पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

India polio-free

24 फरवरी, 2012 का दिन भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जाता है। इसी दिन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने भारत को पोलियो प्रभावित देशों की सूची से हटाया था। 

लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब हमारे देश में प्रति वर्ष 2 से 4 लाख नए पोलियो के मामले सामने आते थे। WHO ने भारत  को पोलियो मुक्त घोषित करने का फैसला, तब लिया जब 13 जनवरी, 2011 के बाद से भारत में कोई भी वाइल्ड पोलियोवायरस नहीं पाया गया। भारत से पोलियो को जड़ से उखाड़ने में सरकार के साथ-साथ, कई बड़े संगठनों और अनगिनत गुमनाम वैक्सीनेशन वर्कर्स की भूमिका रही। 

यह वर्कर्स कभी सुर्खियों में भले ही न आए हों, लेकिन इनका पोलियो उन्मूलन अभियानों में बहुत बड़ा योगदान है। इन्हीं लोगों ने भारत के करीब 3,93,918 बच्चों को पोलियो से होने वाली दिव्यांगता और मौत से बचाया। इन्हीं हीरो में से एक हैं, 70 साल वषीय रामनरेश महतो, एक आम आदमी, लेकिन उनका देश से पोलियो के खात्मे को लेकर सपना असाधारण और अटूट था।

                                                        रामनरेश महतो, छवि स्रोत- WHO

वॉलंटियर वैक्सीनेशन वर्कर के तौर पर जुड़ना

रामनरेश महतो का जन्म एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ। बचपन में वह पोलियो ग्रसित होने से दिव्यांग हो गए। स्वयं के साथ-साथ उन्होंने अपने गांव में पोलियो से पीड़ित बच्चों के दुख को भी देखा। कुछ बच्चे संसाधनों के सहारे चलते-फिरने में समर्थ थे, लेकिन कुछ तो पूरी तरह से दिव्यांग होकर असहाय हो चुके थे। इन दृश्यों ने रामनरेश महतो के मन पर गहरी छाप छोड़ी। वह समझ गए कि पोलियो सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि यह मासूम बच्चों का पूरा भविष्य छीन रहा है। 

इसी चिंतन के बाद उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य तय किया। जब भारत में पोलियो वैक्सीनेशन प्रोग्राम की गति तेज की गई, खासकर 2012 से 2014 के बीच, तो रामनरेश महतो ने स्वेच्छा से वैक्सीनेशन वर्कर के तौर पर काम करना शुरू किया। आर्थिक रूप से कमजोर महतो को अपने परिवार का पेट भी पालना था, फिर भी वह पीछे नहीं हटे। महतो का मानना था कि अगर वह किसी बच्चे को पोलियो से बचा पाता हैं, तो यही उनके लिए सबसे बड़ा इनाम होगा क्योंकि उन्होंने स्वयं पोलियो ग्रसित होने के बाद जीवन में उस दर्द को महसूस किया था। 

इस प्रकार, महतो और लाखों पोलियो वैक्सीनेशन वर्करों की कोशिशों से 24 फरवरी, 2012 तक भारत पोलियो-मुक्त हो गया और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने भारत को पोलियो-ग्रस्त देशों की सूची से हटा दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि 27 मार्च, 2014 को भारत आधिकारिक रूप से पोलियो-मुक्त देश घोषित हुआ।

रामनरेश महतो, छवि स्रोत- WHO

भारत का पोलियो-मुक्त होना : रामनरेश के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि

जब 2014 में भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो-मुक्त घोषित किया गया, तो रामनरेश महतो की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “यह सफलता सिर्फ मेरी ही नहीं, बल्कि देश के लाखों वैक्सीनेशन वर्कर्स की भी है।” 

आज भले ही रामनरेश महतो जैसे वर्कर्स का नाम पोलियो वैक्सीनेशन के इतिहास में दर्ज न हो, लेकिन उनके बिना यह सफलता संभव नहीं थी। भारत के पोलियो-मुक्त होने की कहानी सिर्फ आंकड़ों के बारे में नहीं है। यह रामनरेश महतो जैसे अनगिनत लोगों के चुपचाप किए गए त्याग का इतिहास है। 

अब महतो की उम्र करीब 75 साल है। रिटायर होने के बाद भी उन्होंने पूरी तरह से काम करना बंद नहीं किया है। आज भी, वह गांवों में पोलियो वैक्सीनेशन के बारे में लोगों के बीच जागरकता फैलाते हैं, माता-पिता को इसका महत्व समझाते हैं और नए वैक्सीनेशन वर्कर्स को भारत में बच्चों का टीकाकरण करने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं।

महतो का संकल्प है कि ‘जब तक मेरा शरीर साथ देगा, मैं बच्चों के साथ खड़ा रहूंगा।’ लेकिन इस सफर में वह अकेले नहीं हैं। उनकी बेटी, रंजू देवी, जो गांव में एक वॉलंटियर वैक्सीनेटर हैं, वह अपने घर से 4 किलोमीटर दूर एक सब-डिपो से बाइवैलेंट OPV (bOPV) की शीशियां लाकर वॉलंटियर की मदद करती हैं। इसके बाद रंजू देवी अपना राउंड शुरू करती हैं, बिहार के सीतामढ़ी जिले के रुन्नीसैदपुर ब्लॉक के अथरी गांव में घर-घर जाकर, 5 साल से कम उम्र के बच्चों को OPV की डोज देती हैं। बच्चों के पोलियो टीकाकरण करने की उनकी लगन के पीछे एक निजी दुख भी है। उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे को कैंसर से खोया है। साथ ही अपने पिता को पोलियो के कारण परेशानियों में देखा है। महतो कहते हैं कि ‘मुझे बहुत खुशी होती है कि मैं अपनी बेटी के मिशन में उसका साथ दे पा रहा हूं।’  

                                                          रंजू देवी, इमेज सोर्स- WHO

भारत ने यह कैसे किया?

1970, 1980 के दशक और 1990 के दशक की शुरुआत तक, भारत में पोलियो बहुत अधिक फैला था।  हर साल 2 लाख से 4 लाख नए मामले सामने आते थे। हालांकि, 90 के दशक में भारत में पोलियो में कमी आई। पोलियो के विरुद्ध 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली में एक बड़ा कदम उठाया गया। पहली बार बड़े पैमाने पर पोलियो टीकाकरण अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत 10 लाख से अधिक बच्चों का ओरल पोलियो वैक्सीनेशन (OPV) किया गया। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि पांच साल से कम उम्र के सभी बच्चों को पोलियो का टीका लगाया जाए। यह अभियान ‘दो बूंद जिदगी की’ नारे के जरिए देश भर से पोलियो के खत्मे के लिए किए जा रहे प्रयासों का पर्याय बना। फिर 1995 में, पल्स पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया गया, जिससे देशव्यापी टीकाकरण अभियान के लक्ष्य को और बढ़ाया गया।

    पोलियो मुक्त भारत, इमेज सोर्स- sciencechronicle.in

इसी समय, भारत ने यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (UIP) के तहत अपने नियमित टीकाकरण प्रयासों को भी मजबूत किया। UIP ने पोलियो, डिप्थीरिया, पर्टुसिस (काली खांसी), टिटनेस, खसरा, हेपेटाइटिस B और टीबी के खिलाफ टीकाकरण अभियान चला। यह भी सुनिश्चित किया गया की बच्चों को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार टीके लगें। इन नियमित प्रयासों के माध्यम से, भारत का लक्ष्य उच्च इम्यूनिटी स्तर बनाए रखना और वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली बीमारियों को फिर से उभरने से रोकना था। 2011 में, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के हावड़ा में एक दो साल की बच्ची में वाइल्ड पोलियोवायरस का आखिरी मामला देखा गया। इसके बाद, देश ने अपने निगरानी प्रयासों को बढ़ाया और वाइल्ड पोलियोवायरस के कोई और मामले सामने नहीं आए। इसके कारण WHO ने 24 फरवरी, 2012 को भारत को पोलियो-ग्रस्त देशों की सूची से हटा दिया।

2012 से 2014 के बीच, हर नेशनल इम्यूनाइजेशन डे (पल्स पोलियो) पर 16 मार्च को देशभर में बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई जाती थी। इस अभियान में करीब 17 से 22 करोड़ बच्चों को वैक्सीन दी गई। यह अभियान 1995 में शुरू हुआ था और इसे दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा मानव-आधारित स्वास्थ्य अभियान माना जाता है। उस समय, लगभग 2.4 मिलियन वैक्सीनेटर और 1.5 लाख सुपरवाइजर ने एक साथ काम किया। यह वैक्सीनेशन प्रोग्राम देश भर में 7 लाख बूथों पर चलाया गया। इसके नतीजे के तौर पर, भारत में तीन साल तक वाइल्ड पोलियोवायरस का कोई मामला न आने के बाद, 27 मार्च 2014 को भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो मुक्त घोषित कर दिया गया।

इस अभियान की सफलता बचाए गए बच्चों की संख्या से पता चलती है। इंडियन पीडियाट्रिक्स द्वारा किए गए रिसर्च के अनुसार, भारत के पोलियो के खिलाफ नेशनल प्रोग्राम ने रूटीन इम्यूनाइजेशन अभियानों के जरिए लगभग 3,93,918 बच्चों को पोलियो से होने वाली दिव्यांगता और मौत से बचाया। जिसके तहत सालाना 172 मिलियन बच्चों को 12 बिलियन डोज दी गईं। इस तरह, 2012 से 2014 तक भारत ने 172 मिलियन बच्चों को पोलियो के खिलाफ वैक्सीन लगाई। जो यूनाइटेड स्टेट्स में बच्चों की कुल संख्या (60 मिलियन) का 3 गुना, 27 देशों वाले यूरोपियन यूनियन में बच्चों की कुल संख्या (लगभग 70 मिलियन) का 2.5 गुना, और सभी फाइव आइज देशों (यूएस, यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड) के बच्चों की कुल संख्या (लगभग 80 मिलियन) के दोगुने से भी ज्यादा है।