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  • अयोध्या मंदिर हमला 2005 : लश्कर की नफरत बनाम भारत का साहस, CRPF की वीरता और संतो देवी की बहादुरी

    अयोध्या मंदिर हमला 2005 : लश्कर की नफरत बनाम भारत का साहस, CRPF की वीरता और संतो देवी की बहादुरी

    2005 Ayodhya Temple Attack: 5 जुलाई 2005 को, अयोध्या का राम जन्मभूमि स्थल मंत्रों, प्रार्थनाओं और हज़ारों श्रद्धालुओं से गुलज़ार था। पूरे देश पर मंडरा रहे आतंकी खतरों के साये के बावजूद, उनका विश्वास अडिग था। बच्चे अपने माता-पिता से लिपटे हुए थे, बुजर्ग श्रद्धा से सिर झुकाए हुए थे और हर चेहरे से CRPF के उन जवानों पर भरोसा झलक रहा था जो हर द्वार और हर जान की रक्षा करते हुए पूरी मुस्तैदी से डटे हुए थे। 

    हालांकि, इस शांत भक्ति के बीच, खतरा चुपके से करीब आ रहा था।

    Ayodhya Ram Janmabhoomi Mandir : Symbol of Indian Ethos – Vishwa Samvada Kendra

    अयोध्या राम जन्मभूमि मंदिर: भारतीय लोकाचार का प्रतीक – विश्व संवाद केंद्र

    शांति से कोसों दूर, एक तेज रफ्तार महिंद्रा मार्शल जीप के अंदर, अंधेरा गहरा रहा था। इसमें सवार लोग लश्कर-ए-तैयबा के फिदायीन थे, जो नफरत से भरे हुए थे और राइफलों, ग्रेनेडों और विस्फोटकों से लैस थे। उनका मकसद जान लेना नहीं था, बल्कि राम जन्मभूमि को अपवित्र करना, हिंदू धर्म को बदनाम करना और अयोध्या को एक ‘जलते हुए कब्रिस्तान’ में बदल देना था— ऐसा करके वे आने वाली पीढ़ियों को गहरा जख्म देने के साथ भारत की एकता को चुनौती देना चाहते थे। 

    सुबह 9:15 बजे, जीप एक बैरिकेड से जा टकराई और एक जबरदस्त बम ने सुबह की शांति को तोड़ दिया। चारों तरफ अफरा-तफरी फैल गई, आग की लपटें और धुआं वातावरण में छा गया। उस टूटी हुई जगह से, आतंकवादी सीता रसोई में घुस गए, एके-47 से गोलीबारी की, हथगोले और यहां तक ​​कि एक रॉकेट लॉन्चर भी चलाया। उनके उग्र नारे, गूंज रहे थे, “तुम्हारे सैनिक सहित हम सबको मिटा देंगे! अयोध्या को हम कब्रिस्तान बना देंगे!”

    फिर भी, इस अफरा-तफरी के बीच, हिम्मत जगा उठा।

    सीआरपीएफ की असिस्टेंट कमांडेंट संतो देवी शांत और कुशल नेतृत्व की मिसाल बन गईं। लगातार हो रही बमबारी की परवाह न करते हुए, उन्होंने लोगों को संदेश दिया, “जमीन पर लेट जाओ, चुप रहो, घबराओ मत!” पूरी तरह शांत और अधिकारपूर्ण अंदाज में, उन्होंने आम नागरिकों को अपनी सुरक्षा में लिया, उन्हें सुरक्षित जगह की ओर रास्ता दिखाया और उन्हें वहां से निकालने का काम संभाला। उनके इस निडर और साहसी कदम ने आतंकियों के घमंड को चूर-चूर कर दिया।

    पर हमलावरों ने उनका मजाक उड़ाया-

    “औरतें हमें रोक नहीं सकतीं… तुम्हारी हिम्मत बेकार है!”

     लेकिन संतो देवी ने उन्हें गलत साबित कर दिया। एक मौके पर, वह खुले मैदान में पूरी तरह से बेखौफ होकर दौड़ पड़ीं, इस दृढ़ निश्चय के साथ कि कोई भी बेकसूर पीछे न छूट जाए। उनके इस निडर कदम ने आतंकवादियों के घमंड को चकनाचूर कर दिया। 

    इस बीच, CRPF के जवानों ने अटूट संकल्प के साथ आतंकियों का मुकाबला किया,  वे अपनी जगह पर डटे रहे और हमलावरों को कदम-दर-कदम पीछे धकेल दिया। उनकी बहादुरी और संतो देवी के निडर नेतृत्व के मेल ने निराशा को चुनौती में बदल दिया। अनगिनत जानें बचाई गईं, और आतंकवादियों को उस पवित्र स्थल को अपवित्र करने के अपने नापाक मंसूबे में कामयाब नहीं होने दिया गया।

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    Source  सोर्स

    जैसे ही भक्तों का आखिरी समूह सुरक्षित स्थान पर पहुंचा, संतो देवी जरा भी नहीं रुकीं। धूल और राख से उनकी वर्दी सन गई थी, पसीने की बूंदें उनके चेहरे पर झलक रही थीं, लेकिन उनका संकल्प अडिग रहा। उन्होंने युद्धक्षेत्र में चारों ओर नजर दौड़ाई, यह देखने के लिए कि कहीं कोई पीछे तो नहीं रह गया; इस तरह उन्होंने स्वयं से बढ़कर सेवा करने की भावना को साकार किया।

    Brave CRPF Commandant Santo Devi 

    बहादुर सीआरपीएफ कमांडेंट संतो देवी

     पवित्र स्थान में घुसने में नाकाम रहने से हताश होकर, आतंकवादियों ने धुएं के बीच से चिल्लाते हुए धमकियां दीं, “तुम, किसी को भी नहीं बचा पाओगी! मंदिर हमारी आग में जल जाएगा!” एक हमलावर, जिसने ‘ह्यूमन बम’ की तरह अपने शरीर पर विस्फोटक बांध रखे थे, मंदिर की ओर तेज़ी से लपका, लेकिन पवित्र स्थान तक पहुंचने से पहले ही CRPF की गोलियों ने उसे ढेर कर दिया। 

    लगभग एक घंटे तक चली जबरदस्त लड़ाई के बाद, राम मंदिर से 70-100 मीटर के दायरे में ही हर आतंकवादी को मार गिराया गया। नफरत फैलाने का उनका मंसूबा, CRPF द्वारा खड़ी की गई हिम्मत की दीवार के सामने पूरी तरह से ढह गया। पवित्र स्थान पूरी तरह सुरक्षित रहा और बलिदान के बल पर उसकी आस्था अक्षुण्ण बनी रही। हालांकि वहां धुएं का गुबार छाया रहा और जमीन पर ग्रेनेड व गोलियों के निशान मौजूद थे, फिर भी अयोध्या जीवित रही, उसकी आत्मा, उसका हौसला बिल्कुल भी नहीं टूटा।

    रक्षा पंक्ति के केंद्र में असिस्टेंट कमांडेंट संतो देवी खड़ी थीं, जिनकी निडर अगुवाई ने अनगिनत जानें बचाईं। इस असाधारण साहस के लिए, उन्हें ‘राष्ट्रपति का पुलिस वीरता पदक’ (President’s Police Medal for Gallantry) से सम्मानित किया गया, जिसने उनकी बहादुरी को अमर कर दिया।

    5 जुलाई, 2005 को हुआ अयोध्या हमला आस्था को अपवित्र करने और सनातन भावना व संस्कृति को तोड़ने के इरादे से रचा गया था। आतंकवादी ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और यहां तक कि मानव बमों से भी लैस होकर आए थे और वे अपनी पूरी जिद के साथ भक्ति को विनाश में बदलने पर आमादा थे। लेकिन, CRPF के साहस ने उनके नफरती मंसूबों को कुचलकर रख दिया।

  • भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच (1932) : जब मैच से एक दिन पहले टीम में खिलाड़ियों ने कर दिया था विद्रोह

    भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच (1932) : जब मैच से एक दिन पहले टीम में खिलाड़ियों ने कर दिया था विद्रोह

    भारत अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच खेलने जा रहा था, लेकिन उससे एक रात पहले टीम के अंदर बगावत हो गई! खिलाड़ी अपने ही कप्तान के खिलाफ खड़े हो गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि ऐतिहासिक मैच से पहले टीम टूटने की कगार पर पहुंच गई? आइए जानते हैं कि कैसे राजाओं के दबदबे, गलत परंपराओं में भारत का क्रिकेट खेल जकड़ा हुआ था और इसी जकड़न ने किस तरह से एक सच्चे खिलाड़ी और खेल भावना को दबाने की कोशिश की।

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  • वास्को डी गामा ने स्वयं भारत का रास्ता नहीं खोजा था, अफ्रीका से भारत तक एक गुजराती नाविक ने दिखाया था रास्ता

    वास्को डी गामा ने स्वयं भारत का रास्ता नहीं खोजा था, अफ्रीका से भारत तक एक गुजराती नाविक ने दिखाया था रास्ता

    वास्को डी गामा की यात्रा 8 जुलाई 1497 को पुर्तगाल के लिस्बन से शुरू हुई थी, जब पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने उन्हें चार जहाजों और 170 नाविकों के साथ मसालों की तलाश में भारत भेजा। वे अफ्रीका के पश्चिमी तट से होते हुए केप ऑफ गुड होप पार कर गए, लेकिन वहां से आगे हिंद महासागर का रास्ता उनके लिए पूरी तरह अज्ञात था। मानसून की हवाएं, समुद्री धाराएं और तारों से दिशा तय करना यूरोपियों को नहीं आता था। 

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  • सिक्किम संकट : अमेरिकी ‘जासूस रानी’ होप कुक का CIA कनेक्शन और भारत की सूझबूझ से हुआ राजशाही का अंत

    सिक्किम संकट : अमेरिकी ‘जासूस रानी’ होप कुक का CIA कनेक्शन और भारत की सूझबूझ से हुआ राजशाही का अंत

    हिमालय की गोद में बसा सिक्किम 1970 के दशक की शुरुआत में तेजी से अस्थिर हो रहा था। शांत हिमालयी राज्य अचानक जातीय तनाव, राजनीतिक अराजकता और बाहरी प्रभाव की चपेट में आ गया। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ उमड़ रही थी, पुलिस स्टेशन कब्जे में लिए जा रहे थे, सरकारी दफ्तरों पर हमले हो रहे थे और राज्यव्यापी अशांति फैल रही थी। 

    इस बिगड़ते संकट के पीछे मुख्य भूमिका सिक्किम की अमेरिकी रानी होप कुक की थी। यह 1973 की घटना न सिर्फ सिक्किम राजशाही के अंत की कहानी थी, बल्कि एक अमेरिकी रानी के CIA कनेक्शन और भारत की खुफिया-सेना की संयुक्त सूझबूझ की भी मिसाल थी। आइए जानते हैं, सिक्किम के भारत में विलय की रोचक कहानी।  

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  • एस.आर. शंकरन : भारत के ‘लोगों के IAS ऑफिसर’ और उनकी एयरपोर्ट पर शानदार रिक्शा राइड की प्रेरणादायक कथा

    एस.आर. शंकरन : भारत के ‘लोगों के IAS ऑफिसर’ और उनकी एयरपोर्ट पर शानदार रिक्शा राइड की प्रेरणादायक कथा

    एस.आर. शंकरन, ‘लोगों के IAS ऑफिसर’ ने अपने 1955-1992 के करियर के दौरान ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) को भारत के लाखों भूले-बिसरे लोगों के लिए एक ढाल में परिवर्तित कर दिया।

    रामनाथपुरम के एक तमिल नागरिक एस.आर. शंकरन ने, जो आंध्र प्रदेश कैडर में शामिल हुए, निडर होकर बंधुआ मजदूरी, जातिगत अत्याचार और आदिवासी शोषण का सामना किया, अक्सर अपने जीवन को दांव पर लगाकर, जबकि अगरतला एयरपोर्ट पर उनकी शानदार सादगी ने अपेक्षा से अधिक हमदर्दी की फिलॉसफी को दिखाया।

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  • आपका आतंकवादी या मेरा? ISYF और चरमपंथी समूहों के साथ UK का संदिग्ध रवैया

    आपका आतंकवादी या मेरा? ISYF और चरमपंथी समूहों के साथ UK का संदिग्ध रवैया

    लंदन, 30 सितंबर 2012 : एक जनरल का मौत से सामना

    इंडियन आर्मी के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ अपनी पत्नी के साथ मार्बल आर्च के पास घूम रहे थे, तभी तीन लोगों ने उनपर हमला कर दिया। एक आदमी, जो इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (ISYF) से जुड़ा था, ने उनकी गर्दन और जबड़े पर 12 इंच का घाव कर दिया। बराड़ की पत्नी को धक्का देकर नीचे गिरा दिया गया। हमलावर एक प्लान किए गए हमले के बाद भाग गए।

    हमलावरों ने कई दिनों तक उन पर नजर रखी थी।  जब तीनों हमलावर पकड़े गए, तो UK की कोर्ट ने तीनों को लंबी सजा सुनाई। यह कोई रैंडम स्ट्रीट क्राइम नहीं था। बराड़, जिन्होंने 1984 में गोल्डन टेंपल से मिलिटेंट्स को हटाने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार को लीड किया था, खालिस्तान एक्सट्रीमिस्ट्स के लिए एक टॉप टारगेट थे।

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  • निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    गलवान और ऑपरेशन सिंदूर यह साबित करते हैं कि परमाणु हथियारों से लैस शत्रुओं के सामने मजबूती से खड़े रहने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध (डिटरेंस) आवश्यक है। भारत और उसकी सीमाओं की कहानी बताती है कि निरस्त्रीकरण एक व्यक्तिपरक अवधारणा (सब्जेक्टिव) है।  

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  • 2020 गलवान घाटी संघर्ष और आदर्शवाद की सीमाएं : एक खतरनाक पड़ोस में निरस्त्रीकरण पर भारत का दृष्टिकोण

    2020 गलवान घाटी संघर्ष और आदर्शवाद की सीमाएं : एक खतरनाक पड़ोस में निरस्त्रीकरण पर भारत का दृष्टिकोण

    15 जून 2020 को, पूर्वी लद्दाख में ऊंचाई वाली गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं में झड़प हुई। यह चार दशकों से ज्यादा समय में हुई सबसे भयंकर झड़प थी। सैनिकों ने पत्थरों, रॉड और तात्कालिक उपलब्ध हथियारों से यह लड़ाई लड़ी। पर मुख्य बात यह रही कि दोनों तरफ से भयंकर हथियार होने के बाद भी कोई गोली नहीं चली। यह 1993 और 1996 में हुए कॉन्फिडेंस-बिल्डिंग एग्रीमेंट का नतीजा था, जिसमें लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हथियारों के प्रयोग न करने पर दोनों देश सहमत हुए थे।

    इस टकराव ने एक विचित्र प्रश्न खड़ा किया : क्या विश्व में सभी युद्ध ऐसे ही लड़े जा सकते हैं, संयमित, तात्कालिक और नियंत्रित? गलवान झड़प ने सुझाव दिया कि विशेष स्थिति में भी तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इसने यह भी बताया कि ऐसी स्थितियां कितने कम पर कोमल होती हैं, खासकर परमाणु हथियारों वाले शत्रुओं के बीच।

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  • पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

    पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

    24 फरवरी, 2012 का दिन भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जाता है। इसी दिन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने भारत को पोलियो प्रभावित देशों की सूची से हटाया था। 

    लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब हमारे देश में प्रति वर्ष 2 से 4 लाख नए पोलियो के मामले सामने आते थे। WHO ने भारत  को पोलियो मुक्त घोषित करने का फैसला, तब लिया जब 13 जनवरी, 2011 के बाद से भारत में कोई भी वाइल्ड पोलियोवायरस नहीं पाया गया। भारत से पोलियो को जड़ से उखाड़ने में सरकार के साथ-साथ, कई बड़े संगठनों और अनगिनत गुमनाम वैक्सीनेशन वर्कर्स की भूमिका रही। 

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  • वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

    वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

    • हिन्दुओं के सभी देवी-देवता अशुद्ध और पतित
    • इनके लकड़ी और पत्थर के बने देवता, देव नहीं बल्कि राक्षस
    • हिन्दुओं के सभी सिद्धांत और प्रथाएं सिर्फ ढोंग, सब के सब भ्रष्ट
    • इनकी सभी परंपराएं और विश्वास हास्यास्पद और अपमानजनक
    • हिन्दुओं की लोककथाएं और किंवदंतियां सभी कपट से भरे हुए
    • इसीलिए मूर्ति पूजा की समाप्ति हो और यह समाप्ति होगी ईसाई मजहब को फैलाकर, वो भी अंग्रेजी माध्यम से। हिन्दुओं की मुक्ति का एकमात्र उपाय यही है।

    ऊपर कोई कहानी नहीं लिखी गई है। हर एक वाक्य इतिहास में दर्ज है। ऐसा इतिहास, जिसके दम पर भारत में ईसाई मिशनरियों के लिए जमीन तैयार की गई। ऐसा इतिहास, जिसका बीज बोया जैचरी मैकाले और उनके क्लैफम सेक्ट (Clapham Sect) के साथी ईसाइयों ने और फल पाने के लिए दस्तावेज पर मुहर लगाई गई साल 1813 में। 

    भारत में ईसाई मिशनरी क्यों भेजे जाएं, या किस रूप में भेजना चाहिए, वर्ष 1813 में लंदन की संसद में पास किए गए चार्टर एक्ट में सब दर्ज किया गया। आज जिस मैकाले की शिक्षा नीति पर इतनी चर्चा होती है, वो इसे तभी क्रियान्वित कर पाया, क्योंकि कभी उसके पिता जैचरी मैकाले ने हिन्दू घृणा के कारण अंग्रेजियत और ईसाइयत के प्रचार-प्रसार की नींव रखी थी।

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