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  • कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर लाल किला ट्रायल : जब एक केस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

    कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर लाल किला ट्रायल : जब एक केस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

    5 नवंबर 1945 को दिल्ली की हवा कुछ और ही कहानी सुना रही थी। लालकिले की प्राचीर से ब्रिटिश सरकार न्याय का ढोंग रच रही थी, लेकिन बाहर खड़ा पूरा भारत ब्रिटिश सरकार के अंत का फैसला सुना चुका था। यह वही किला था, जहां कभी मुगल आक्रातांओं के फरमान गूंजते थे। वहां अब ब्रिटिश साम्राज्य लाल किले से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।

    कटघरे में खड़े थे आजाद हिंद फौज के कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों,उनके साथी कैप्टन शाहनवाज खान व कर्नल प्रेम कुमार सहगल और साथ में 17 हजार अन्य सैनिक। यह कोर्ट ट्रायल ही नहीं था, बल्कि ब्रिटिश राज और भारतीय चेतना के बीच सीधी टक्कर भी थी। जिसका भय इतना था कि क्रूर ब्रिटिश सामाज्य पहली बार सही फैसला सुनाने को मजबूर हुआ था।

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  • कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    बर्मा (आज का म्यांमार) के घने जंगलों, पहाड़ियों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय छिपा है, जिसे इतिहास में हाशिये पर रखा गया। यह कहानी किसी विशाल सेना की नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चयी भारतीय सैन्य अधिकारी गुरबख्श सिंह ढिल्लों की है।

    उस दौर में, जब ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति था, तब आजाद हिंद फौज के इस अधिकारी कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। बर्मा के घने जंगलों में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना आगे नहीं बढ़ पाई थी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों का अंग्रेजी सेना से यह कोई साधारण टकराव नहीं था, बल्कि वह ऐतिहासिक क्षण था, जब भारतीय सैनिकों ने पहली बार ब्रिटिश सरकार को सीधे युद्धभूमि में चुनौती दी थी।

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