इतिहास में कई ऐसी किताबें हुई हैं, जिन्होंने सरकारों को असहज कर दिया था। लेकिन एक किताब ऐसी भी थी जिसे छपने से पहले ही खतरनाक घोषित कर दिया गया। यह किताब लिखी गई थी, विनायक दामोदर वीर सावरकर (28 मई 1883- 26 फरवरी 1966) द्वारा। उन्हें वीर सावरकर या स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी, विचारक, लेखक, कवि और हिंदुत्व विचारधारा के प्रणेता थे।
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स्वाधीनता की लड़ाई के बीच पनपी एक लव स्टोरी : एडविना की मौत पर नेहरू ने क्यों ब्रिटेन भेजा था INS त्रिशूल?
1940 के दशक में भारत का स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर था। जहां एक ओर क्रांतिकारी अंग्रेजों से लड़ते हुए, अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे, तो दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसी कहानियां भी जन्म ले रही थीं, जिनकी चर्चा लंबे समय तक होती रही।
इन्हीं चर्चित घटनाओं में एक नाम बार-बार सामने आता है, जवाहर लाल नेहरू और भारत में अंतिम ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन की पत्नी एडविना का। जब देश स्वतंत्रता की लड़ाई के अंतिम दौर में था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे अनेक क्रांतिकारी अंग्रेजों से आरपार की लड़ाई लड़ते हुए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह क्रम आगे भी जारी था। लेकिन इस दौर में नेहरू और एडविना की निकटता चर्चा का विषय बन चुकी थी। तत्कालीन कई राजनेताओं, अधिकारियों और जीवनीकारों ने इन संबंधों का उल्लेख अपने संस्मरणों और किताबों में किया है, जिससे यह प्रेम कहानी इतिहास और राजनीति के बीच, एक विवादित अध्याय के रूप में दर्ज है।
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जापान की मशहूर ‘नकामुरया करी’ के पीछे रास बिहारी बोस की भूली-बिसरी कहानी
टोक्यो की व्यस्त सड़कों पर एक छोटी सी बेकरी है, जिसका नाम ‘नाकामुराया’ है। हर दिन लोग यहां मिठाइयां, ब्रेड और ‘नाकामुराया करी’ नाम की एक मशहूर डिश लेने आते हैं। बहुत कम लोगों को पता है कि इस मशहूर रेसिपी के पीछे एक ऐसे भारतीय क्रांतिकारी की कहानी छिपी है, जिसने कभी दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्यों में से एक से बचते हुए यहां शरण ली थी।
वह क्रांतिकारी थे रास बिहारी बोस, जिनका जन्म 1886 में बंगाल में हुआ था।
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जूहू का ‘मड फ्लैट’ थ्रिलर: जे आर डी टाटा ने चांद के जरिए ब्रिटिश राज के घमंड को कैसे जमीन पर ला दिया
1920 के दशक में, भारत में एविएशन पर ज्यादातर ब्रिटिश लोगों का कंट्रोल था। भारतीय आसमान पर ब्रिटिश लोगों के इस एकाधिकार के बीच, एक नौजवान, जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, यानी जे.ऐर.डी. टाटा एक पायलट लाइसेंस और अपनी खुद की एयरलाइन बनाने के एक बड़े सपने के साथ आगे आया। उन्होंने उस सपने को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास किया, 1927 से 1929 के बीच ट्रेनिंग ली और 1929 में, वह भारत का पहला लाइसेंस्ड पायलट बन गए। हालांकि, उन्हें अपने ही ‘टाटा संस’ बोर्ड के अंदर विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन जे.आर.डी. टाटा पीछे नहीं हटे। आखिरकार, टाटा संस बोर्ड मान गया।
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इंदिरा गांधी ने दुनिया की सबसे खूबसूरत महारानी, गायत्री देवी को तिहाड़ जेल क्यों भेजा?
“तिहाड़ जेल किसी मछली बाजार जैस था। छोटे-मोटे चोरों और चीखती-चिल्लाती वेश्याओं से भरी हुई।” यह नजारा जुलाई 1975 का है, जब एक महारानी, जिनका नाम दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं की सूची में शामिल था, भारत की सबसे बदनाम जेल के अंदर थीं।
शिफॉन की साड़ी और अपने खास मोतियों के हार से सजी यह महारानी कोई और नहीं, बल्कि जयपुर की राजमाता महारानी गायत्री देवी थीं, जिन्होंने स्वयं को बदबूदार तिहाड़ जेल में, अपराधियों और पागलों के बीच घिरा पाया। लेकिन क्यों?
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महान योद्धा ही नहीं, महिला सशक्तिकरण के भी नायक थे मल्हारराव होल्कर : जानिए इस पहलू से जुड़ी महिला अधिकार की प्रेरक कहानी
भारतीय इतिहास में मल्हारराव होल्कर को एक महान मराठा सेनानायक और होल्कर वंश के प्रवर्तक के रूप में याद किया जाता है। 18वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य उत्तर और मध्य भारत में अपनी शक्ति का विस्तार कर रहा था, तब उन्होंने अपनी वीरता, सैन्य रणनीति और दूरदर्शिता से इस विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन मल्हारराव होल्कर की कहानी केवल युद्धों और विजय की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी भी है, जिसने उस दौर में महिलाओं की क्षमता और अधिकारों को पहचाना, जब समाज में उन्हें सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर रखा जाता था। तो आइए, जानते हैं मल्हारराव होल्कर के उस पहलू को भी, जो महिला सशक्तिकरण से जुड़ा है।
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वास्को डी गामा ने स्वयं भारत का रास्ता नहीं खोजा था, अफ्रीका से भारत तक एक गुजराती नाविक ने दिखाया था रास्ता
वास्को डी गामा की यात्रा 8 जुलाई 1497 को पुर्तगाल के लिस्बन से शुरू हुई थी, जब पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने उन्हें चार जहाजों और 170 नाविकों के साथ मसालों की तलाश में भारत भेजा। वे अफ्रीका के पश्चिमी तट से होते हुए केप ऑफ गुड होप पार कर गए, लेकिन वहां से आगे हिंद महासागर का रास्ता उनके लिए पूरी तरह अज्ञात था। मानसून की हवाएं, समुद्री धाराएं और तारों से दिशा तय करना यूरोपियों को नहीं आता था।
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पोखरण II, चांदीपुर और क्रिकेट: भारत के परमाणु परीक्षण कैसे बने अमेरिका की ‘दशक की सबसे बड़ी खुफिया विफलता’
“आज 15:45 बजे, भारत ने पोखरण रेंज में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए”: यह बयान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 मई, 1998 को तब दिया था, जब भारत ने राजस्थान के थार रेगिस्तान में “ऑपरेशन शक्ति” कोड-नाम से परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए थे। कुछ ही घंटों में, दुनिया को एहसास हो गया कि भारत ने बेहद गोपनीयता के साथ कुछ असाधारण कर दिखाया है, बिना दुनिया के सबसे आधुनिक निगरानी तंत्रों की पकड़ में आए, जिसके चलते इसे “दशक की सबसे बड़ी खुफिया विफलता” कहा जाने लगा।
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1949का झटका: माउंटबेटन ने नेहरू के कॉमनवेल्थ में बने रहने के फैसले को कैसे प्रभावित किया
16 मई, 1949 को भारत की संविधान सभा के अंदर का माहौल तनावपूर्ण हो गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सदस्यों से सरकार के इस फैसले को मंजूरी देने का आग्रह किया गया था कि भारत ‘कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस’ का हिस्सा बना रहेगा।
इस प्रस्ताव ने सभी को चौंका दिया। महज दो साल पहले, 1947 में भारत ने आखिरकार ब्रिटिश शासन से आजादी पाई थी और नेहरू ने एक ऐसे पूरी तरह से संप्रभु गणराज्य का वादा किया था जो औपनिवेशिक बोझ से मुक्त हो। फिर भी, अब वह एक ऐसे संगठन के साथ जुड़ाव बनाए रखने की वकालत कर रहे थे, जिसका जन्म ब्रिटिश साम्राज्य से हुआ था।
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