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  • मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब

    मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब

    मोगा 1989 जून, वो दिन जब पार्क बन गया था रणक्षेत्र और निहत्थे लोग हौसले के साथ गोलियों के सामने खड़े रहे। यह सिर्फ हमला नहीं था, साहस की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जहां डर नहीं, बल्कि अंत में संकल्प जीता।

    1990 का पंजाब…

    एक ऐसा समय, जब हवा भी डरकर बहती थी। गांव हों या शहर, हर तरफ एक ही सवाल था, ‘अगला निशाना कौन?’ 

    लेकिन इसी अंधेरे दौर में, कुछ लोग थे, जो हर सुबह बिना डरे एक मैदान में इकट्ठा होते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि मन में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संकल्प होता था। वे थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक। आज हम आपको बताएंगे, उस नरसंहार के बारे में जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 25 जून1989, वो तारीख जब अलगाववादियों ने विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत की अखंडता में विश्वास रखने वाले संगठन को डराकर चुप कराना चाहा, पर ये ना हो सका।

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  • 1928 गुरु पूर्णिमा : वह दिन, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरु चुना

    1928 गुरु पूर्णिमा : वह दिन, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरु चुना

    यह 1928 की बात है।

    डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू किए तीन साल हो चुके थे। संगठन अभी भी नया था, आकार में छोटा था, फिर भी अनुशासन में पक्का था और उद्देश्य स्पष्ट था।

    फिर गुरु पूर्णिमा आई।

    भारतीय परंपरा में, हिंदू कैलेंडर के चौथे महीने आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु का सम्मान किया जाता है। इस पवित्र दिन पर, शिष्य अपने गुरु के सामने झुकते हैं और धन्यवाद देते हुए गुरु दक्षिणा देते हैं। संघ के इतिहास में पहली बार गुरु पूर्णिमा मनाई जानी थी।

    स्वयंसेवकों के बीच एक शांत जिज्ञासा पैदा हुई। संघ का गुरु कौन होगा?

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