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  • उन्होंने अंग्रेजों की जासूसी की, उन पर गोली चली, फिर भी ना डरीं : 16 साल की महिला जासूस सरस्वती राजामणि की अनकही कहानी

    उन्होंने अंग्रेजों की जासूसी की, उन पर गोली चली, फिर भी ना डरीं : 16 साल की महिला जासूस सरस्वती राजामणि की अनकही कहानी

    “हम लूटने वालों को गोली मारकर मार देते हैं, है ना? अंग्रेज हमें लूट रहे हैं, और बड़ी होकर मैं उनमें से कम से कम एक को तो गोली जरूर मारूंगी।” 

    1937 में कही गई ये बातें 10 साल की सरस्वती राजामणि की थीं। तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि वह छोटी सी बच्ची अपनी बात को कितनी गंभीरता से ले रही थी। सात साल बाद, केवल 16 साल की उम्र में, भागने के बजाय सरस्वती राजामणि ने एक नाचने वाली लड़की का वेश धरा और अंग्रेजों के कम्पाउंड में घुस गईं। फिर गार्ड्स को अफीम मिली ड्रिंक्स पिलाकर और उनके सुस्त होने की प्रतिक्षा की। जब गार्ड्स बेहोश हो गए, तो सरस्वती, दुर्गा की कोठरी तक पहुंचीं और अंग्रेजों की कड़ी निगरानी के बीच उन्हें भागने में मदद की। 

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  • कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    बर्मा (आज का म्यांमार) के घने जंगलों, पहाड़ियों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय छिपा है, जिसे इतिहास में हाशिये पर रखा गया। यह कहानी किसी विशाल सेना की नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चयी भारतीय सैन्य अधिकारी गुरबख्श सिंह ढिल्लों की है।

    उस दौर में, जब ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति था, तब आजाद हिंद फौज के इस अधिकारी कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। बर्मा के घने जंगलों में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना आगे नहीं बढ़ पाई थी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों का अंग्रेजी सेना से यह कोई साधारण टकराव नहीं था, बल्कि वह ऐतिहासिक क्षण था, जब भारतीय सैनिकों ने पहली बार ब्रिटिश सरकार को सीधे युद्धभूमि में चुनौती दी थी।

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