“हम लूटने वालों को गोली मारकर मार देते हैं, है ना? अंग्रेज हमें लूट रहे हैं, और बड़ी होकर मैं उनमें से कम से कम एक को तो गोली जरूर मारूंगी।”
1937 में कही गई ये बातें 10 साल की सरस्वती राजामणि की थीं। तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि वह छोटी सी बच्ची अपनी बात को कितनी गंभीरता से ले रही थी। सात साल बाद, केवल 16 साल की उम्र में, भागने के बजाय सरस्वती राजामणि ने एक नाचने वाली लड़की का वेश धरा और अंग्रेजों के कम्पाउंड में घुस गईं। फिर गार्ड्स को अफीम मिली ड्रिंक्स पिलाकर और उनके सुस्त होने की प्रतिक्षा की। जब गार्ड्स बेहोश हो गए, तो सरस्वती, दुर्गा की कोठरी तक पहुंचीं और अंग्रेजों की कड़ी निगरानी के बीच उन्हें भागने में मदद की।
यह उनकी कहानी है। ‘धुरंधर’ से कई दशक पहले, भारत के पास सरस्वती राजामणि थीं, एक भारतीय महिला जासूस।
साल 1944 में, भारत को स्वतंत्र कराने के पक्के इरादे वाली देशभक्त सरस्वती राजामणि, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) में शामिल हो गईं। INA की मदद के लिए अपना सारा सोना और गहने दान करने के बाद, यह युवा लड़की, अब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने के लिए अपनी बुद्धिमानी का प्रयोग कर रही थी। इस तरह, INA की ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ का हिस्सा बनकर, उन्होंने नेताजी को ब्रिटिश गतिविधियों, योजनाओं और रणनीतियों के बारे में आवश्यक खुफिया सूचना पहुंचाने का काम शुरू किया।
हर दिन, वह और उनकी युवा साथी दुर्गा खतरनाक कामों में लगी रहती थीं। लड़कों का वेश बदलकर, ये दोनों लड़कियां ब्रिटिश सैन्य ठिकानों के आसपास छोटे-मोटे आम काम करती थीं, जैसे जूते पॉलिश करना, कपड़े धोना और सामान पहुंचाना। अंग्रेजों के लिए, वह बस स्थानीय मजदूर थीं, जिनसे कोई खतरा नहीं था और राजामणि और दुर्गा यही चाहती थीं कि वे ऐसा ही सोचें। ब्रिटिश कैंप के आसपास अपना काम करते हुए, ये दोनों लड़कियां चुपचाप बातचीत सुनती थीं और सैन्य गतिविधियों पर नजर रखती थीं। राजामणि सैनिकों की आवाजाही, सामान, योजनाओं और INA के लिए काम की अन्य जानकारियों को ध्यान से याद कर लेती थीं या कभी-कभी कागज की पर्चियों पर लिख लेती थीं और उन्हें आगे भेज देती थीं।
राजामणि की INA ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’। इमेज सोर्स : लाइव हिस्ट्री इंडिया
कई महीनों तक उनकी जासूसी का काम बिना किसी रुकावट के चलता रहा, लेकिन एक दिन… राजामणि की साथी, दुर्गा, एक शाम वापस नहीं लौटीं क्योंकि उन्हें अंग्रेजों ने पकड़ लिया था और एक बहुत सुरक्षित मिलिट्री जेल में डाल दिया था। अब, जैसा कि आप शायद सोच रहे होंगे, राजामणि वहां से भागी नहीं। इसके बजाय, वह उसी ब्रिटिश जेल में घुस गईं, जहां उनकी सहेली को रखा गया था।
इसके लिए, राजामणि ने एक नाचने वाली लड़की का वेश बनाया और ब्रिटिश मिलिट्री कंपाउंड में घुस गईं। वहां उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को ड्रिंक्स परोसे। लेकिन ये कोई आम ड्रिंक्स नहीं थे। इनमें अफीम मिली हुई थी ताकि अंग्रेज नशे में धुत हो जाएं। योजना काम कर गई। धीरे-धीरे, गार्ड्स और ब्रिटिश अधिकारियों को नींद आने लगी। यही वह मौका था, जिसका जिसका वह इंतजार कर रही थी। धीरे-धीरे, वह कंपाउंड से गुजरीं, दुर्गा की कोठरी तक पहुंचीं और उन्हें भागने में मदद की।
लेकिन जैसे ही वे ब्रिटिश कम्पाउंड से निकलने ही वाली थीं, एक गार्ड ने उन्हें भागते हुए देख लिया और तुरंत उन पर गोली चला दी। एक गोली राजामणि के दाहिने पैर में लगी, खून बहने लगा, लेकिन वह आगे बढ़ती रहीं क्योंकि पकड़े जाना, उन्हें मंजूर नहीं था। उस समय, पकड़े जाने का मतलब न केवल मौत हो सकता था, बल्कि INA के पूरे इंटेलिजेंस नेटवर्क का खुलासा भी हो सकता था।
इस तरह, वे भागती रहीं और पास के जंगल में छिपने में कामयाब रहीं। चूंकि अंग्रेज अभी भी उन्हें ढूंढ़ रहे थे और राजामणि बुरी तरह घायल थीं और मुश्किल से चल पा रही थीं, इसलिए दोनों लड़कियों ने एक बड़े पेड़ की डालियों पर छिपने का निर्णय लिया, जबकि अंग्रेज उस इलाके में उन्हें ढूंढ़ रहे थे। वे कई दिनों तक छिपी रहीं, जब तक कि तीसरे दिन अंग्रेजों ने उनकी खोज बंद नहीं कर दी। उसके बाद ही दोनों लड़कियां नीचे उतरीं और वापस INA कैंप चली गईं। इस घटना के कारण उन्हें हमेशा के लिए लंगड़ाकर चलने की समस्या हो गई। लेकिन इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। उनके लिए जरूरी बात यह थी कि वे अंग्रेजों की जासूसी करने और उनकी नाक के नीचे से हिम्मत दिखाकर भागने में कामयाब रहीं।
उनकी बहादुरी पर किसी की नजर पड़े बिना नहीं रही। बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने राजामणि के कामों की तारीफ की और उन्हें ‘पहली भारतीय महिला जासूस’ कहा। और यही उनकी कहानी का सबसे खास हिस्सा है। जिस लड़की ने कभी कहा था कि वह किसी अंग्रेज को गोली मार देगी, वह बड़ी होकर असल में उससे भी ज्यादा खतरनाक काम करने लगी। वह एक जासूस बन गईं। और केवल 16 साल की उम्र में, जब ज्यादातर किशोर जीवन को समझने का प्रयास कर रहे होते हैं, सरस्वती राजामणि दुश्मन के इलाके में जाकर भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए आवश्यक खुफिया जानकारी जुटा रही थीं।

