जिस पुरातत्वविद् ने राम जन्मभूमि के दावों को पुरातात्विक आधार दिया : प्रो. बीबी लाल की अनसुनी कहानी

Ram Janmabhoomi

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भारत की धरती का कण-कण सनातन सभ्यता के गौरव का साक्षी है। कहीं हजारों वर्ष पुराने मंदिरों के भग्नावशेष हैं, तो कहीं मिट्टी की परतों में दबे ऐसे प्रमाण, जो इतिहास की भूली-बिसरी गाथाओं को फिर से जीवित कर देते हैं। 

अयोध्या की पावन श्रीराम जन्मभूमि भी सदियों तक ऐसा ही एक रहस्य बनी रही। करोड़ों हिंदुओं की आस्था थी कि यही भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है, लेकिन समय के साथ यह प्रश्न भी इतिहास के सामने खड़ा हो गया कि क्या इस स्थान पर कभी एक भव्य मंदिर था। इस प्रश्न का उत्तर खोजने में जिस व्यक्ति का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है, वह हैं भारत के महान पुरातत्वविद् प्रोफेसर बीबी लाल (ब्रज बासी लाल)। उन्होंने अपनी कुदाल से ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य सामने रखे, जिन्होंने रामजन्मभूमि के ऐतिहासिक दावों को एक नया आधार दिया।

साल 1972 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद प्रो बीबी लाल ने अपना ध्यान रामायण से जुड़े स्थलों के पुरातात्विक अध्ययन पर केंद्रित किया। वर्ष 1977 से 1986 के बीच सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि क्षेत्र का एएसआई परीक्षण कराया। विभाग की ओर से अधिकांश समय केएन दीक्षित ने टीम का नेतृत्व किया। प्रो लाल ने परियोजना प्रमुख के तौर पर जन्मभूमि क्षेत्र के आसपास वैज्ञानिक उत्खनन करवाया। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह खुदाई आगे चलकर भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक और न्यायिक विमर्श का महत्वपूर्ण आधार बन जाएगी।

उत्खनन के दौरान बाबरी मस्जिद की चारदीवारी के ठीक दक्षिण में एक खाई खोदी गई। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, वैसे-वैसे ऐसे अवशेष सामने आने लगे, जिन्होंने प्रो. बीबी लाल का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां स्तंभों के आधार जैसी 12 संरचनाएं मिलीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इनका क्रम और दिशा मस्जिद के भीतर लगे उन बारह पत्थर के स्तंभों से मेल खाती थी, जिन पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां, पुष्प अलंकरण और मंदिर स्थापत्य की विशिष्ट नक्काशी स्पष्ट दिखाई देती थी।

बीबी लाल यह जान चुके थे कि यह स्तंभ मूल रूप से मस्जिद के लिए नहीं बनाए गए। बल्कि यह पहले बने किसी हिंदू मंदिर के अवशेष लगते हैं, जिन्हें बाद में मस्जिद के निर्माण में उपयोग किया गया। यही वह निष्कर्ष था, जिसने रामजन्मभूमि विवाद को पुरातात्विक दृष्टि से नई दिशा दी। जब कुछ इतिहासकारों ने स्तंभ आधारों के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए, तब बीबी लाल ने अपने शोध का बचाव भावनाओं से नहीं, बल्कि साक्ष्यों से किया। उन्होंने बताया कि खुदाई के दौरान लिए गए फोटोग्राफ, उनके नेगेटिव और एएसआई के अभिलेख इन संरचनाओं के प्रमाण हैं। उनका विश्वास था कि इतिहास का निर्णय वैचारिक बहस से नहीं, बल्कि पुरातात्विक साक्ष्यों से होना चाहिए। 

बीबी लाल की इसी पुरातात्विक निष्कर्ष के आधार पर विश्व हिंदू परिषद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में राम जन्मभूमि स्थल की वैज्ञानिक जांच कराने की मांग की। जिसके बाद साल 2002 में कोर्ट के आदेश पर जांच शुरु हुई। पहले ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) सर्वे कराया गया, जिससे जमीन के नीचे किसी पुरानी संरचना के संकेत मिले। फिर 5 मार्च 2003 को एएसआई को विस्तृत खुदाई का आदेश दिया गया। 5 माह चली इस खुदाई के बाद एएसआई ने हजारों तस्वीरों, वीडियो, दस्तावेजों और पुरावशेषों सहित विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। जिसमें 10वीं शताब्दी की एक विशाल संरचना के प्रमाण मिले। साथ ही मंदिर अवशेष, देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, नक्काशीदार पत्थर, आमलक, द्वार-चौखट की संरचनाएं भी निकलीं, जो विवादित ढांचे के मंदिर होने का वैज्ञानिक प्रमाण था।

इसी बीच 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने राम जन्मभूमि पर बने विवादित ढांचे को गिरा दिया। इसके बाद मलबे से बड़ी संख्या में नक्काशीदार स्थापत्य अवशेष, मंदिर शैली के पत्थर और महत्वपूर्ण शिलालेख सामने आए। दो सौ से अधिक ऐसे अवशेष मिले। इन खोजों ने वर्षों पहले बीबी लाल द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों को और अधिक महत्त्व दिया।

राम जन्मभूमि आंदोलन में अनेक संतों, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं और करोड़ों रामभक्तों की भूमिका रही, लेकिन यदि इस आंदोलन के पुरातात्विक पक्ष की बात की जाए, तो प्रो. बीबी लाल का योगदान सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में गिना जाता है। उनके द्वारा सामने लाए गए साक्ष्यों ने इस बहस को केवल आस्था तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इतिहास और पुरातत्व के दायरे में भी स्थापित किया।

यही कारण है कि आज जब अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला का भव्य मंदिर खड़ा है, तब प्रो.बीबी लाल को उस पुरातत्वविद् के रूप में याद किया जाता है, जिसने अपनी वैज्ञानिक खोजों से राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पक्ष को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कुदाल ने केवल मिट्टी नहीं हटाई, बल्कि वामपंथी इतिहासकारों द्वारा दबाए गए, भारत के सदियों पुराने इतिहास की परतों को भी दुनिया के सामने उजागर किया।