भारत में वर्ष बदलता नहीं, वह पुनर्जन्म लेता है। यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि भारतीय समय-दर्शन का सार है। दुनिया 1 जनवरी की रात घड़ी की सुइयों के साथ अंग्रेजी नए वर्ष का स्वागत करती है, लेकिन भारत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की प्रभात बेला में ब्रह्मांड के साथ तालमेल बिठाकर नव संवत्सर का आरंभ करता है। यहां नया साल, कैलेंडर के पन्ने बदलने का नाम नहीं, बल्कि चेतना के नवीनीकरण का पर्व है।
पश्चिमी परंपरा में समय को अतीत से भविष्य की ओर भागती हुई एक सीधी रेखा माना गया है। पर भारतीय चिंतन में समय को चक्र के समान देखा गया है, जो सृजन, पालन और संहार का अनवरत प्रवाह है। जैसे वसंत हर वर्ष लौटता है, वैसे ही भारतीय नव वर्ष हमें याद दिलाता है कि जीवन में हर अंत के बाद पुनर्जन्म संभव है। इसीलिए भारतीय नव वर्ष सामाजिक परंपरा या त्यौहार नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय लय के साथ मनुष्य के आत्मिक संबंध की घोषणा भी है।
और पढ़ें
