The Mirpur Massacre: 5 अगस्त 2019 को धारा 370 समाप्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत में पूर्ण रूप से संवैधानिक एकीकरण हुआ। हालांकि जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने के लिए इतिहास में अनेक संघर्ष हुए। इन्ही में से एक है मीरपुर का नरसंहार।
यह केवल एक शहर की लड़ाई नहीं थी, बल्कि अपनी जन्मभूमि और स्वाभिमान को बचाने का युद्ध था। 80 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले इस शहर ने पाकिस्तान समर्थित हमलावरों के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। हर व्यक्ति सैनिक और प्रत्येक घर चौकी के रूप बदल गया था। यह जानते हुए भी कि शत्रु संख्या बल और हथियारों में बहुत शक्तिशाली है, फिर भी उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय प्रतिरोध का मार्ग चुना था। इसीलिए यह नरसंहार जम्मू कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण विलय और धारा 370 की समाप्ति के शुरुआती संघर्ष के तौर पर याद किया जाता है।
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने राज्य को भारत में विलय करने के लिए पत्र पर हस्ताक्षर किए। जिससे बौखलाए पाकिस्तान ने नवंबर 1947 के शुरुआती दिनों में मीरपुर के लोगों को आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव भेजा। संदेश दिया कि यदि शहर पाकिस्तानी सेना को सौंप दिया जाएगा, तो लोगों को विशेष सुविधाएं दी जाएंगी। यहां 80 प्रतिशत जनसंख्या हिंदुओं और सिखों की थी, जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान के साथ जाने पर राजी नहीं थी। इसी के चलते मीरपुर के लोगों ने पाकिस्तान के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि किसी भी कीमत पर अपनी धरती नहीं छोड़ेंगे।
मीरपुर के लोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति देखकर पाकिस्तान बौखला गया। जिसके बाद पाकिस्ताी सेना ने मीरपुर पर कब्जा करने के लिए जिहादी साजिश रची। पाकिस्तानी सेना ने अफगानी पठानों के साथ मिलकर ‘जान-जार समझौता’ किया। जिसमें जिहादियों के बीच यह तय हुआ कि मीरपुर पाकिस्तान के हाथ में चला जाता है, तो बंदी बनाई गई महिलाओं को पठान ले जाएंगे और भूमि व संपत्ति पाकिस्तानी सरकार के हिस्से में आएगी। इसी बीच 24 नवंबर 1947 की आधी रात को पाकिस्तानी सेना ने पठान लड़ाकों के साथ मिलकर मीरपुर पर भीषण गोलाबारी करते हुए बड़ा हमला बोला।
दुश्मन के पास आधुनिक हथियार और पर्याप्त गोला-बारूद था, जबकि मीरपुर शहर की रक्षा करने वालों के पास संसाधनों की भारी कमी थी। इसके बावजूद मीरपुर के युवाओं ने मोर्चा नहीं छोड़ा। लोगों ने वहां की स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर कई घंटों तक लड़ाई लड़ी और दुश्मन को शहर में प्रवेश करने से रोके रखा। हालांकि कुछ हमलावर रक्षा पंक्ति तोड़कर शहर में घुसने में सफल हुए। लेकिन स्थानीय युवकों ने आमने-सामने की लड़ाई में उन्हें मार गिराया।
हालांकि मीरपुर के लोगों के पास हथियार और गोला-बारूद बहुत सीमित मात्रा में थे। बाहरी सहायता की कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही थी। संचार व्यवस्था भी बाधित हो गई थी, जिससे मीरपुर का अन्य स्थानों से संपर्क टूट गया। जिससे भारत सरकार से भी कोई सहायता नहीं मिल सकी। इसके बावजूद लोगों ने हथियार नहीं डाले। वे जानते थे कि यदि शहर गिर गया, तो उसके परिणाम भयावह होंगे। अब मीरपुर का हर नागरिक अपने घर को चौकी और स्वयं को सैनिक समझकर, कट्टरपंथियों की जिहादी सेना से लड़ाई लड़ रहा था। लेकिन 25 नवंबर 1947 की सुबह 8:30 बजे तक हालात गंभीर हो गए। दुश्मन ने मीरपुर शहर को चारों ओर से को घेर लिया।
अंततः जिहादी सेना शहर में प्रवेश करने में सफल रही। मीरपुर की गलियां युद्धभूमि में बदल गईं। चारों ओर अफरा-तफरी, गोलीबारी और आगजनी का माहौल था, हथियार और गोला बारूद के अभाव में भी वहां के आम नागरिकों ने अंतिम क्षण तक हार नहीं मानी। वह वीरता के साथ पाकिस्तानी आर्मी और अफगानी पठानों का सामना करते रहे। लड़ाई लड़ते हुए हजारों लोग मारे गए। जिहादी सेना को भी भारी जान-माल का नुकसान हुआ।
हालांकि आधुनिक हथियारों से लैस जिहादियों ने आखिर में बंदूक की नोक पर हजारों हिंदू-सिखों को बंदी बना लिया। फिर जिहादी इन्हें कास गुम्मा, अलीबेग और थथल नामक गुप्त स्थानों पर ले गए। यहां बंदी बनाए हिंदू-सिखों से नकदी और गहने लूटे गए। जिहादियों ने पुरुषों को कपड़े उतारकर एक कतार में लिटाया। पूरी रात उन्हें प्रताड़ित करने के बाद सबकी हत्या कर दी। इस नरसंहार में20 हजार हिंदू-सिखों की जान गई। वहीं ‘जान-जार समझौता’ के तहत पाकिस्तानी सेना ने हिंदू-सिख महिलाओं को पठानों को सौंप दिया।
अपनी मातृ भूमि की रक्षा करते हुए हजारों हिंदू और सिखों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी। लेकिन पाकिस्तान में शामिल होना स्वीकार नहीं किया। मीरपुर के लोगों ने यह दिखाया कि इतिहास केवल राजाओं और सेनाओं का नहीं होता, बल्कि उन सामान्य लोगों का भी होता है जो असाधारण परिस्थितियों में असाधारण साहस दिखाते हैं।
मीरपुर के नागरिकों के पास न विशाल सेना थी और न ही आधुनिक हथियार, लेकिन उनके पास अपनी जन्मभूमि के प्रति अटूट प्रेम और उसे बचाने का संकल्प था। उन्होंने यह साबित कर दिया कि किसी भी भूमि की सबसे बड़ी ताकत उसके लोग होते हैं।
वर्तमान में भले ही मीरपुर आज पाकिस्तान के अवैध कब्जे में हो, लेकिन 1947 में वहां के लोगों द्वारा दिया गया बलिदान इतिहास के पन्नों में अमिट है। जो यह दर्शाता है कि जम्मू कश्मीर का एक-एक कण भारत का अभिन्न अंग है।

