Battle of Asal Uttar : 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान ने पंजाब के खेमकरण सेक्टर में अपनी शक्तिशाली फर्स्ट आर्मर्ड डिवीजन उतारी। उसका लक्ष्य ब्यास नदी के पुल पर कब्जा कर पंजाब को भारत के बाकी हिस्सों से काटना था। शुरुआत में पाकिस्तानी सेना को कुछ बढ़त मिली, लेकिन 8 से 10 सितंबर 1965 के बीच तरनतारन जिले के असल उत्तर गांव के पास भारतीय सेना ने उसकी रणनीति को विफल कर दिया।
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जब महादजी सिंधिया ने अंग्रेजों को खर्च के बोझ से हराया! ग्वालियर की वह कहानी, जिसे इतिहास में दबा दिया गया
3 अगस्त 1780 को अंग्रेजों ने ग्वालियर के अभेद्य किले पर कब्जा कर लिया। यह सब कुछ तब हुआ, जब ग्वालियर के शासक महादजी सिंधिया, ग्वालियर में नहीं थे। आधुनिक तोपों और हथियारों के बल पर मिली इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को विश्वास हो गया था कि अब महादजी सिंधिया और मराठों की उत्तर भारत में शक्ति समाप्त हो जाएगी।
लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता था कि महादजी केवल तलवार के बल पर युद्ध नहीं लड़ते थे, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत मराठा युद्ध नीति थी। आखिर में यही युद्ध नीति, अंग्रेजों पर आर्थिक रूप से इतनी भारी पड़ी कि वह संधि करने पर मजबूर हुए। जिसके बाद सिर्फ ग्वालियर किला ही नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-भाग फिर से महादजी के राज्य में शामिल हो गया। आखिर उन्होंने यह सब कैसे किया? वह कौन सा रणनीति थी? यह काफी रोचक कहानी है।
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राजा दाहिर की बेटियों, सूर्य देवी और परिमल देवी ने कैसे सिंध का बदला लिया और मुहम्मद बिन कासिम को हराया
दमिश्क के दरबार में खलीफा ने एक लकड़ी का बक्सा खोला और दो बंदी राजकुमारियों को अंदर देखने का आदेश दिया। यह खलीफा के सबसे सफल सेनापति, मुहम्मद बिन कासिम की लाश थी, जो एक सिली हुई बैल की खाल में सड़ रही थी। खलीफा ने कहा, “जो लोग मेरा अनादर करते हैं उनका यही हाल होता है।” लेकिन ये घटना घटी कैसे?
712 ई. में, अरोर की लड़ाई में इस्लामिक आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध के राजा दाहिर की हत्या के बाद उनकी बेटियों सूर्या देवी और उनकी छोटी बहन परिमल देवी को जंजीरों में बांधकर घसीटा गया था। भारतीय इस्पात, रेशम, मसाले, हाथी दांत और कीमती रत्नों से लदे व्यापारिक जहाजों से भरा राजा दाहिर का समृद्ध क्षेत्र बिखर गया और उनकी बेटियों को खलीफा के लिए उपहार के रूप में दमिश्क भेज दिया गया।
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दिल्ली की लड़ाई 1737 : जब पेशवा बाजीराव प्रथम ने दिल्ली पर कब्जा किए बिना मुगल साम्राज्य को नीचा दिखाया
मार्च 1737 में, एक ऐसी घटना हुई, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। दक्कन से आई मराठा सेना मुगल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली के दरवाजों पर पहुंच गई। शाही दरबार में हड़कंप मच गया। मुगल कमांडर शहर की रक्षा के लिए दौड़े, जबकि सम्राट मुहम्मद शाह यह सब देखते रहे कि जिस ताकत ने लगभग दो सदियों तक भारत के ज्यादातर हिस्से पर राज किया था, उसे खुलेआम चुनौती दी जा रही थी।
इस साहसी अभियान के पीछे पेशवा बाजीराव प्रथम थे, जो भारतीय इतिहास के सबसे महान सैन्य कमांडरों में से एक थे। दिल्ली की ओर उनके कूच का मकसद मुगल राजधानी को जीतना नहीं था। इसके बजाय, उनका मकसद एक मजबूत राजनीतिक संदेश देना था कि मुगल साम्राज्य अब भारत की सबसे बड़ी ताकत नहीं रहा।
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जब मणिपुर ने ब्रिटिश अधिकारियों को मौत की सज़ा दी : मणिपुर के शेर, बीर टिकेंद्रजीत सिंह की अनकही कहानी
मार्च 1891 में, सुदूर राज्य मणिपुर में कुछ ऐसा हुआ जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को सदमे में डाल दिया। असम के मुख्य आयुक्त जेम्स वालेस क्विंटन सहित कई ब्रिटिश अधिकारियों को पकड़ लिया गया और मार डाला गया। यह खबर पूरे औपनिवेशिक भारत में तेजी से फैल गई।
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जब ब्रिटिश शासन का टूटा घमंड : जानिए गुरु का बाग मोर्चा और सिखों का अभूतपूर्व अहिंसक संग्राम का इतिहास
अमृतसर से केवल 25 किलोमीटर दूर घुक्केवली गांव में गुरु अर्जन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी के पावन आगमन से जुड़े दो ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं। वहां महाराजा रणजीत सिंह ने एक विशाल भूमि दान की थी। वह अब ‘गुरु का बाग’ कहलाती है।
1920 के दशक तक इसका प्रबंधन उदासी संप्रदाय के महंत सुंदर दास के पास था। सिखों को गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए ब्रिटिश शासन ने हक नहीं दिया था, बल्कि हिंदू-सिखों के बीच ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के तहत उदासी संप्रदाय को दे रखा था।
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जब भाई दया सिंह ने हजारों किलोमीटर की जोखिम भरी यात्रा कर औरंगजेब तक पहुंचाया था गुरु गोबिंद सिंह जी का ‘जफरनामा’
वर्ष 1704 में पंजाब की धरती युद्ध, विश्वासघात और बलिदानों की साक्षी बन चुकी थी। आनंदपुर साहिब के लंबे घेरे, चमकौर के युद्ध और गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबजादों के बलिदान के बाद ऐसा लग रहा था कि मुगल शासन उस हर शक्ति का दमन कर देगी, जो उसके खिलाफ उठेगी। लेकिन वर्ष 1706 में एक ऐसी घटना घटी, जिसने न केवल औरंगजेब की सत्ता को चुनौती दी, बल्कि उसके नैतिक आधार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया।
यह घटना थी गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखे गए जफरनामा को मुगल शासक औरंगजेब तक पहुंचाने की और इस ऐतिहासिक कार्य को अंजाम दिया था खालसा पंथ के पहले पंच प्यारों में से एक, भाई दया सिंह ने। जफरनामा, जिसका अर्थ है ‘विजय-पत्र’, फारसी भाषा में लिखा गया एक ऐसा दस्तावेज, जिसमें गुरु गोबिंद सिंह जी ने औरंगजेब को उसके द्वारा किए गए विश्वासघात, अत्याचार और कुरान पर खाई गई झूठी कसमों की याद दिलाई थी। यह पत्र किसी सामान्य संदेशवाहक के हाथों नहीं भेजा जा सकता था। उस समय गुरु जी मुगल सत्ता के सबसे बड़े विरोधी माने जाते थे और उनके प्रत्येक अनुयायी पर नजर रखी जा रही थी। ऐसे में यह जिम्मेदारी भाई दया सिंह को सौंपी गई, उनके इस काम में भाई धरम सिंह को भी लगाया गया।
उन्हें पंजाब के दीना गांव से गुरु गोविंद सिंह का दूत बनकर अहमदनगर में डेरा डाले औरंगजेब को यह दस्तावेज सौंपना था।
गुरु गोबिंद सिंह चाहते, तो यह दस्तावेज औरंगजेब के किसी दूत के माध्यम से भी उस तक पहुंचा सकते थे, लेकिन गुरु जी जानना चाहते थे कि इसे पढ़ने पर क्रूर शासक के चेहरे के हाव-भाव क्या होंगे, उसकी तत्काल क्या प्रतिक्रिया होगी? ऐसे में उन्होंने भाई दया सिंह को दूत बनाकर भेजा, जिससे दया सिंह उस स्थिति को बाद में भली-भांति उन्हें बता सके।
उस समय औरंगजेब दक्कन में अपने अंतिम सैन्य अभियानों में व्यस्त था और उसका शाही शिविर अहमदनगर के आसपास स्थित था। पंजाब के दीना गांव से अहमदनगर की दूरी लगभग 1600 किलोमीटर थी। आज के आधुनिक परिवहन साधनों के बिना यह यात्रा उस समय बेहद कठिन थी। यह यात्रा लंबी होने के साथ-साथ खतरनाक भी थी। इस यात्रा में घोड़े, पैदल मार्ग और विभिन्न स्थानीय रास्तों का उपयोग करते हुए ही पहुंचना था। रास्ते में मुगल चौकियां थीं, सैनिक गश्त थी और गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुयायियों की तलाश लगातार चल ही रही थी। यदि उनकी पहचान उजागर हो जाती, तो उन्हें तुरंत गिरफ्तार करके मृत्युदंड दिया जा सकता था। इसके बावजूद उन्होंने यह मिशन स्वीकार किया। वे जानते थे कि यह दस्तावेज सत्य और न्याय का संदेश था, जिसे भारत के सबसे क्रूर शासक तक पहुंचाना आवश्यक था। भाई दया सिंह और भाई धरम सिंह को घोड़े, पैदल मार्ग और विभिन्न स्थानीय रास्तों का उपयोग करते हुए कई महीनों तक यात्रा करनी पड़ी।
अंतत: भाई दया सिंह और भाई धरम सिंह अहमदनगर आ पहुंचे। लेकिन अहमदनगर पहुंच जाना ही पर्याप्त नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती थी मुगल सम्राट तक प्रत्यक्ष पहुंच बनाना। आम व्यक्ति के लिए सम्राट तक पहुंचना लगभग असंभव था और यहां तो संदेशवाहक ऐसे व्यक्ति थे जो मुगल सत्ता के सबसे बड़े विरोधी के प्रतिनिधि थे। ऐसे में उनकी औरंगजेब से शीघ्र मुलाकात नहीं हो सकी। इसके लिए भी उन्हें कुछ हफ्ते और लग गए। क्योंकि यह पत्र उन्हें सीधे औरंगजेब को देना था नाकि उसके किसी दूत के माध्यम से भिजवाना था। फिर वह भी दिन आया, जब भाई दया सिंह औरंगजेब के सामने उपस्थित हुए और दस्तावेज उन्हें सौंप दिया।
जब औरंगजेब दस्तावेज पढ़ रहा था तो भाई दया सिंह उसके चेहरे के भावों को गौर से देख रहे थे। उन्होंने देखा कि औरंगजेब के चहरे के भाव तेजी से बदल रहे थे, पश्चात्ताप और आत्मग्लानि के भाव उसके चेहरे पर दिखे, उसके बाद चाहरे पर मायूसी साफ झलक रही थी। गुरु गोबिंद सिंह जी ने पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि उसने कुरान की कसम खाकर आनंदपुर छोड़ने का सुरक्षित मार्ग देने का वचन दिया था, लेकिन बाद में उस वचन को तोड़ दिया। गुरु जी ने उसे याद दिलाया कि सच्चा शासक वही होता है जो अपने वचनों का पालन करे।
सिख परंपरा में यह माना जाता है कि जफरनामा पढ़ने के बाद औरंगजेब आत्ममंथन करने लगा। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी को मिलने के लिए आमंत्रित भी किया। कुछ स्रोतों के अनुसार उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि गुरु जी के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। हालांकि इससे पहले कि दोनों की मुलाकात हो पाती, 20 फरवरी 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गई।
भाई दया सिंह की इस यात्रा का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने एक पत्र पहुंचाया। वास्तव में उन्होंने उस युग के सबसे क्रूर मुगल शासक के सामने सत्य को खड़ा किया। जब अधिकांश लोग औरंगजेब के भय से उसके सामने थरथर कांपते थे, तब भाई दया सिंह हजारों किलोमीटर की खतरनाक यात्रा करके उसके दरबार में गुरु का संदेश लेकर पहुंचे। 26 अगस्त 1669 में लाहौर में जन्में भाई दया सिंह का यह साहस, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का अद्वितीय उदाहरण है।
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भारत की पहली अदालती फांसी : राजा नंदकुमार की ‘न्यायिक हत्या’! अंग्रेजों का खूनी खेल
साल 1775। कलकत्ता में हजारों लोग की भीड़ जमा थी। एक प्रतिष्ठित भारतीय अधिकारी को फांसी पर चढ़ाया जाने वाला था। उसका अपराध हत्या, डकैती या देशद्रोह नहीं था। उसका सबसे बड़ा अपराध था, ब्रिटिश भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना।
राजा नंदकुमार बंगाल के एक प्रभावशाली प्रशासक और कर-संग्रह अधिकारी थे। उन्होंने वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ काम किया था और बंगाल की राजनीति को करीब से देखा था। 1774 में जब रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत वॉरेन हेस्टिंग्स ब्रिटिश भारत का पहला गवर्नर-जनरल बना, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही महीनों बाद उसके खिलाफ रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप सामने आएंगे।
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नेशनल हार्ट ट्रांसप्लांट डे : भारत में हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली प्रीति उन्हाले की कहानी
दिसंबर 2023 में, 51 साल की एक महिला ने भारत के पहले ‘ट्रांसप्लांट गेम्स’ में बैडमिंटन में गोल्ड मेडल जीता। कोर्ट के बाहर, वह AIIMS में मरीजों की काउंसलिंग करती हैं और उन्हें जानलेवा बीमारियों के बावजूद हिम्मत न हारने के लिए प्रेरित करती हैं। पहली नज़र में, उनके जीवन में कुछ भी खास नहीं लगता।
लेकिन असल बात तो यही है। पिछले 25 सालों से, प्रीति उन्हाले एक उस 14 साल के लड़के का दिल अपने शरीर में ट्रांसप्लांट करवाकर जी रही हैं, जिसकी सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उस लड़के का नाम तो किसी को नहीं पता, लेकिन उसके आखिरी तोहफ़े ने प्रीति को जीवन का दूसरा मौका दिया। आज, वह भारत में हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली महिला हैं।
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