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  • एस.आर. शंकरन : भारत के ‘लोगों के IAS ऑफिसर’ और उनकी एयरपोर्ट पर शानदार रिक्शा राइड की प्रेरणादायक कथा

    एस.आर. शंकरन : भारत के ‘लोगों के IAS ऑफिसर’ और उनकी एयरपोर्ट पर शानदार रिक्शा राइड की प्रेरणादायक कथा

    एस.आर. शंकरन, ‘लोगों के IAS ऑफिसर’ ने अपने 1955-1992 के करियर के दौरान ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) को भारत के लाखों भूले-बिसरे लोगों के लिए एक ढाल में परिवर्तित कर दिया।

    रामनाथपुरम के एक तमिल नागरिक एस.आर. शंकरन ने, जो आंध्र प्रदेश कैडर में शामिल हुए, निडर होकर बंधुआ मजदूरी, जातिगत अत्याचार और आदिवासी शोषण का सामना किया, अक्सर अपने जीवन को दांव पर लगाकर, जबकि अगरतला एयरपोर्ट पर उनकी शानदार सादगी ने अपेक्षा से अधिक हमदर्दी की फिलॉसफी को दिखाया।

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  • आपका आतंकवादी या मेरा? ISYF और चरमपंथी समूहों के साथ UK का संदिग्ध रवैया

    आपका आतंकवादी या मेरा? ISYF और चरमपंथी समूहों के साथ UK का संदिग्ध रवैया

    लंदन, 30 सितंबर 2012 : एक जनरल का मौत से सामना

    इंडियन आर्मी के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ अपनी पत्नी के साथ मार्बल आर्च के पास घूम रहे थे, तभी तीन लोगों ने उनपर हमला कर दिया। एक आदमी, जो इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (ISYF) से जुड़ा था, ने उनकी गर्दन और जबड़े पर 12 इंच का घाव कर दिया। बराड़ की पत्नी को धक्का देकर नीचे गिरा दिया गया। हमलावर एक प्लान किए गए हमले के बाद भाग गए।

    हमलावरों ने कई दिनों तक उन पर नजर रखी थी।  जब तीनों हमलावर पकड़े गए, तो UK की कोर्ट ने तीनों को लंबी सजा सुनाई। यह कोई रैंडम स्ट्रीट क्राइम नहीं था। बराड़, जिन्होंने 1984 में गोल्डन टेंपल से मिलिटेंट्स को हटाने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार को लीड किया था, खालिस्तान एक्सट्रीमिस्ट्स के लिए एक टॉप टारगेट थे।

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  • निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    गलवान और ऑपरेशन सिंदूर यह साबित करते हैं कि परमाणु हथियारों से लैस शत्रुओं के सामने मजबूती से खड़े रहने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध (डिटरेंस) आवश्यक है। भारत और उसकी सीमाओं की कहानी बताती है कि निरस्त्रीकरण एक व्यक्तिपरक अवधारणा (सब्जेक्टिव) है।  

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  • 2020 गलवान घाटी संघर्ष और आदर्शवाद की सीमाएं : एक खतरनाक पड़ोस में निरस्त्रीकरण पर भारत का दृष्टिकोण

    2020 गलवान घाटी संघर्ष और आदर्शवाद की सीमाएं : एक खतरनाक पड़ोस में निरस्त्रीकरण पर भारत का दृष्टिकोण

    15 जून 2020 को, पूर्वी लद्दाख में ऊंचाई वाली गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं में झड़प हुई। यह चार दशकों से ज्यादा समय में हुई सबसे भयंकर झड़प थी। सैनिकों ने पत्थरों, रॉड और तात्कालिक उपलब्ध हथियारों से यह लड़ाई लड़ी। पर मुख्य बात यह रही कि दोनों तरफ से भयंकर हथियार होने के बाद भी कोई गोली नहीं चली। यह 1993 और 1996 में हुए कॉन्फिडेंस-बिल्डिंग एग्रीमेंट का नतीजा था, जिसमें लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हथियारों के प्रयोग न करने पर दोनों देश सहमत हुए थे।

    इस टकराव ने एक विचित्र प्रश्न खड़ा किया : क्या विश्व में सभी युद्ध ऐसे ही लड़े जा सकते हैं, संयमित, तात्कालिक और नियंत्रित? गलवान झड़प ने सुझाव दिया कि विशेष स्थिति में भी तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इसने यह भी बताया कि ऐसी स्थितियां कितने कम पर कोमल होती हैं, खासकर परमाणु हथियारों वाले शत्रुओं के बीच।

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  • पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

    पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

    24 फरवरी, 2012 का दिन भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जाता है। इसी दिन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने भारत को पोलियो प्रभावित देशों की सूची से हटाया था। 

    लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब हमारे देश में प्रति वर्ष 2 से 4 लाख नए पोलियो के मामले सामने आते थे। WHO ने भारत  को पोलियो मुक्त घोषित करने का फैसला, तब लिया जब 13 जनवरी, 2011 के बाद से भारत में कोई भी वाइल्ड पोलियोवायरस नहीं पाया गया। भारत से पोलियो को जड़ से उखाड़ने में सरकार के साथ-साथ, कई बड़े संगठनों और अनगिनत गुमनाम वैक्सीनेशन वर्कर्स की भूमिका रही। 

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  • वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

    वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

    • हिन्दुओं के सभी देवी-देवता अशुद्ध और पतित
    • इनके लकड़ी और पत्थर के बने देवता, देव नहीं बल्कि राक्षस
    • हिन्दुओं के सभी सिद्धांत और प्रथाएं सिर्फ ढोंग, सब के सब भ्रष्ट
    • इनकी सभी परंपराएं और विश्वास हास्यास्पद और अपमानजनक
    • हिन्दुओं की लोककथाएं और किंवदंतियां सभी कपट से भरे हुए
    • इसीलिए मूर्ति पूजा की समाप्ति हो और यह समाप्ति होगी ईसाई मजहब को फैलाकर, वो भी अंग्रेजी माध्यम से। हिन्दुओं की मुक्ति का एकमात्र उपाय यही है।

    ऊपर कोई कहानी नहीं लिखी गई है। हर एक वाक्य इतिहास में दर्ज है। ऐसा इतिहास, जिसके दम पर भारत में ईसाई मिशनरियों के लिए जमीन तैयार की गई। ऐसा इतिहास, जिसका बीज बोया जैचरी मैकाले और उनके क्लैफम सेक्ट (Clapham Sect) के साथी ईसाइयों ने और फल पाने के लिए दस्तावेज पर मुहर लगाई गई साल 1813 में। 

    भारत में ईसाई मिशनरी क्यों भेजे जाएं, या किस रूप में भेजना चाहिए, वर्ष 1813 में लंदन की संसद में पास किए गए चार्टर एक्ट में सब दर्ज किया गया। आज जिस मैकाले की शिक्षा नीति पर इतनी चर्चा होती है, वो इसे तभी क्रियान्वित कर पाया, क्योंकि कभी उसके पिता जैचरी मैकाले ने हिन्दू घृणा के कारण अंग्रेजियत और ईसाइयत के प्रचार-प्रसार की नींव रखी थी।

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  • श्री गुरुजी गोलवलकर ने भारत पर चीन के हमले के बारे 11 साल पहले ही चेतावनी दे दी थी!

    श्री गुरुजी गोलवलकर ने भारत पर चीन के हमले के बारे 11 साल पहले ही चेतावनी दे दी थी!

    चीनी सैनिकों के भारत की उत्तरी सीमा पार करने से एक दशक से भी पहले, एक चेतावनी जारी की गई थी- साफ तौर पर, सार्वजनिक रूप से और बार-बार। यह चेतावनी सरकार के गलियारों या इंटेलिजेंस एजेंसियों से नहीं आई थी, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से आई थी, जो तात्कालिक कूटनीति से परे घटनाओं को देख रहा था। यह लेख बताता है कि वह चेतावनी कैसे सामने आई, उसे क्यों नजरअंदाज किया गया, और जब वह सच साबित हुई, तो उसके बाद क्या हुआ।

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  • ‘कश्मीर प्रिंसेस’ : आर.एन. काव ने कैसे उस केस को सुलझाया, जिसने चीन, भारत और दुनिया को हिलाकर रख दिया था

    ‘कश्मीर प्रिंसेस’ : आर.एन. काव ने कैसे उस केस को सुलझाया, जिसने चीन, भारत और दुनिया को हिलाकर रख दिया था

    भारत को अपनी इंटेलिजेंस एजेंसी, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) मिलने से 13 साल पहले, इसके फाउंडर और जासूस मास्टर, आर.एन. काव ने कश्मीर प्रिंसेस मामले की अपनी जांच के जरिए एक हत्या की साजिश का शानदार तरीके से पर्दाफाश किया था।

    जैसा कि हम उनकी पुण्यतिथि (20 जनवरी) पर याद करते हैं, हम यह बता रहे हैं कि कैसे उस समय सिर्फ 37 साल के युवा भारतीय इंटेलिजेंस ऑफिसर ने एयर इंडिया के एयरक्राफ्ट, कश्मीर प्रिंसेस की एक बहुत ही मुश्किल तोड़फोड़ को सुलझाया था।

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  • हाजी पीर, 1965 : भारत की भुला दी गई रणनीतिक विजय

    हाजी पीर, 1965 : भारत की भुला दी गई रणनीतिक विजय

    हिमालय में, भूगोल रणनीति का सुझाव नहीं देता, बल्कि वह इसे तय करता है। डिप्लोमैट्स शायद बॉर्डर बना सकते हैं, लेकिन पहाड़ किसी संधि को नहीं मानते। ऐसा ही एक मुश्किल इलाका हाजी पीर पास है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऊंचाई वाला पहाड़ी दर्रा है, जो पीर पंजाल रेंज में है और पुंछ (भारत) को रावलकोट (पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर) से जोड़ता है। दशकों से, यह कश्मीर घाटी में घुसपैठ का सबसे सीधा रास्ता रहा है। कुछ ही जगहें बेहतर तरीके से यह दिखाती हैं कि कैसे जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा बंदूकें शांत होने के बहुत बाद भी रणनीति को आकार देता रहता है।

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  • भारत का पहला आम चुनाव: 12 पॉइंट्स में समझें भारत ने कैसे रचा विश्व का सबसे बड़ा चुनावी इतिहास

    भारत का पहला आम चुनाव: 12 पॉइंट्स में समझें भारत ने कैसे रचा विश्व का सबसे बड़ा चुनावी इतिहास

    किसी भी राष्ट्र की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक प्रणाली की आवश्यकता होती है। दुनियाभर के देशों में विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियां लागू हैं, लेकिन इन सभी में जो सर्वोत्तम प्रणाली है, वह है लोकतंत्र। जी हां, लोकतंत्र… जनता का, जनता के लिए, और जनता द्वारा किया जाने वाला शासन। यही वह शासन प्रणाली है जिसमें शक्ति जनता जनार्दन में निहित होती है। अगर बात भारत की करें, तो 99.1 करोड़ (करीब 100 करोड़) मतदाताओं के साथ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में इसे पहचान मिली है। लेकिन क्या आप जानते हैं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की शुरूआत कैसे हुई? पहला आम चुनाव कब और कैसे आयोजित हुआ? भारत का पहला वोट किसने डाला? और किन चुनौतियों का सामना करते हुए लोकतंत्र की यह ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई? चलिए ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब जानते हैं।

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