जब लक्ष्मी (अराकू डेवलपमेंट केस स्टडीज में दर्ज कई जनजातीय महिला किसानों में से एक नाम) 1990 के दशक के अंत में अराकू घाटी के पास एक जनजातीय गांव में बड़ी हो रही थीं, तो उनके गांव के आसपास कॉफी के पौधे पहले से ही उग रहे थे, लेकिन उनके यहां गांव में अभी खुशहाली नहीं थी।
लक्ष्मी का परिवार जंगल की छोटी-मोटी पैदावार, मौसमी खेती और दिहाड़ी मजदूरी पर जीवन व्यतीत करता था। जो भी थोड़ी-बहुत कॉफी बिकती थी, उस पर बिचौलिए अपना नियंत्रण रखते थे और कितना कम पैसा मिलता था, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। अराकू ट्राइबल फेस्टिवल जैसे त्योहार खुशी के पल होते थे, लेकिन रोजमर्रा का जीवन आगे के दिन कैसे बीतेंगे, इस चिंता में डूबा रहता था।
सब कुछ 1999 के आसपास बदलने लगा, जब संगठित जनजातीय कॉफी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स घाटी में आए। लक्ष्मी को गांव वालों के लिए साइंटिफिक ऑर्गेनिक कॉफी की खेती पर आयोजित पहला ट्रेनिंग सेशन याद है। पीढ़ियों से उनके समुदाय ने बिना केमिकल के फसलें उगाई थीं, सिर्फ इसलिए, क्योंकि यही उनके जीने का तरीका था। लेकिन अब एक्सपर्ट्स ने बताया कि यह पारंपरिक तरीका एक प्रीमियम ग्लोबल प्रोडक्ट बन सकता है। पहली बार, लक्ष्मी और दूसरी महिलाओं को एहसास हुआ कि वे जो प्राकृतिक तरीके से खेती करती थीं, वह असल में ग्लोबल मार्केट में अत्यंत मूल्यवान था।

अराकू में गिर्लिगुडा गांव के पास एक बागान से ऑर्गेनिक कॉफी की पकी चेरी को छांट रहीं जनजातीय महिलाएं, स्रोत: The Hindu
2000 के दशक के आरंभ में, लक्ष्मी एक ट्राइबल कॉफी कोऑपरेटिव में शामिल हो गईं, जो स्ट्रक्चर्ड डेवलपमेंट इनिशिएटिव के तहत बनी थी। पहले उनके परिवार को केवल एक मौसम में कमाई होती थी। कुछ ही सालों में, अब कॉफी से उन्हें सालाना निश्चित कमाई होने लगी। उन्होंने पकी चेरी को छांटना, ग्रेड करना और ध्यान से हाथ से तोड़ना सीखा। ऐसे स्किल्स, जिनका सीधा असर इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड पर पड़ा। कॉफी की खेती ने उन्हें सामाजिक भरोसा भी दिया आत्मनिर्भरता के साथ आत्मविश्वास बढ़ाया। जो औरतें पहले खेतों में चुपचाप काम करती थीं, अब कोऑपरेटिव मीटिंग में निर्णय लेने वाली बन गईं।

चेरी की ग्रेडिंग, सोर्स : thehindubusinessline
उनके लिए सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब उन्होंने पहली बार सुना कि अराकू कॉफी की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बिक्री हो रही है। जब अधिकारियों ने गांव वालों को बताया कि उनकी कॉफी यूरोप और जापान तक पहुंच रही है, तो वे वे चकित रह गए। बाद में, जब खबर आई कि पेरिस में अराकू कॉफी का एक स्टोर खुल गया है, तो उन्हें अजीब लगा, विश्वास न हुआ। लक्ष्मी अक्सर कहती हैं कि उन्होंने आंध्र प्रदेश से बाहर कभी यात्रा नहीं की है, लेकिन उनका काम उन देशों में कॉफी पीने वाले लोगों तक पहुंचता है जिन देशों को उन्होंने केवल मैप पर देखा है।

पेरिस में अराकू कॉफी स्टोर, सोर्स : tripadvisor
दो दशकों में, कॉफी ने उनके गांव के दैनिक जीवन को बदल दिया है। कमाई बेहतर हुई। वहां के बच्चे प्रतिदिन स्कूल जाने लगे। घर, केवल मिट्टी के बने घरों से बदलकर पक्के घरों में बदल गए।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गांव छोड़ने वालों में कमी आई है। पहले, मर्द अक्सर काम के लिए पलायन करते थे। अब, कॉफी से क्षेत्रिय स्तर पर आय होता है। लक्ष्मी की बेटी आज कॉलेज में पढ़ती है, जो उनकी दादी की पीढ़ी में लगभग अनसुना और असंभव था।
आज, जब लक्ष्मी कटाई के मौसम में अपनी अधिकतर समय कॉफी के बागानों में गुजारती हैं, तो उन्हें केवल फसलों से अधिक कुछ और भी दिखाई देता है। उन्हें इस बात का सबूत दिखता है कि संस्कृति को छोड़े बिना भी विकास हो सकता है।

धिम्सा नृत्य, फोटो क्रेडिट : flickr.com
- त्योहार आज भी मनाए जाते हैं। धिम्सा नृत्य आज भी होता है। जंगल की पूजा जारी है। लेकिन परंपरा के साथ-साथ, कमाई की इज्जत और वैश्विक पहचान भी है। लक्ष्मी के लिए, अराकू कॉफी केवल एक फसल नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि जनजातीय ज्ञान को जब आदर दिया जाए, तो भाग्य को भी बदला जा सकता है।

