Siege of Chittorgarh (1567-68) : सन् 1567-68 की चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी में चित्तौड़गढ़ का किला खामोश हो चुका था। मुगल सेना विजय का जश्न मना रही थी। चारों ओर मौत की सन्नाटा छाया हुआ था। तभी धुएं और मलबे के बीच से एक अकेला साया उभरा, राजपूत योद्धा ईसर दास चौहान।
उसके शरीर पर धूल और खून के निशान थे। जख्मों से लथपथ होने के बावजूद उसकी आंखों में आग थी। किले के भीतर जो नरसंहार हुआ था, उसमें वह बचा रह गया था। लेकिन भागने की बजाय उसने अंतिम प्रतिरोध का फैसला किया। उसके पास केवल एक खंजर था, कोई ढाल नहीं, कोई साथी नहीं, सिर्फ अटूट साहस और मातृभूमि के प्रति समर्पण।
और पढ़ें
