साल 1917 है। फ्रांस की खाइयों में कहीं, पहला विश्व युद्ध लड़ रहा एक भारतीय सैनिक, घर चिट्ठी लिखने बैठता है। वह अपने परिवार को सब कुछ बताना चाहता है, कड़ाके की ठंड, लगातार गोलियों की बौछार और युद्ध के मुश्किल हालात। लेकिन वह सोच में पड़ जाता है, क्योंकि उसे पता है कि उसका लिखा हर शब्द ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा अनुवादित किया जाएगा, पढ़ा जाएगा, और उसकी बारीकी से जांच की जाएगी। उसकी चिट्ठी निजी नहीं है। और फिर भी, इसके बावजूद, भारतीय सैनिकों ने चिट्ठियां लिखना बंद नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने अपना संदेश पहुंचाने के नए तरीके ढूंढ़ लिए। यह कहानी है कि कैसे पहले विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेंसरशिप को मात देकर भारत में अपने घर से जुड़े रहने का रास्ता निकाला।
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