झारखंड की पहाड़ियों में एक ऐसी चीखें आज भी गूंजती हैं, जिन्हें इतिहास ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। यह चीखें हैं डोम्बारी बुरु नरसंहार में मारे गए, 400 जनजातीय क्रांतिकारियों की। जब दमनकारी ब्रिटिश शासन ने निहत्थे जनजातीय समाज के पुरुषों, बच्चों और महिलाओं पर गोलियों की बरसात की थी। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि वह क्षण था, जब एक पूरी सभ्यता को कुचलने का प्रयास किया गया। इस विद्रोह की आत्मा थे, बिरसा मुंडा, जिनकी आवाज ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ (अपना देश, अपना राज) बनकर जंगलों और पहाड़ों में गूंज उठी थी। लेकिन अंग्रेजों को यह इतना खतरनाक लगा कि उन्होंने इसे हमेशा के लिए दबाने का निर्णय लिया। डोम्बारी बुरु की पहाड़ी आज भी उस दिन की गवाही देती है, जब ब्रिटिश सत्ता ने इतिहास का सबसे क्रूरता पूर्ण भयावह रूप दिखाया था।
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