक धार्मिक आयोजन को अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध सांस्कृतिक क्रांति और राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बना दिया। पहली बार सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन करने वाले भाऊसाहेब रंगारी गणेश उत्सव को क्रांति का माध्यम कैसे बनाया, यह कहानी काफी रोचक है।

    1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने पूरे देश में दमन की नीति अपनाई। सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। ऐसे समय में पुणे के शालुकर बोल क्षेत्र में रहने वाले भाऊसाहेब रंगारी, राष्ट्र की दशा को लेकर चिंतित थे। वे पेशे से प्रसिद्ध राजचिकित्सक थे, लेकिन उनका मन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था।

    और पढ़ें
  • Nathu La Clashes 1967 : जब चीन ने बरसाईं गोलियां, तो सगत सिंह ने खुलवा दीं तोपें… नाथू ला में ऐसे टूटा चीन का घमंड

    Nathu La Clashes 1967 : जब चीन ने बरसाईं गोलियां, तो सगत सिंह ने खुलवा दीं तोपें… नाथू ला में ऐसे टूटा चीन का घमंड

    Nathu La Clashes 1967 : अंग्रेजों को हराने के लिए हमेशा तलवारें ही नहीं उठाई गईं, एक धार्मिक उत्सव भी सबसे बड़ा हथियार बना था। स्वधीनता संग्राम के दौरान महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत भी, ऐसी ही एक क्रांतिकारी योजना थी। जिसके पीछे थे श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी (भाऊ लक्ष्मण जावले)। 

    व्यवसायी भाऊसाहेब क्रांतिकारियों की मदद करने के लिए जाने जाते थे। इसीलिए उन्होंने गणेशोत्सव को केवल पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्र जागरण का अभियान बना दिया। यह वह दूरदर्शी सोच थी, जिसने एक धार्मिक आयोजन को अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध सांस्कृतिक क्रांति और राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बना दिया। पहली बार सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन करने वाले भाऊसाहेब रंगारी गणेश उत्सव को क्रांति का माध्यम कैसे बनाया, यह कहानी काफी रोचक है।

    और पढ़ें
  • जब कैदियों से लेकर जेलर तक सुनते थे प्रवचन, विनोबा भावे ने धुलिया जेल को कैसे बना दिया था गीता का आश्रम?

    जब कैदियों से लेकर जेलर तक सुनते थे प्रवचन, विनोबा भावे ने धुलिया जेल को कैसे बना दिया था गीता का आश्रम?

    कल्पना कीजिए, अंग्रेजों के जमाने की एक ऐसी जेल, जहां गीता का संदेश गूंजता हो। जहां सलाखों के पीछे निराशा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और साधना का वातावरण हो, जैसे किसी आश्रम में होता है। जहां एक कठोर जेलर भी एक संत के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हो जाए कि स्वयं आध्यात्मिक प्रवचनों की व्यवस्था कर दे और परिवार के साथ शामिल भी हो। 

    यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि सन् 1932 में धुलिया जेल में घटी एक ऐतिहासिक घटना है। जिसे साकार किया था, भारत के महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी विनोबा भावे जी ने। उन्होंने ब्रिटिशकाल की क्रूर जेल के वातावरण को आध्यात्मिक कैसे बनाया, इसके पीछे की कहानी काफी रोचक है। 

    और पढ़ें
  • जिस पुरातत्वविद् ने राम जन्मभूमि के दावों को पुरातात्विक आधार दिया : प्रो. बीबी लाल की अनसुनी कहानी

    जिस पुरातत्वविद् ने राम जन्मभूमि के दावों को पुरातात्विक आधार दिया : प्रो. बीबी लाल की अनसुनी कहानी

    भारत की धरती का कण-कण सनातन सभ्यता के गौरव का साक्षी है। कहीं हजारों वर्ष पुराने मंदिरों के भग्नावशेष हैं, तो कहीं मिट्टी की परतों में दबे ऐसे प्रमाण, जो इतिहास की भूली-बिसरी गाथाओं को फिर से जीवित कर देते हैं। 

    अयोध्या की पावन श्रीराम जन्मभूमि भी सदियों तक ऐसा ही एक रहस्य बनी रही। करोड़ों हिंदुओं की आस्था थी कि यही भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है, लेकिन समय के साथ यह प्रश्न भी इतिहास के सामने खड़ा हो गया कि क्या इस स्थान पर कभी एक भव्य मंदिर था। इस प्रश्न का उत्तर खोजने में जिस व्यक्ति का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है, वह हैं भारत के महान पुरातत्वविद् प्रोफेसर बीबी लाल (ब्रज बासी लाल)। उन्होंने अपनी कुदाल से ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य सामने रखे, जिन्होंने रामजन्मभूमि के ऐतिहासिक दावों को एक नया आधार दिया।

    और पढ़ें
  • ‘पेनांग 20’ : आजाद हिंद फौज का वह सीक्रेट मिशन, जिसके लिए 21 वर्षीय सत्येंद्र चंद्र बर्धन हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए

    ‘पेनांग 20’ : आजाद हिंद फौज का वह सीक्रेट मिशन, जिसके लिए 21 वर्षीय सत्येंद्र चंद्र बर्धन हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए

    10 सितंबर 1943, मद्रास सेंट्रल जेल (वर्तमान चेन्नई), सुबह का समय था। ब्रिटिश जेल प्रशासन ने फांसी की पूरी तैयारी कर ली थी। कुछ ही देर में तीन भारतीय युवकों—सत्येंद्र चंद्र बर्धन, अब्दुल कादिर और फौजा सिंह को एक-एक कर फांसी के तख्ते तक लाया गया। इनमें सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में 21 साल के सत्येंद्र चंद्र बर्धन थे। आखिरी इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने कोई निजी मांग नहीं रखी।

    उन्होंने ऊंची आवाज में ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष किया। कुछ ही क्षण बाद तीनों के गले में फंदा डाल दिया गया। ब्रिटिश सरकार की नजर में ये देशभक्त नहीं, बल्कि Enemy Agents Ordinance, 1943 के तहत ऐसे ‘दुश्मन एजेंट’ थे, जिन्हें जापान और आजाद हिंद फौज की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन को भीतर से कमजोर करने भेजा गया था।

    लेकिन इन तीनों की कहानी केवल फांसी तक सीमित नहीं थी। वे उस गोपनीय अभियान का हिस्सा थे, जिसे इतिहास ‘Penang 20’ (पेनांग 20) के नाम से जानता है।

    और पढ़ें
  • ऑपरेशन ट्राइडेंट : भारत ने कैसे कराची को तबाह करके पाकिस्तान के ऑपरेशन सोमनाथ का जवाब दिया

    ऑपरेशन ट्राइडेंट : भारत ने कैसे कराची को तबाह करके पाकिस्तान के ऑपरेशन सोमनाथ का जवाब दिया

    4 दिसंबर 1971 की रात को अरब सागर में आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे साहसिक नौसैनिक अभियानों में से एक को अंजाम दिया गया। कुछ ही घंटों में, भारतीय नौसेना ने पाकिस्तान के कड़े सुरक्षा घेरे वाले समुद्री इलाके में घुसकर दुश्मन के युद्धपोतों को नष्ट कर दिया और पाकिस्तानी नौसेना का मनोबल तोड़ दिया। इस मिशन का नाम ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ था, लेकिन इस जीत की योजना एक रात में नहीं बनी थी। इसकी तैयारी छह साल से चल रही थी। ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ की नींव छह साल पहले ‘ऑपरेशन सोमनाथ’ के दौरान ही पड़ गई थी।

    और पढ़ें
  • सिरिजाप की आखिरी लड़ाई से चीन के युद्धबंदी तक : मेजर धन सिंह थापा की युद्धबंदी गाथा

    सिरिजाप की आखिरी लड़ाई से चीन के युद्धबंदी तक : मेजर धन सिंह थापा की युद्धबंदी गाथा

    20 अक्तूबर 1962 की सुबह लद्दाख की पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर स्थित सिरिजाप-1 (Sirijap-1) चौकी चारों ओर से चीनी सेना से घिर चुकी थी। सामने लगभग 600 से अधिक चीनी सैनिक थे और चौकी की रक्षा में थे केवल 28 भारतीय गोरखा सैनिक। 

    उस चौकी का नेतृत्व कर रहे थे 1/8 गोरखा राइफल्स के कंपनी कमांडर मेजर धन सिंह थापा। उस दिन भारत ने उन्हें खो दिया समझा, लेकिन सच्चाई कुछ और थी। जिस अधिकारी को देश ने शहीद मानकर परमवीर चक्र दे दिया था, वह वास्तव में चीन की जेल में जीवित था और अगले कई महीनों तक युद्धबंदी के रूप में अमानवीय यातनाएं सहता रहा।

    और पढ़ें
  • कोरल मिल हड़ताल के दौरान वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ 1,700 मजदूरों का नेतृत्व कैसे किया?

    कोरल मिल हड़ताल के दौरान वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ 1,700 मजदूरों का नेतृत्व कैसे किया?

    जब तमिलनाडु में तूतीकोरिन (जिसे अब आधिकारिक तौर पर थूथुकुडी के नाम से जाना जाता है) में कोरल मिल के श्रमिक 27 फरवरी, 1908 को काम छोड़कर चले गए, यानी हड़ताल किया, तो वे बेहतर मजदूरी के लिए लड़ रहे थे। 

    हड़ताल खत्म होने तक उन्होंने ब्रिटिश राज का आत्मविश्वास हिला दिया था। ब्रिटिश स्वामित्व वाली सूती मिल के अंदर विरोध प्रदर्शन के रूप में जो शुरू हुआ, उसने जल्द ही तूतीकोरिन में श्रमिकों, वकीलों, व्यापारियों, किसानों और आम नागरिकों को एकजुट कर दिया। जिस व्यक्ति ने इसे संभव बनाया वह वी.ओ.सी. यानी चिदम्बरम पिल्लई थे। चिदम्बरम पिल्लई जो (वी.ओ.सी. के नाम से भी जाने जाते थे), एक प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, वकील और तमिलनाडु के उद्यमी थे, जिनके नेतृत्व ने स्थानीय श्रम विवाद को औपनिवेशिक सरकार के लिए संकट में बदल दिया।

    और पढ़ें